संन्यासी बोर्डरूम में ? क्यों नहीं !

आराध्य भगवान दास,
कोलकाता

जब मुनाफ़ा ही मोक्ष बन गया, तो बोर्डरूम में साधु की कुर्सी क्यों न हो?

वर्तमान भारतीय उद्योग जगत आर्थिक विकास और लाभप्राप्ति के अधिष्ठान पर खड़ा है। निर्णय लेने वाले उच्च पदाधिकारी केवल आंकड़ों, निवेश, शेयरहोल्डरों और वित्तीय संवर्द्धन की सीमाओं में बँधकर रह गए हैं। इस प्रक्रिया में वह नैतिक विवेक, सामाजिक उत्तरदायित्व और दीर्घकालीन दृष्टि, जो किसी भी स्वस्थ समाज की नींव होते हैं, अनजाने में अवमूल्यित हो गए हैं। ऐसे समय में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि क्या केवल तकनीकी दक्षता और वित्तीय प्रवीणता से सामाजिक हित और राष्ट्र की नैतिक संरचना सुरक्षित रह सकती है? यही वह स्थान है जहाँ साधु और संत का मार्गदर्शन आवश्यक प्रतीत होता है—एक ऐसा मार्गदर्शन जो केवल लाभ की गणना से परे जाकर समाज और राष्ट्र के कल्याण का मापदंड स्थापित करे।

भारतीय संस्कृति का इतिहास स्पष्ट करता है कि साधु और संत केवल तपस्वी या संन्यासी नहीं रहे। वे समाज के नैतिक स्तम्भ और समय-समाज के निर्णायक मार्गदर्शक थे। राजा, प्रजा और समाज के बड़े निर्णय उनके विवेक और अनुशासन के बिना अधूरे माने जाते थे। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—“ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥” (गीता 18.41)। यहाँ प्रत्येक वर्ग का कर्तव्य स्पष्ट है, और साधु-संत का कर्तव्य मार्गदर्शन करना है, ताकि कर्म मात्र स्वार्थ या संकुचित लाभ के लिए न हो।

आज के उद्योगपति और कॉरपोरेट नेतृत्व मात्र आर्थिक लाभ और शेयरहोल्डर मूल्य वृद्धि तक सीमित दिखाई देते हैं। गीता में निर्देश है—“सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद् विद्वाँस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥” ज्ञानीजन अनासक्त होकर कर्म करते हैं, और उनका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि समाज और लोक कल्याण होता है। यही वह अंतर है जहाँ साधु और संत की उपस्थिति अनिवार्य प्रतीत होती है।

स्वामी विवेकानन्द स्पष्ट रूप से कहते हैं—“धन और सामर्थ्य साधन हैं, साध्य नहीं।” उनके अनुसार, व्यवसाय तब ही सार्थक है जब वह मानव सेवा और सामाजिक उत्थान का माध्यम बने। यदि कोई बहुराष्ट्रीय संस्था केवल लाभप्राप्ति के लिए कार्य करे, तो उसका विकास संकुचित और अस्थिर होगा; किंतु यदि वह सामाजिक और नैतिक दृष्टि से संचालित हो, तो उसका योगदान राष्ट्र और समाज की स्थायी उन्नति में भी दृष्टिगोचर होगा।

श्रील ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद ने कहा—“जनसमूह समाज के नेतृत्वकर्ताओं के आचरण का अनुकरण करता है। अतः समाज को एक आदर्श वर्ग की आवश्यकता है—ब्राह्मणों, संतजनों और संन्यासियों की।” वर्तमान समय में, जब कॉरपोरेट नेतृत्व सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवेश पर गहन प्रभाव डालता है, साधु और संत केवल आध्यात्मिक सलाहकार नहीं, बल्कि नैतिक प्रहरी के रूप में आवश्यक हो जाते हैं।

यहाँ विकसित भारत के आदर्श महत्वपूर्ण हो जाते हैं। विकसित भारत केवल तकनीकी प्रगति, आर्थिक वृद्धि या भौतिक साधनों तक सीमित नहीं हो सकता। यह वह भारत है जहाँ विकास के निर्णय में नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक मूल्य अंतर्निहित हों। यदि भारत 2047 तक वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना चाहता है, तो उसके विकास की परिकल्पना केवल भौतिक नहीं, अपितु आंतरिक और नैतिक भी होनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि साधु और संत कॉरपोरेट बोर्डों में निर्णय लेने वाले सदस्य बनें।

साधु और संत केवल परामर्श देने वाले नहीं हैं; वे नैतिक चेतक हैं। वे केवल आंकड़ों और विश्लेषण से नहीं, अंतरात्मा और विवेक से निर्णय सुझाते हैं। जब मुनाफ़ा ही मोक्ष बन जाए, तब वे हमें स्मरण कराते हैं कि लाभ और नैतिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन आवश्यक है। यही संतुलन “विकसित भारत” की नींव का आधार है।

वर्तमान समय में, जब भारत डिजिटल इंडिया, हरित ऊर्जा और आर्थिक संवर्द्धन की दिशा में अग्रसर है, यदि नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि जुड़ी न हो, तो यह विकास केवल बाहरी और अस्थायी बनेगा। साधु और संत यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि देश का विकास केवल संख्या और लाभ तक सीमित न रहे; उनके मार्गदर्शन में व्यवसाय केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण का माध्यम बन जाएगा।

यदि कोई पूछे कि “बोर्डरूम में साधु या संत का क्या योगदान हो सकता है?”, तो उत्तर स्पष्ट है—सही निर्णय लेना, दीर्घकालीन दृष्टि रखना और समाज तथा राष्ट्र के प्रति नैतिक जिम्मेदारी निभाना। वे केवल प्रार्थना या आध्यात्मिक अनुष्ठान नहीं कराएँगे; वे हमें याद दिलाएँगे कि जब मुनाफ़ा मोक्ष बन जाए, तब भी असली समृद्धि केवल लाभ में नहीं, बल्कि विवेक, न्याय और कल्याण में निहित है।

आज के बोर्डरूम में साधु और संत की उपस्थिति केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि चेतावनी, मार्गदर्शन और नैतिक स्तम्भ का रूप धारण कर सकती है। यही “विकसित भारत” की परिकल्पना का सार है—एक ऐसा भारत जहाँ मुनाफ़ा मोक्ष न बने, बल्कि नैतिक विवेक, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवता के हित के साथ आगे बढ़े।

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