जीवन किस पथ मोड़ रहा है

राकेश मणि त्रिपाठी

थाम रहा किसके दामन को,
किसका दामन छोड़ रहा है।
मानव को अहसास नहीं है,
जीवन किस पथ मोड़ रहा है।।

खींच रहा है कहीं लकीरें,
कहीं भीत वो जोड़ रहा है।
सोच रहा बस अपने तक ही,
अपनों को ही छोड़ रहा है।।

जो दिखने में हैं आकर्षक,
उनसे नाता जोड़ रहा है।
नये रिवाजों के चक्कर में,
संस्कृति अपनी छोड़ रहा है।।

लाभ चाहिए झटपट उसको,
श्रम से मुँह वो मोड़ रहा है।
करके धारण सोच संकुचित,
दूर दृष्टि को छोड़ रहा है।।

आजादी का ढोंग रचाकर,
सब बंधन वो तोड़ रहा है।
रजनी के दामन में जाकर,
आज दिवाकर छोड़ रहा है।।

मानव को अहसास नहीं है,
जीवन किस पथ मोड़ रहा है।।

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