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कोरोना काल में शिक्षा – janmaitri

कोरोना कल में शिक्षक, शिक्षा और शिक्षा पर प्रभाव

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कोरोना ने जीवन के हर पहलू को प्रभावित किया है। विश्व भर में कोविड महामारी के पैर पसारते ही सबसे पहले विद्यालयों एवं उच्च शैक्षणिक संस्थानों को बंद किया गया। इस दौरान हुए व्यापक लॉक डाउन में समय के अनुसार विभिन्न चरणों में ढील दी गयी पर शिक्षण संस्थानों के खोलने में यह बात नहीं लागू हुई।

आज हम इस बिंदु पर विचार करेंगे। लॉक डाउन के पहले दौर में जब शैक्षणिक संस्थान बंद हुए उस समय प्रबंधकों, अध्यापकों तथा विद्यार्थियों में कुछ समय के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति पैदा हुई। अस्तु इस आलेख के माध्यम से शिक्षा से जुड़े तीन मुख्य बिंदुओं की विवेचना करने का प्रयास किया गया है, जो कि निम्नवत हैं:-

शिक्षक
शिक्षण
शिक्षा

शिक्षक स्कूल-कालेजों के बंद होने पर सबसे पहले तो शिक्षकों की आजीविका तथा प्रबंधन की आय पर प्रभाव पड़ा। आरंभिक दौर में निजी क्षेत्र के संस्थानों में व्यापक स्तर पर छटनी की गई, पर कुछ अंतराल के उपरांत स्थिति में सुधार हुआ तो कुछ शिक्षकों को बहाल तो किया गया पर उनके वेतन में कटौती करके। यही बात जिन शिक्षकों की नौकरी नहीं गयी उनके वेतन पर भी लागू हुई। जिससे कि शिक्षकों की आजीविका के माध्यम पर गहरा प्रभाव पड़ा। मरता क्या न करता वाली स्थिति में फँसे शिक्षकगण इसका प्रतिरोध भी न कर सके।

आरंभिक झटके के उपरांत मानवीय जिजीविषा की शक्ति पुनः सतह पर आई और शिक्षण के क्षेत्र में ऑनलाइन पढ़ाई की शुरुआत हुई। कोविड संक्रमण से बचाव का उस समय यही एकमात्र उपाय था। इस दौरान न तो शिक्षक और न ही विद्यार्थी और उनके माता-पिता इस पद्धति के लिए तैयार थे। पर धीरे-धीरे शिक्षा से जुड़े सभी पक्ष इसके अभ्यस्त हुए। पर शिक्षकों पर इसका व्यापक और प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

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इसके दो महत्वपूर्ण कारक समझ में आते हैं; एक तो पारम्परिक शिक्षण पद्धति के अभ्यस्त शिक्षक यूँ तो कम्प्यूटर के थोड़े बहुत आदी तो थे पर वह ज्ञान पेपर सेटिंग, अंक तालिका बनाने एवं पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन तक ही सीमित था। पर अब ऑनलाइन कक्षाएँ चलाना उनके लिए एक नई चुनौती बन कर उभरा। इन परिस्थितियों में जो शिक्षक कम्प्यूटर साक्षर नहीं थे उनको भी अपने बच्चों व घरवालों की सहायता से सब कुछ नए सिरे से सीखना पड़ा। जिनके पास पहले से कम्प्यूटर या लैपटॉप नहीं थे उनपर इस बाबत इन विपरीत परिस्थितियों में अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी आया।

शिक्षकों के सम्मुख अगली चुनौती आयी कि बच्चों को ऑनलाइन क्लासेस में कैसे बाँधे रखना। क्योंकि माहौल में भिन्नता के कारण विद्यालय या कक्षा का अनुशासन यहाँ पर संभव नहीं था। साथ ही बच्चे भी इस तरह की पढ़ाई के अभ्यस्त नहीं थे और न ही हर घर में सभी के लिए अलग-अलग स्मार्ट फोन या लैपटॉप भी उपलब्ध थे।अतः वह एक अलग जद्दोजहद थी। इन सब कठिनाइयों के बीच किसी तरह सामंजस्य बिठा कर कक्षाओं को चलाना पड़ता था।

एक बार कक्षा खत्म हो गयी तो बच्चों को तो फुरसत मिल जाती थी पर शिक्षकों की जिम्मेदारी यहाँ से आगे भी थी। उनको अपने विद्यालय में अगले दिन के शिक्षण कार्य की रूप रेखा भी ऑनलाइन भेजनी पड़ती थी। जो काफी समय लेता था। इन सबके बीच सारा दिन सभी सदस्यों के घर पर रहने के कारण घरेलू कार्यों का अतिरिक्त बोझ महिला शिक्षकों पर पड़ा जिससे मानसिक तनाव भी बढ़ा और विभिन्न शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।

शिक्षण लॉक डाउन में ढील के बाद विद्यार्थियों को तो शिक्षण संस्थानों में जाने की अनुमति तो नहीं मिली पर शिक्षकों को कैम्पस में आकर क्लासरूम से ऑनलाइन कक्षाएं चलाने को कहा गया, जिसमें विद्यालय या संस्थान के संसाधनों का उपयोग होने लगा। जो अपने आप में एक नया अनुभव था।

इस दौरान सूचना तकनीकी उद्द्योग ने समय की आवश्यकता को समझा तथा कई तरह के ऐप विकसित हुए। जिनके द्वारा ऑनलाइन शिक्षण को आसान बनाने तथा शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच का संपर्क उन्नत करने का प्रयास किया।

इस लंबी समयावधि में जब पढ़ाई वर्चुअल माध्यम से हो रही है तो परीक्षाओं को भी उसी पद्धति से कराया गया तथा बच्चों की ग्राह्यता का आंकलन इसी माध्यम से किया जाने लगा।

लगातार घर के उन्मुक्त/ व्यवधान भरे वातावरण में रहने तथा विद्यालय न जाकर विद्यार्थियों के आपसी सामाजिक संबंध तथा शिक्षक-विद्यार्थियों के बीच खत्म हुए जुड़ाव ने विद्यार्थियों पर मनोवैज्ञानिक तौर पर दबाव डाला तथा कई बच्चे यहाँ तक कि वयस्क तथा शिक्षकगण भी डिप्रेशन का शिकार हुए। इस महामारी के मानव पर दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक प्रभावों का आंकलन अभी आना बाकी है।

शिक्षा कोविड काल में महामारी ने जीवन के हर क्षेत्र के साथ-साथ शिक्षा पर व्यापक एवं प्रतिकूल प्रभाव डाला। अध्यापक तथा विद्यार्थियों के बीच के व्यक्तिगत संबंधों का खत्म होना तथा 'मेंटरिंग' के अभाव से उनकी ग्रहण करने की क्षमता पर दुष्प्रभाव पड़ा। निचली कक्षाओं में तो परीक्षाएं विद्यालयों में ऑनलाइन ली गईं तथा उसी आधार पर आंकलन करके विद्यार्थियों को प्रोन्नत किया गया।

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पर असली समस्या दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं के समय आयी। राज्यों के शिक्षा परिषदों तथा केंद्रीय शिक्षा परिषद के समक्ष ऊहापोह की स्थिति बनी रही। स्थिति की गम्भीरता तथा इसके दूरगामी प्रभाव के परिप्रेक्ष्य में अंततः देश के प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा और उनके द्वारा बुलाई गई मीटिंग के उपरांत विद्यार्थियों के विगत तीन वर्षों के प्रदर्शन के आधार पर एक तय किये गए फार्मूले के आधार पर दसवीं तथा बारहवीं कक्षा के परिणाम घोषित किये गए। कमोबेश इसी तर्ज पर राज्यों की शिक्षा परिषदों ने भी अपने-अपने राज्यों में परिणाम घोषित किये। यह प्रयोग कितना सफल रहा यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

दसवीं एवं बारहवीं कक्षा की परीक्षाओं की तरह ही इंजीनियरिंग संस्थानों तथा मेडिकल संस्थानों की राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली प्रवेश परीक्षाओं यथा; जे ई ई तथा एन ई ई टी प्रवेश परीक्षाओं के आयोजन में भी समस्या आयी। जिनका आयोजन अंततोगत्वा कम्प्यूटर बेस्ड टेस्ट (CBT) माध्यम से हुआ।

विद्यार्थियों के लंबे समय तक शैक्षणिक संस्थानों से दूर रहने के व्यापक प्रभावों का परिणाम तो भविष्य में शोधों द्वारा ही पता किया जा सकेगा। पर इतना तो तय है कि शिक्षण संस्थान ने केवल शिक्षा प्रदान करने के माध्यम हैं अपितु ये विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास का माध्यम हैं। जिनमें खेल-कूद, आपसी सामंजस्य, सहभागिता, नेतृत्व क्षमता आदि का विकास शामिल है और वैश्विक महामारी ने इन सब पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। पर इन सबसे ऊपर एक सुनहरा पक्ष उभरा है वह है 'मानवीय जिजीविषा तथा आपदा में अवसर' तलाशने की क्षमता का प्रदर्शन जो निश्चय ही एक सुखद आयाम है।

कर्नल प्रवीण त्रिपाठी(से.नि.)
नोएडा

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