पैरासिटामोल से कैंसर नहीं ठीक होता — जलवायु संकट को समझिए, नजरअंदाज मत कीजिए

समकित जैन, इंदौर

हम भारतीय अक्सर कहते हैं – “अब मौसम पहले जैसा नहीं रहा।” यह वाक्य अब सिर्फ बातचीत का हिस्सा नहीं, बल्कि सत्य का संकेत बन चुका है। पर, क्या आपने कभी इस बदलाव को गहराई से समझने की कोशिश की है ?

मौसम और जलवायु में फर्क वही है, जो मिज़ाज और स्वभाव में होता है। मौसम रोज़ बदल सकता है — कभी धूप, कभी बारिश, कभी ठंड। लेकिन जलवायु धीमे-धीमे बदलती है, दशकों में, सदियों में। आज जो हो रहा है, वो सिर्फ मौसम का नहीं, जलवायु का असामान्य और खतरनाक परिवर्तन है।

सिर्फ 5-10 साल पहले की तुलना करें — गर्मियां अब कहीं ज्यादा लंबी, तेज़ और असहनीय हो गई हैं। ठंडी का चक्र छोटा हो गया है। बादल कहीं बिना मौसम बरस जाते हैं तो कहीं महीनों तक नदारद रहते हैं। यह सिर्फ प्राकृतिक बदलाव नहीं है, यह हमारे खुद के किए हुए कार्यों का परिणाम है।

अक्सर जलवायु परिवर्तन के लिए फैक्ट्रियों, कारखानों और बिजली घरों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि इनका उत्पादन हमारी मांग पर आधारित है। जैसे बाजार में ज़हर भी बिकता है और दवा भी, लेकिन हम ज़हर नहीं खरीदते। उसी तरह कार्बन उत्सर्जन बढ़ाने वाले उत्पाद भी हम ही चुनते हैं — ज़रूरत से ज्यादा एसी, फास्ट फैशन, बार-बार मोबाइल बदलना, कार से हर छोटी दूरी तय करना — ये सब हमारी अपनी आदतें हैं।

इंदौर के प्रो. चेतन सोलंकी इसी सच्चाई को सामने लाने के लिए ‘एनर्जी स्वराज आंदोलन’ चला रहे हैं। वह कहते हैं, “अगर हम इस पृथ्वी को बचाना चाहते हैं, तो हमें ऊर्जा का उत्पादन ही नहीं, बल्कि उसकी खपत भी नियंत्रित करनी होगी।”

हमें लगता है कि इलेक्ट्रिक वाहन और सोलर पैनल जैसे उपाय समाधान हैं। लेकिन क्या आपने सोचा है कि इन वाहनों को चलाने वाली बिजली कहाँ से आती है ? भारत में आज भी लगभग 70% बिजली कोयले से बनती है। यानी ई-व्हीकल हो या स्मार्ट एसी, अगर हम सोच-समझकर इन्हें इस्तेमाल नहीं करेंगे, तो समाधान के नाम पर समस्या ही बढ़ेगी।

उदाहरण के लिए — एक घर में पहले एक एसी था, उन्होंने सोलर पैनल लगाकर बिजली बनाई और दो और एसी जोड़ दिए। इससे ऊर्जा की खपत घटने के बजाय और बढ़ गई। यहीं पर हमें समझने की ज़रूरत है कि तकनीक समाधान तभी है जब उपभोग सीमित हो।

हमारा देश कृषि पर आधारित है, और जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा असर किसानों पर होता है। बारिश के चक्र के बिगड़ने से फसलें खराब होती हैं, जलस्रोत सूखते हैं, और आम लोगों का जीवन कठिन हो जाता है।

भारत की बढ़ती आबादी, शहरीकरण और संसाधनों की होड़ ने प्रकृति पर भारी दबाव डाला है। ऐसे में हर भारतीय को अपने स्तर पर बदलाव करना होगा।

यह सिर्फ सरकार का काम नहीं, हम सब भी ज़िम्मेदारी है जलवायु परिवर्तन कैंसर की तरह है — और इसे पैरासिटामोल जैसी मामूली कोशिशों से ठीक नहीं किया जा सकता। इसके लिए व्यवस्था, समाज और व्यक्ति — तीनों स्तरों पर क्रांतिकारी बदलाव की ज़रूरत है।

प्रोफेसर चेतन सोलंकी की ही तरह हमें भी अपनी जीवनशैली को ‘ऊर्जा अनुशासित’ बनाना होगा। यह कोई तात्कालिक फैशन नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की ज़रूरत है।

धरती केवल हमारी नहीं, आने वाली पीढ़ियों की भी है। आइए इसे सुरक्षित, संतुलित और सुंदर  बनाएँ — अभी से।

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