जीवन का यज्ञ आत्मबल की ज्योति
नीतू तिवारी, कोलकाता
बचपन तो कोमल, निर्मल, निस्वार्थ होता है,
हृदय में बस प्रेम, आँखों में विश्वास होता है।
पर जीवन का सच्चा अर्थ तभी उजागर होता है,
जब संघर्षों से मनुष्य का परिचय होता है।
जब आँधी ललकारे, जब समय परखता है,
तभी भीतर का सोना तपकर निखरता है।
मुस्कानों के पीछे छिपे आँसुओं को पीना पड़ता है,
गरल को अमृत में बदलकर जीना पड़ता है।
जग में वही पूज्य, वही सम्मानित कहलाता है,
जो अंगारों पर चलकर भी मुस्कुराता है।
जिसे ठोकरें रोक नहीं पातीं, आँधियाँ झुका नहीं पातीं,
वही तो भविष्य का दीप जलाता है।
दृगों में सपनों की ज्योति सजाना होगी,
हर हार को जीत में बदलना होगा।
हँसी में, रुदन में, पीड़ा में भी,
मस्तक ऊँचा रख आगे बढ़ना होगा।
जब दामिनी कड़कती हो अंबर पर,
तब तू सागर बन शांत रहना,
शीतलता से, गंभीरता से,
अपने कर्तव्यों का पालन करना।
टूटे हुए सपनों की सिसकी कौन सुनता है?
अंतर की चिर वेदना को कौन समझता है?
पर तू निराश मत हो, हे मन के योद्धा!
तेरे भीतर अनंत प्रकाश जलता है।
जब कोई साथ न दे, तू खुद अपने साथ बन,
हर गिरावट को सफलता का आरंभ बन।
तेरे परिश्रम की ध्वनि ही तेरी पहचान बनेगी,
तेरे कदमों की आहट ही तेरी उड़ान बनेगी।
जरूरत पड़े तो काल के कपाल पर,
प्रलय की लकीर भी खींच दूँगा,
अपनी मेहनत, अपने विश्वास से,
नया सवेरा रच दूँगा।
अंधकार और उजियारे की हर सीमा लाँघकर,
दुख-सुख की हर कहानी पार कर,
मैं अपने स्वत्त्व की खोज में,
अपने अंतर्मन की ज्वाला में,
संस्कृति और सभ्यता के विकास में,
एक दीप-सा जलता जाऊँगा।
क्योंकि —
जीवन एक यज्ञ है, आहुति बनना होगा,
तपकर, पिघलकर, नया स्वर गढ़ना होगा।
बचपन की कोमलता को,
यौवन की दृढ़ता से जोड़ना होगा —
तभी तो इस सृष्टि में,
सच्चा मानव बनकर उभरना होगा।
