वात्सल्यपूरित आत्मीयता की प्रतिमूर्ति स्वर-सम्राज्ञी गिरिजा देवी

कोलकाता
ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा, असाधारण योग्यता एवं अनवरत साधना के बल पर स्वर-सम्राज्ञी गिरिजा देवी ने देश-विदेश में अपार कीर्ति अर्जित की। शास्त्रीय कंठ-संगीत के क्षेत्र में उनके व्यापक एवं महत्त्वपूर्ण अवदान की उन्मुक्त-कंठ से प्रशंसा करते हैं संगीत-समीक्षक, संगीत-साधक तथा संगीत प्रेमी। संस्कृति, साहित्य, कला, दर्शन एवं संगीत की अति प्राचीन एवं समृद्ध परम्परा ने काशी को विशेष महिमा प्रदान की है। संगीत के क्षेत्र में काशी की उस विरासत को गिरिजा देवी ने उच्चतर आयाम प्रदान कर भारतीय कंठ संगीत को अपूर्व ऊँचाई प्रदान की। शिव ओम अंबर की एक पंक्ति का सहारा लेकर कह सकते हैं:
‘अथक, अविराम, अनुपम साधना है /
कि पूरी ज़िन्दगी नीराजना है’
अपने सम्पूर्ण गायन को नीराजना (आरती) बनाकर वे भगवती के प्रति श्रद्धा ज्ञापित करती रहीं। वे खुद कहती थीं, ‘बिना भगवती को अपना कंठ सौंपे गाया नहीं जा सकता। उनको अर्पित हुए बिना सुर लगता ही नहीं। मुझे लगता है, जिस दिन आत्मा से गा लिया, थोड़ी देर के लिए ईश्वर को पा लिया।’
सुप्रतिष्ठित साहित्यकार निर्मल वर्मा ने ठीक ही कहा है, ‘हमारे समय में देवताओं की अनुपस्थिति एक मरुस्थली शून्य का अवसाद उत्पन्न करती है, भारतीय संगीतकार अपने गायन में आज भी समय-समय पर उस शून्य को भेदकर हमें उस ‘देव-स्पर्श’ से कृतार्थ कराते हैं जो अन्यत्र दुर्लभ है। गिरिजा देवी के गायन की अंतःप्रज्ञा का स्रोत और परिवेश एक ही है काशी। काशी शिव का आवास-स्थल है। शिव का पर्याय सुन्दर की सृष्टि करता है…. गिरिजा देवी उस ‘सुन्दर’ को अपने संगीत में साकार करती हैं।’
8 मई 1929 को वाराणसी में जन्मी गिरिजा देवी का संगीत के प्रति बचपन से ही लगाव था। 5 वर्ष की अल्प आयु से ही उन्होंने स्व० पं० सरजू प्रसाद मिश्र एवं स्व० पं० श्रीचन्द मिश्र से संगीत की शिक्षा प्रारम्भ की। विद्वान एवं अनुभवी गुरुओं के कुशल मार्गदर्शन के साथ गिरिजा देवी की निष्ठा एवं साधना ने उन्हें 20 वर्ष की उम्र में ही कंठ-संगीत की निष्णात गायिका के रूप में प्रसिद्धि प्रदान की। संगीत के बनारस घराने का स्पर्श उनकी गायकी में परिलक्षित होता रहा है। खयाल, ठुमरी, टप्पा, दादरा, भजन, चैती, कजरी, होरी आदि में विशेष दक्षता के कारण उन्होंने देश-विदेश में पर्याप्त यश अर्जित किया। वे अनेक सम्मानों एवं अलंकरणों से समादूत थीं। 1972 में ‘पद्मश्री’, 1989 में ‘पद्मभूषण’ एवं जनवरी 2016 में ‘पद्मविभूषण’ की उपाधि से उन्हें अलंकृत किया गया। काशी विद्यापीठ तथा रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट्. की मानद उपाधि प्रदान की। उन्हें तानसेन पुरस्कार, यश भारती सम्मान, हाफिज अली खाँ सम्मान के अतिरिक्त स्वर-कोकिला, कंठ-शिरोमणि, संगीत-शिरोमणि आदि उपाधियाँ भी प्रदान की गई। 24 अक्टूबर 2017 को कोलकाता में उनका देहावसान हुआ। उनके देहावसान पर मेरे मन-मस्तिष्क में गुंजित पंक्तियाँ यथावत् प्रस्तुत हैं-
कोकिल-कंठी स्वर हुआ, चिर-प्रशांत, चिर-मौन।
ऐसी दिव्य विभूति की तुलना में है कौन ।।
चैती, कजरी, दादरा, टप्पा की झंकार।
ठुमरी, होरी गीत ही, अब स्मृति का आधार ।।
सरस राग की साधिके, स्वर की देवि ललाम।
कोकिल कंठी तुम्हें हैं, युग के कोटि प्रणाम ।।
प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा का अनुपालन करते हुए शिष्य-शिष्याओं को प्रोत्साहन प्रदान करना तथा उनके प्रति वात्सल्य-भाव उनकी खासियत रही है। वे श्रेष्ठ कलाकार तो थीं ही, पारिवारिक दायित्वों का भी बखूबी निर्वाह करती रही हैं।
इस महिमामयी स्वर-सम्राज्ञी के कई सांगीतिक अनुष्ठानों में शामिल होने का सुयोग मुझे मिला है। उनकी सांगीतिक क्षमता का विवेचन करने की पात्रता मुझमें नहीं है। लेकिन इन अनुष्ठानों में संगीत रसिक श्रोताओं को परितृप्त होते तथा संगीत-मर्मज्ञ समीक्षकों को अभिभूत होते मैंने देखा-सुना है। तबला, हारमोनियम और सितार पर संगत कर रहे शागिर्द और सहयोगियों के साथ उनकी सौम्य-सहज उपस्थिति किसी भी मंच को भव्यता प्रदान करती रही है। गायन के दौरान संगत कर रहे लोगों को संकेतों से ही सराहने एवं फटकारने की उनकी मुद्रा अत्यन्त प्रभावी होती थी। गायन के बीच में डिब्बे से पान का बीड़ा निकालकर मुँह में दवा लेने तथा पुनः दत्त-चित्त हो गायन में रम जाने का आत्मविश्वास गिरिजादेवी की अपनी पहचान थी। स्मृति में यदा-कदा काँध जाती है उनके द्वारा गाई लोकप्रिय चैती की पंक्तियाँ – चढ़ल चैत चित लागे न रामा, बाबा के अँगनवा बीर बँमनवा सगुन बिचारो / कब होइहैं पिया से मिलनवा, हो रामा… या फिर ‘बैरिन कोयलिया, तोरी बोली न सुहाय / कुहुक-कुहुक करे कारी रे कोयलिया / सोवत मदन सताय’ की भावपूर्ण प्रस्तुति अविस्मरणीय है।
‘विरह क्या केवल नायिकाओं को ही होता है, नायक को नहीं’- एक शागिर्द के इस भोले सवाल के जवाब में पद की रचना कर देना तथा ‘कजरी’ के रूप में उसकी प्रस्तुति गिरिजादेवी जी की सामर्थ्य का परिचायक रहा है –
घिरि आईं हैं कारी बदरिया / राधे बिन लागे न मोर जिया
कोकिल-कंठी गिरिजादेवी द्वारा रचित अनेक पद हैं, जो कंठ-संगीत की विविध शैलियों में अभिव्यक्त होकर श्रोताओं को रससिक्त करते रहते हैं। साहित्यिक-सृजन का उनका यह पक्ष भी कम मूल्यवान नहीं है। इस रचनाधर्मिता पर एक स्वतंत्र आलेख प्रस्तुत किया जा सकता है। उनके मधुर कंठ का ही वैशिष्ट्य है कि गीत-पंक्तियाँ मन-मस्तिष्क में अनुगुंजित होती रहती हैं। याद आ रहा है एक होली गीत । कन्हैया के साथ गोपियों का होली खेलने का उल्लास इस पद में ध्यातव्य है –
चलो गुइयाँ, आजु खेलें होरी।
अपने-अपने भवन ते निकरी / कोइ साँवरि कोइ गोरी
एक ते एक नयन मदमाती / सबै बयस की थोरी ।।
‘गिरिजा’ कृति के रचनाकार युवा कवि यतीन्द्र मिश्र ने ठीक ही लिखा है – “गिरिजा देवी को सुनना सारे संशयों के पार जाना है। अपनी स्वायत्त प्रश्नाकुलता के साथ, ऐसे अनगिनत शाश्वत सूत्रों को पाने जैसा, जिसमें आत्ममुग्धता मिट जाती है और अन्दर तक खुलने का भाव जाग्रत होता है। तब अपने भीतर हम क्षुद्रताओं, शंकाओं और ईर्ष्याओं को छुपा हुआ देख पाते हैं जिनको निकाल फेंकना ही सम पर लौटने जैसा होता है। गिरिजा देवी का गान मंगल का गान है। सारी सृष्टि को समेकित भाव से आशीष देनेवाला गान, जिसमें स्वयं भी कहीं गहरे अनुगृहीत होने का भाव छुपा हुआ है। उनकी निश्छल सादगी ने एक अद्भुत आभा उनके चारों ओर गढ़ दी है, जो गाते समय पूरी गरिमा के साथ आभासित होती है।”
संगीत की इस विशिष्ट विभूति के वात्सल्य की शीतल छाया प्राप्त करने का सुयोग मेरे जीवन की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। इसे मैं भगवान की कृपा ही मानता हूँ कि संगीत के क्षेत्र से, या ‘अप्पाजी’ की जन्मभूमि /साधना भूमि वाराणसी से कोई सम्पर्क न होने पर भी मुझे उनकी आत्मीयता प्राप्त हुई। कलकत्ता विश्वविद्यालय की एम.ए. (हिन्दी) कक्षा में ‘अप्पाजी’ (शिष्य-शिष्याएँ तथा परिवार के बच्चे गिरिजादेवी जी को यही संबोधन प्रदान करते रहे हैं।) की सुपुत्री सुधा मेरी सहपाठिनी रही हैं – उन्हीं के माध्यम से मुझे उनका स्नेह एवं नैकट्य सुलभ हुआ। स्नातकोत्तर कक्षा में पढ़ाई के क्रम में जिन चार-पाँच विद्यार्थियों का समूह ‘ग्रुप-स्टडी’ करता था, उसमें मेरे साथ सुधाजी और तीन मित्र थे। ‘अप्पाजी’ की विराट-हृदयता के कारण अध्ययन का स्थायी स्थान उनका फ्लैट सुनिश्चित हो गया था। पठन-पाठन निर्विघ्न चले तथा चाय-पान, भोजन आदि यथासमय सबको मिले, इसकी चिन्ता वे व्यक्तिगत रूप से किया करतीं थीं। गिरिजादेवी जी की वात्सल्यपूरित आत्मीयता का चरम तब परिलक्षित होता, जब वे स्वयं रसोई के कार्य में सहयोग कर सभी बच्चों को ममत्व के साथ भोजन करातीं। उनका यह वत्सल-भाव अंतिम समय तक यथावत् बना रहा।
श्रीमती गिरिजा देवी के प्रति डॉ० मण्डन मिश्र के श्रद्धापूरित भावोद्गार उनकी सांगीतिक महिमा स्वतः स्पष्ट करते हैं : ‘भारतीय परम्परा के अनुसार समस्त विद्याओं और कलाओं का लक्ष्य परम तत्त्व की प्राप्ति है। संगीतकार अपनी स्वर-साधना के माध्यम से परब्रह्म की उपासना करता है, उसके माध्यम से परब्रह्म के साथ तादात्म्य स्थापित करता है, एक प्रकार से परमात्मा में तन्मय हो जाता है। इस दृष्टि से श्रीमती गिरिजा देवी का स्थान वाराणसी के महनीय व्यक्तियों में विशेष महत्त्व रखता है।’
याद आ रहा है दिसम्बर 2015 का एक प्रसंग। रायपुर में मेरे सुपुत्र के विवाहोपरान्त कोलकाता में आयोजित आशीर्वाद समारोह के अवसर पर देहरादून के संगीत-अनुष्ठान को संपन्न करते हुए रात 8 बजे दमदम एयरपोर्ट से सीधे समारोह स्थल पधारी। 87 वर्ष की इस उम्र में कार्यक्रम का तनाव एवं यात्रा का दबाव उनके वत्सल-भाव के सामने हल्का पड़ गया। उस दिन उनकी गरिमामयी आत्मीय उपस्थिति एवं ममत्व से परिपूर्ण आशीर्वचनों ने केवल मुझे ही नहीं, मेरे नए संबंधियों तथा परिवार की नवीन सदस्या मेरी पुत्र-वधू को भी अभिभूत कर लिया।
शास्त्रीय कंठ संगीत के क्षेत्र में ख्याति के शिखर पर विराजमान होते हुए भी गिरिजादेवी जी में अद्भुत सहजता, विनम्रता, अपनत्व एवं ममत्व रहा है। अपने इन्हीं गुणों के कारण वे सबकी प्रिय एवं श्रद्धेय रही हैं।
कवि अरुण प्रकाश अवस्थी की इन काव्य पंक्तियों के साथ उनकी स्मृति के प्रति निवेदित है नमन –
हे कला की पूर्णिमा सी, ब्रह्म की आराधना सी।
आरती बनकर जली तुम, भारती की साधना सी ।।
बीन की गुंजार, रस श्रृंगार, लय की अर्चना लो।
स्वर कोकिले ! शत वंदना लो।।
