सम्पादक की ओर से

प्रदीप शुक्ल

प्रेम : अनुभूति से वस्तु तक!

प्रेम किया जाता है, प्रेम बांटा जाता है, प्रेम का संदेशसंवाद भेजा जाता है। प्रेम वह अनुभूति है जो बिना शब्दों के भी संप्रेषित हो जाती है, जो बिना किसी अपेक्षा के केवल देने की भावना से जन्म लेती है। हमारी सनातन संस्कृति में प्रेम केवल मनुष्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवजंतुओं, पशुपक्षियों, प्रकृति, वृक्षों, नदियों और समस्त सृष्टि के प्रति करुणा और स्नेह के रूप में सदैव विद्यमान रहा है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा विकसित हुई जहाँ पूरी धरती एक परिवार मानी गई। परंतु दुर्भाग्यवश, समय के साथसाथ प्रेम की यह पवित्र, सूक्ष्म और आत्मिक परिभाषा बदलती चली गई। आज के तथाकथित आधुनिक युग में प्रेम अनुभूति नहीं, बल्कि वस्तु बन गया है। वह वस्तु जो बाज़ार में बिकती है, दुकानों में सजती है और बड़ेबड़े आकर्षक, लुभावने ऑफ़रों के साथ शॉपिंग मॉल्स में उपलब्ध होती है। प्रेम अब भाव नहीं, पैकेज है; संवेदना नहीं, सेल है; समर्पण नहीं, स्टेटस सिंबल है। वाह रे ज़माना! क्या कमाल है जहाँ एहसास की जगह वस्तु ने ले ली। आज प्रेम का उत्सव भी बाज़ार के हिसाब से तय होता है। तिथियाँ निर्धारित हैं, रंग निर्धारित हैं, गिफ्ट निर्धारित हैं और यहाँ तक कि प्रेम व्यक्त करने के ‌‘तरीके‌’ भी। वैलेंटाइन डे इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। एक ऐसा दिन, जिसे प्रेम का पर्याय बना दिया गया है। जैसे प्रेम केवल एक ही दिन किया जा सकता हो, जैसे स्नेह की अभिव्यक्ति कैलेंडर के पन्नों की मोहताज हो। इस दिन को मनाने की एक ‌‘अपनी संस्कृति‌’ गढ़ ली गई है जिसका बुखार आज ‌‘नई सोच’ के नाम पर सिर पर चढ़कर बोल रहा है।

प्रश्न यह नहीं है कि किसी दिन या वेलेन्टाइन डे पर प्रेम व्यक्त करना गलत है या सही। प्रश्न यह है कि क्या प्रेम को केवल एक दिन, एक गुलाब, एक कार्ड, एक चॉकलेट या एक महंगे उपहार तक सीमित कर देना उचित है? क्या यही प्रेम का अर्थ है, जो हमें सनातन संस्कृति से सीखने को मिला था? हमारे यहाँ प्रेम त्याग सिखाता है, न कि प्रदर्शन। सनातनी दर्शन में प्रेम मौन में भी मुखर रहता है, और उपस्थिति में नहीं, बल्कि भाव में जीवित रहता है। भारतीय संस्कृति में प्रेम का स्वरूप बहुआयामी रहा है। मातापिता का संतान के प्रति निस्वार्थ स्नेह, गुरु का शिष्य के प्रति मार्गदर्शक भाव, मित्रों के बीच निःस्वार्थ अपनापन, पतिपत्नी के बीच विश्वास और समझ, और सबसे ऊपर प्रकृति के प्रति सम्मान और करुणा। यहाँ प्रेम केवल रोमांटिक भावना नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली रहा है।

बाज़ार इस मानसिकता को भलीभांति समझता है। वह जानता है कि भावनाओं को कैसे भुनाया जाए। इसलिए प्रेम के नाम पर उत्पाद गढ़े जाते हैं, रिश्तों के नाम पर ऑफ़र दिए जाते हैं और भावनाओं को छूट के प्रतिशत में तौला जाता है। प्रेम अब एक ‌‘टार्गेट ऑडियंस’ बन चुका है। यही कारण है कि वैलेंटाइन वीक के हर दिन का अलग अलग नाम है मानो प्रेम को भी चरणों में बाँट दिया गया हो। इस सबके बीच सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि युवा पीढ़ी धीरेधीरे इसी को प्रेम की वास्तविक परिभाषा मानने लगी है। उन्हें लगता है कि यदि वे महंगे गिफ्ट नहीं दे सकते, तो वे प्रेम करने के योग्य नहीं हैं। यह सोच न केवल सतही है, बल्कि रिश्तों को खोखला भी बना रही है। प्रेम का सबसे बड़ा सौंदर्य उसकी सादगी में है जो बिना शोर के गहराई से जुड़ता है – न तो किसी दिन का मोहताज है, न किसी अवसर का। आज आवश्यकता है कि हम प्रेम को बाज़ार से वापस दिल तक ले जाएँ। उसे फिर से अनुभूति बनाएँ, न कि वस्तु। ‘नई सोच‌’ तब सार्थक होती है, जब वह मूल्यों को नष्ट न करे, बल्कि उन्हें नए संदर्भ में जीवित रखे। वैलेंटाइन डे मनाने में कोई बुराई नहीं, बशर्ते हम यह न भूलें कि प्रेम केवल उसी दिन नहीं, बल्कि हर दिन किया जाना चाहिए। प्रेम का मूल्य उपहार की कीमत से नहीं, भावना की गहराई से आँका जाना चाहिए। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि प्रेम खरीदने की चीज़ नहीं, जीने की कला है।

धन्यवाद
प्रदीप शुक्ल

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