देवी

डॉ. कनक लता तिवारी,
मुंबई

मंदिर में घंटो की मधुर आवाज वातावरण में गुंजायमान हो रही थी। भक्तों की कतार मंदिर के बाहर बढ़ती जा रही थी। लाउडस्पीकर पर कोई भक्ति संगीत का कैसेट बज रहा था। कैसेट की आवाज के साथ भक्तों की टोली भी अपना सुर मिला रही थी। आवाज के साथ झूलते सिरों की कतार अलग समां बांध रही थी। आँगन और चहारदीवारी के अंदर अभी सफाई चल रही थी। झाड़ू लेकर पानी डालते हुए कई लोग इस काम में लगे थे। अंदर लगे पेड़ों की पत्तियों पर पड़ी ओस की बूंदे चमक रही थीं। अभी सूर्य के निकलने में देर थी, लेकिन आकाश लालिमा का आभास देने लगा था।

अंदर रतिराम प्रधान पुजारी को आरती की तैयारी के आदेश दे रहे थे। कुछ स्त्रियां फल काट रहीं थीं। एक तरफ ताजे पेड़े बनाये जा रहे थे। पुजारी से बात कर रतिराम अंदर जाने को हुए कि कुछ याद कर वापस मुड़ आए। ‘‘पुजारी जी, देवी के दर्शन शुरु हों तो जल्दी सबको निबटाना। एक व्यक्ति दो मिनट से ज्यादा का समय ना ले।” ‘‘अच्छा” पुजारी जी संक्षिप्त सा उत्तर देकर अंदर मुड़ लिए।

पुजारी जी यानि रतिराम के बड़े सुपुत्र छेदीलाल। पहले के छैला छेदीलाल और आज के पुजारी जी में जमीन-आसमान का फर्क है। भड़कीले पैंट शर्ट की जगह गेरुए धोती कुर्ते ने ले ली है। फुग्गेदार बालों की जगह घुटा सिर और बड़ी-सी शिखा। माथे पर चंदन का बड़ा सा त्रिपुंड उनके मस्तक की शोभा बढ़ाया करता है। अपना सिल्क का दुपट्टा संभालते हुए पुजारी जी आरती के बर्तन संभालने लगे।

रतिराम अंदर आंगन में पहुंचे और आवाज लगाई – ‘‘छेदी की अम्माँ, देवी जी ध्यान कर रही हैं कि नहीं। भक्त जमा हो रहे हैं।” ‘‘हाँ नहा रही हैं।“ देवी की अम्माँ यानी रतिराम की पत्नी का जवाब आया। अधेड़ उम्र की महिला, हष्ट-पुष्ट शरीर है। सीधे पल्ले की साड़ी, सिर पर खींचा थोड़ा सा घूंघट।

“जल्दी तैयार कर लाओ। बाहर भीड़ बढ़ रही है।” रतिराम बाहर जाते हुए बोले।
“देवी माँ, जल्दी आओ बाहर।”
“आ रही हूँ माँ।”
“अरे माँ कहकर पाप ना चढ़ाओ।”

देवी स्नान कर बाहर आ गईं। अब गेरुए वस्त्र पहनेंगी माथे पर बड़ा सा सिंदूर का टीका। फिर आसन पर बैठकर पूजा ग्रहण करेंगी। देवी यानि रतिराम की बड़ी कन्या। जन्म के समय ईश्वर ने बौनेपन का जो अभिशाप दिया था, दिन बीतने पर वह वरदान बन चुका है। आज भी रतिराम को याद आती है वह रात।

सुबह से ही बादलों की झड़ी लगी थी। शाम तक वह पानी हवा से तूफान में बदल चुका था। रतिराम की पत्नी प्रसव वेदना से कराह रही थी। वे दाई को लेने निकले। हवा के पहले झोंके से ही हाथ का छाता उड़ गया। फिर पत्नी की व्याकुल चीखें उन्हें गावों की गलियों में ढकेलती रही। किस तरह अंदाज कर उन्होंने दाई का घर तलाश किया उन्हें खुद नहीं पता। गांव में ही एक दाई थी। चमारों के टोले की अनारो की अम्मा। पहले तो इस गरजते-बरसते मौसम में उनके साथ जाने से इंकार कर दिया। लेकिन रतिराम की अनुनय-विनय और ज्यादा पैसे देने के आग्रह ने उसे पिघला दिया।

जब अनारों की माँ और रतिराम घर पहुँचे तो उनकी पत्नी की चीखें पूरे घर को गुंजा रहीं थीं। दो-चार मोहल्ले की औरतें भी आ चुकी थीं। आते ही अनारो की मां ने प्रसूता का पेट टटोलकर घोषणा की कि बच्चा उल्टा है। लेकिन वे भी हार नहीं मानेंगी। औरतें पानी गर्म करने तथा बाकी इंतजामों में जुट गईं और अनारों की अम्मा जच्चा के साथ।

बाहर प्रतीक्षा में बैठे रतिराम ने जब कई घंटों बाद बच्चे के रोने की आवाज सुनी तो जान में जान आई। लेकिन बाहर भागती बदहवास औरतों को देखकर उन्हें किसी अनहोनी की आशंका हुई।

“क्या हुआ भोला की अम्माँ” उन्होंने पास गुजरती महिला से पूछा।

अरे दैया रे, दैया, तुम्हारे यहां मानुख नहीं डाइन जन्मी है डाइन। भागते हुए उस स्त्री के मुंह से निकला।

रतिराम घबराकर अंदर गया। उनकी स्त्री अस्त-व्यस्त मलिन मुख निढाल पड़ी थी। बगल में साफ कपड़े पर पड़ा था वह शिशु। पड़ा नहीं पड़ी थी क्योंकि वह बालिका थी। नन्हें हाथ-पैरों की तुलना में सिर बहुत बड़ा था। और सिर पर उगे थे लम्बे-लम्बे बाल जिसकी वजह से औरतों ने उसे डाइन का खिताब दे दिया था।

रतिराम सिर पकड़कर बैठ गया, लेकिन अब क्या हो सकता था। उनका उतरा चेहरा देखकर अनारों की अम्मा ने भी कोई नेग नहीं मांगा। चलते हुए बोलीं, ‘‘दुःख ना करो रतिराम। ई तिना के लड़िका बहुत दिन नाहीं जियत हैं।’’ रतिराम सन्न से बैठे रहे। उनके पैरों में चलने की शक्ति नहीं बची। फिर तो हर दिन जब वे उठते तो लगता कि कोई बुरी खबर मिलने वाली हैं। लेकिन आशंका को दूर करती वह बालिका जी रही थी। दूसरे बच्चे के समय तो रतिराम बहुत घबराए हुए थे। लेकिन छेदीलाल सामान्य बालक के रुप में जन्मा। फिर तो पांच सालों में दो बेटे और बेटी उनके परिवार में जुड़ गये। बाकी सारे बच्चे तो ठीक तरह से बढ़ते रहे, लेकिन बड़ी बच्ची के दो-तीन वर्ष बड़े होने पर ही पता चलने लगा कि वह बौनी है। लड़की और बौनी, रतिराम चिंता में डूबे रहते लेकिन क्या हो सकता था?

अच्छा ये हुआ की इधर ग्राम पंचायत में टीवी आ गया था। रतिराम उसे देखकर अपना मन बहलाते। एक दिन टीवी पर आती फिल्म को देखकर उन्हें अपनी समस्या का समाधान मिल गया। दूसरे दिन उन्होंने अपने बड़ी बेटी को बुलाया। अब वह दस वर्ष की हो चुकी थी। ‘‘सुन आज से तेरा नाम देवी है, समझी तू जैसा मैं समझाऊँ वैसा ही करती जाना। अगर नहीं किया तो…..’’ रतिराम हिंसक मुद्रा में उसे देखने लगा।

डरकर उसने सर झुका लिया-

“हां बापू जैसा आप कहें।”

दूसरे दिन से गांव में यह खबर फैलने लगी कि रतिराम की बड़ी बेटी के रुप में देवी माँ ने अवतार लिया है। जितने मुंह उतनी बातें। कोई कुछ कहता कोई कुछ।

रतिराम की सामने की कोठरी में रोज देवी का दरबार लगने लगा। सुबह लीप-पोत कर कोठरी मे अगरबत्ती सुलगा देते रतिराम। फिर नहला-धुलाकर लाल कपड़े पहनाकर एक चौकी पर देवी को बैठा देते। जब भीड़ इकट्ठी हो जाती तो देवी धीरे-धीरे झूमने लगती। देवी से प्रश्न पूछते जाते और वह सर हिलाकर जवाब देती जाती। हां में सिर आगे पीछे हिलता, ना में दायें-बायें, बोलती नहीं थी मौन रहती थी।

धीरे-धीरे देवी के दरबार का प्रताप बढ़ने लगा। भारत अभी भी किवदंतियों का देश है। किसी की आस पूरी हुई तो किसी की नहीं। लेकिन रतिराम ने मार्केटिंग इतनी जबरदस्त की कि देवी का नाम तो बिकना ही था। देवी के प्रताप से भरी किताबें, देवी की श्रद्धा में रचे गये भक्ति कैसेट। दिन पर दिन देवी की महिमा बढ़ने लगी और साथ ही रतिराम का बैंक बैलेंस।

अपने आवारा लड़के छेदीलाल को जो बालों का फुग्गा फुलाए गांव के एकमात्र कन्या इंटर कालेज के सामने मंडराया करता था प्रधान पुजारी बना दिया। मडैया से अब पांच मंजिला कोठी है उसकी और देवी का मंदिर उसी कोठी के बगल में। पीछे के दरवाजे से ही देवी मंदिर में प्रवेश करती हैं और उनके विराजमान होने के बाद पट भक्तों के लिए खोल दिये जाते हैं। मुख्य सड़क से मंदिर तक पक्की सड़क बन गई है। जो सरकार ने भक्तों की सुविधा के लिए बनवा दी है। दूर-दराज के कस्बों-गावों से बसें चलती हैं भक्तों को मंदिर तक लाने के लिए सड़क के दोनों तरफ प्रसाद और चढ़ावे की दुकानें हैं मंदिर में रखी पेटी में भक्त नगदी चढ़ाते हैं।

रतिराम उसकी पत्नी व बच्चों के चेहरों पर चिकनाई बढ़ती ही जा रही है, लेकिन देवी? उसके मन में क्या झंझावात मचा है? किसी को क्या पता। सत्रह साल की देवी शरीर से भले ही बौनी रह गई हो मगर मन से तो जवान हो चली है। नवजवान भक्त जब उसके पैरों पर सिर रखकर प्रणाम करते हैं तो उसे अपने शरीर में अजीब सा रोमांच हो जाता है। शरीर छोटा है तो क्या शारीरिक क्रियाएं अपना धर्म निभा रही हैं। लेकिन उसे तो देवी बनकर रहना है सारी वासनाओं से दूर। जाए भी तो कहां? एक तो शरीर इतना मजबूत नहीं है, दूसरे रतिराम अपनी नोट छापने की मशीन पर कड़ी निगाह रखते हैं।

देवी तैयार होकर बाहर निकली और आसन पर विराजमान हो गई। नियत समय पर पर्दा उठा दिया गया। छेदी ने आरती और भजन शुरु कर दिए। भक्त भी झूम-झूमकर कीर्तन कर रहे थे। फिर दर्शन और समस्याओं के निदान का दरबार शुरु हुआ। देवी थक चुकी थी उठना चाहती थी तभी रतिराम अंदर आये।

“बैठी रहिए देवी जी अखबार वाले आज आपका इंटरव्यू लेने आए हैं।”

“देवी आपका नाम?’’

“क्षमा कीजिए, देवी मौन व्रत रखती हैं।” रतिराम बीच में ही बोला।

“इसलिए सवालों के जवाब मैं दूँगा।”

“आप कौन हैं?’’

“मैं, वैसे तो जन्म के बंधन से तो ये मेरी बेटी है, लेकिन कर्म से मैं देवी का अनुगामी भक्त हूँ।”

“अच्छा आपको कब पता चला कि आपकी बेटी में दैवीय गुण हैं?’’

“इन्होने तो जन्म के समय से ही चमत्कार दिखाना शुरु कर दिया था। पैदा ही हुई थी सिर पर लंबे बालों की चोटी के साथ। बचपन से ही एक कोने पर बैठकर ध्यान लगा लेती थीं। फिर देवी का तेज बरसने लगता इनके चेहरे पर। मेरी तो आंखे ही मुंद जाती। उस तेज को देख सकना आम आदमी के बस में कहां संभव था?’’ रतिराम भक्तिभाव में डूबे हुए बोले।

“झूठे” देवी का हृदय चीत्कार कर उठा। ये तेज तब क्यों नहीं देखा तुमने, जब बौनी कहकर मेरा तिरस्कार करते थे। मुझे कभी गोद में नहीं खिलाया। हमेशा दूसरों की उतरन और जूठन ही दी। आज बड़ा प्रेम और भक्तिभाव जागा है।

“देवी की दिनचर्या क्या है?’’

सुबह स्नान-ध्यान फिर भक्तों को दर्शन देना, फिर देवी ध्यान में लीन रहती हैं दूसरी सुबह तक।

“देवी खाती या सोती नहीं हैं?’’

“अजी खाना और सोना तो हम जैसे पार्थिव मनुष्यों का काम है। देवी इन सब से दूर ही रहती हैं।“
फिर झूठ, देवी ने सोचा। पेटभर खाने को मुझे इसलिए नहीं देते कि कहीं बैठे-बैठे मैं मोटी ना हो जाऊँ। रात को सोती भी हूँ तो भूख के मारे आंख खुल जाती है। चुराकर खाने की इच्छा होती है। लेकिन हिम्मत नहीं होती। एक बार उसे बेंत से कितना पीटा था। याद आते ही कांप जाती है वह। इंटरव्यू वाले सज्जन उठ खड़े हुए थे और अब फोटोग्राफर उसके फोटो ले रहा था।

इधर जब देवी नहाने जाती तो देखती, उसकी भैंसो को दाना-पानी देने वाला सुखिया, उसे ध्यान से देख रहा है। पहले तो उसे उलझन हुई फिर, धीरे-धीरे वह भी उसकी प्रतीक्षा करने लगी। नहाते समय सुखिया उसके लिए पानी भरकर रखते समय धीरे से उसकी पीठ छू लेता तो वह सनसनी से भर जाती। ये छुई-मुई का खेल चलता रहता, लेकिन रतिराम की अनुभवी निगाहों ने देवी के अंदर आए परिवर्तनों को भांपना शुरु कर दिया। फिर एक दिन रात को अंदर कमरे में उसकी पेशी हुई।

“देवी तुम्हारे रंग-ढंग ठीक नहीं हैं। सुखिया के साथ क्या चल रहा है? तुम इन सब सांसारिक कर्मों के लिए नहीं बनी हो।” रतिराम दहाड़े।

“क्यों बापू?’’ देवी के जवाब ने उन्हें स्तब्ध कर दिया। ‘‘मैं लड़की नहीं हूँ? मेरे अंदर भावनाएं नहीं हैं? मैं कोई देवी नही हूँ, नहीं हूँ।”

“चुप लड़की धीरे बोल” मां ने चुप कराना चाहा।

“क्यों धीरे बोलूँ? सुन लें सब लोग। समझ लें कि मैं भी आम इंसान हूँ। थक गई मैं बापू ये देवी का कलेवर ढोते-ढोते।” देवी का स्वर रुआंसा हो आया।

“मुझे मुक्ति दो बापू। आज तक किसी ने मुझे प्रेम की निगाहों से नहीं देखा। उस अनपढ़ सुखिया की आंखों में मिली है मुझे वह अनुभूति। मुझे भी आम लड़की की तरह जीने दो। अब तो हमारे पास काफी पैसा भी है। बापू कोई नहीं कमी अब। मैं तुम्हारे पैर पड़ती हूँ।” देवी रो पड़ी।

“चुप-चुप, खुद पाप बटोर रही है और हमें भी पापी बनाने चली है।”

“अगर आपने मेरी बात नहीं मानी तो मैं अखबार वालों को सारी जानकारी दे दूंगी और आपका भंडाफोड़ कर दूंगी। देवी तैश में थी।”

रतिराम उसे मारने लपके लेकिन छेदीलाल ने उन्हें रोक लिया। फिर रात के खाने तक कोई कुछ नहीं बोला। देवी अपने बिस्तर पर पड़े रो रही थी, तभी बगल के कमरों से आती आवाजों को सुनकर उठ बैठी। छेदीलाल कह रहा था- ‘‘बापू देवी बगावत पर उतर आई है। उसके सिर पर प्रेम का भूत चढ़ा है और अब वह समझाने, डराने, धमकाने से नहीं मानने वाली।”

“तो क्या करुं?’’ रतिराम बोले।

“मेरी मानो तो जिंदा देवी को मारकर अमर कर दो।”

“नहीं-नहीं” माँ आर्तनाद कर उठी।

“फिर क्या करें? कल अगर पोल खुली तो गांव वाले हमें छोड़ेंगे नहीं, मार ही डालेंगे। वैसे भी इस बौनी का होगा क्या? जिंदगी भर घसिटेगी, इससे अच्छा मौत से हमारा भला करेगी।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। देवी का हृदय चीत्कार कर उठा। तो अपने बाप-भाई के लिए वह बेटी या बहन कभी नहीं थी। जैसे रेस का घोड़ा लंगड़ा होने पर गोली मार कर उसे खत्म किया जाता है बस वही। बगावत की बू आते ही उस जैसी लंगड़ी घोड़ी को खत्म कर देंगे। नहीं ऐसा नहीं होने देगी वह। सुखिया को साथ ले निकल जाएगी वह।

देवी बिस्तर से उठ बैठी। तकिये से नीचे हाथ डालकर उसने एक थैली निकाली। कुछ भक्त उसके हाथ में रुपये रख जाते थे। उन्हें वह रतिराम से छुपाकर अपने पास रख लेती थी। कमरे के दरवाजे पर आते ही उसकी सांस आधी रह गई। सामने रतिराम और छेदीलाल साक्षात् यम की मूर्ति बने खड़े थे, छेदी के हाथ में गंडासे को देखकर देवी का कंठ सूख गया। “मुझे मत मारो बापू” उसकी आवाज बहते रक्त के परनाले में डूब गई।

सुबह गांव में शोर मचा हुआ था कि देवी ने समाधि ले ली। लोग झुंड के झुंड पहुंचने लगे। मंदिर में ही जिस चौकी पर देवी बैठती थीं, रातों रात वहीं गढ्ढा खोदकर रतिराम और छेदीलाल ने देवी को नहलाकर कपड़े बदलाकर बिठा दिया था। सरपंच और गांव के कई बड़े लोगों के सामने रतिराम ने रोते हुए गढ्ढे पर मिट्टी डालनी शुरु कर दी।

“देवी ने रात को मुझे जगाया और कहा रतिराम अब मेरे जाने का वक्त आ गया है। स्वर्ग में देवताओं का राज्य ठीक नहीं चल रहा है, अब मुझे उन्हें जा कर संभालने का काम करना है। फिर हमसे इस जगह गड्ढा खुदवाया और समाधि लगाकर बैठ गई और फिर प्राण छोड़ दिये।“ हाय-हाय करते हुए रतिराम ने मिट्टी से गड्ढा बराबर कर दिया। बगल में सनी रखी सीमेंट से छेदीलाल ने जमीन पर एकसार कर दी और फिर चौकी वहीं रख दी। लेकिन अब चौकी पर देवी नहीं देवी का फोटो था।

समाधिस्थ देवी की याद में वहां हर वर्ष मेला जुटता है। रतिराम दिन पर दिन समृद्धि की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं। अब तो मंदिर बहुत ही भव्य हो गया है। रतिराम की पत्नी के शरीर पर भी गहनों की बाढ़ आई हुई है। कोई भी जीवित देवी को याद नहीं करता। सिर्फ सुखिया उदास नजरों से उस कमरे की ओर देखता रहता है, जहां एक सुबह नाली से बहते लाल पानी को उसने देखा था।

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