ओ बासंती पवन हमारे घर आना

जग वसन्त की अगवानी में बाहर निकला,
सरस्वती मां ठौर-ठौर पर पड़ी दिखाई।
प्रज्ञा की उस देवी का अभिनन्दन करने,
आस्तिक नास्तिक सभी झुक गए माँ मुस्काई।।
वसन्त पंचमी एवं सरस्वती पूजन के मौके पर नागार्जुन रचित उपर्युक्त पंक्तियाँ बार-बार याद आती हैं। इसी कविता की अगली पंक्तियों में कवि ने देवी सरस्वती से जो कहलवाया है, वह लक्ष्मी सरस्वती में परस्पर बैर वाली प्रचलित मान्यता से विपरीत सार्थक चिन्तन है। प्रज्ञा की देवी सरस्वती अपने उपासकों से कहती हैं –
बोली-बेटे लक्ष्मी का अपमान न करना
जैसी मैं हूँ, वह भी वैसी माँ है तेरी
धूर्तों ने झगड़े की बातें फैलाई हैं
हम दोनों ही मिल-जुलकर संसार चलातीं।
बुद्धि और वैभव दोनों यदि साथ रहेंगे
जनजीवन का यान तभी आगे निकलेगा ।।
विद्या की देवी सरस्वती एवं धन-सम्पत्ति की देवी लक्ष्मी के मेल से जीवन के विकास का यह भाव तब जागृत होता है, जब हम उत्फुल्ल चित्त से अपने मन की अंधेरी कोठरी से बाहर आते हैं। रचनाकार ने ऋतुराज वसंत के स्वागत का परिवेश उपस्थित करते हुए विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का महत्वपूर्ण संदेश हमें प्रदान किया है।
माँ भारती के वरद पुत्र कविगणों को वसन्त का आकर्षण सर्वाधिक लुभाता है। वसन्त के आगमन, वसनत की व्याप्ति, वसन्त के प्रभाव आदि का मोहक वर्णन उन्मुक्त भाव से प्रचीन एवं नवीन सभी कवियों ने किया है। कवि-सम्राट गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ को वसन्त का आगमन नयी उमंगों-आशाओं से आपूरित कर देता है-
पृथ्वी ने काया पलटी है, बन रहा एक संसार नया,
दुनिया को मिलनेवाला है, नवजीवन का अधिकार नया।
फैलेंगे नये विचार और जारी होगा व्यवहार नया,
जीवन-वन में आए वसन्त, हो जाय परस्पर प्यार नया।।
वसन्त उस ऋतु का नाम है जिसके आगमन से सब कुछ बदल जाता है, आकर्षक हो जाता है। जब वातावरण सुगंध से भर जाय; पेड़-पौधे, खेत-खलिहान, नदी, पर्वत, वन-उपवन, लता-पुष्प-पल्लव-सभी सुन्दर रूप धारण कर लें; प्रकृति अपने सर्वोत्तम स्वरूप में विमुग्ध करने लगे; आत्मीय का वियोग जब सालने लगे और संयोग का सुख द्विगुणित हो जाय, तब समझ लेना चाहिए कि वसन्त का आगमन हो चुका है। वसन्त की व्याप्ति और प्रभाव का सुन्दर वर्णन किया है रीतिकालीन कवि ‘पद्माकर’ ने-
औरे भांति कुंजन में गुंजरत भौंर भीर
औरे दौर झौरन में बौरन के ह्वै गये ।।
कहै ‘पद्माकर’ सु औरे भाँति गलियान,
छलिया छबीले छैल औरे छबि छ्वै गये ।।
औरे भांति बिहग-समाज में अवाज होति
ऐसे ऋतुराज के न आन दिन द्वै गये।
औरै रस औरै रीति औरै राग औरै रंग
औरै तन औरै मन औरै बन ह्वै गये।।
यानी प्रकृति में, जीवन में, तन में, मन में पहले जो था- उससे अलग, मोहक प्रतीत होने लगे, तो जान जाना चाहिए कि ऋतुपति वसन्त ने दस्तक दे दी है। आधुनिक काल के प्रमुख हिन्दी कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने ‘आये महन्त वसन्त’ शीर्षक रचना में जो सौंदर्यांकन किया है, वह बेजोड़ है –
‘खड़-खड़ करताल बजा, नाच रही बिसुध हवा
डाल-डाल अलि-पिक के, गायन का बँधा समां
तरु-तरु की ध्वजा उठी, जय-जय का है न अन्त
आये महन्त वसन्त।’
सर्वेश्वर के ‘महन्त वसन्त’ बरबस याद दिला देते हैं, रीतिकालीन कवि देव के ‘बालक बसन्त’ की। उपवन में द्रम-डाल के झूले पर, कोमल नव-पल्लव के बिछौने पर, फूलों का झिंगोला पहने सो रहे कामदेव के बालक वसन्त की परिकल्पना सम्मोहक है। छंद का चरम भाव अंतिम पंक्ति में व्यक्त हुआ है। अविस्मरणीय है देव का यह छन्द –
डार-द्रुम पलना बिछौना नव-पल्लव के
सुमन झिंगोला सोहै तन छवि भारी दै।
पवन झुलावै, केकी-कीर बतरावें देव
कोकिन हलावै, हुलसावै कर तारी दै।।
पूरित पराग सों उतारा करें राई नोन
कंजकली नायिका लतान सिर सारी दै।।
मदन महीप जू को बालक बसन्त,
ताहि प्रातहिं जगावत गुलाब चटकारी दै।।
गुलाब की कली प्रस्फुटित होकर जब पुष्प में रूपान्तरित होती है, उस क्षण-विशेष की न सुनी जा सकने वाली ध्वनि को संवेदनशील कवि ही सुन सकता है। देव की यह कोमल परिकल्पना वासंती परिवेश के अनुरूप होने के कारण अप्रतिम है। कोलकाता के वरिष्ठ गीतकार छविनाथ मिश्र ने ‘सर्वं प्रिये चारुतरं वसन्ते’ गीत में सुकोमल भावों को पिरोकर जो काव्य-सौन्दर्य प्रस्तुत किया है, वह अत्यंत मोहक एवं चित्ताकर्षक है –
मधुवन्ती किरणों ने / फूलों की पंखुरी पर, जीने का छन्द लिखा
ओठों पर प्यार भरा कोई अनुबन्ध लिखा।
आँखों में ऋतु-गंधी आसमान तैर गया-दूर कहीं, खिले-खुले कमल वन गमकते।
सर्वं प्रिये चारुतरं वसन्ते।
परन्तु जीवन की जटिलताओं से जूझते मनुष्य को, आपाधापी से भरे जीवन में अनवरत संघर्ष करते व्यक्ति को वसंत का स्वागत करने का सौभाग्य कहाँ मिल पाता है। उसकी स्थिति को भाँपते हुए गीतकार वीरेन्द्र मिश्र कह उठते हैं- ‘भूरे-मटमैले हैं पर्णहीन सपने / जैसे हैं, जो कुछ हैं, हैं तो ये अपने ।। इन पर रसगंध लहलहाना-मालिनी वसन्ती।’
‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की मंत्र की मूल भावधारा को वसन्त आगमन के साथ जोड़कर जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ मानव मात्र के आनंद-उल्लास की कामना करते हैं। कवि को प्रतीक्षा है ऐसे वसन्त की, जब हर देशवासी रोटी कपड़ा-मकान की मूलभूत जरूरतों को हासिल कर ऋतु के उल्लास में शामिल हो सके। उनका सरल-स्वाभाविक प्रश्न है –
ऐसा वसन्त कब आएगा।
जब मानवता के वन-उपवन का, हर प्रसून खिल जाएगा।।
सबको दे भोजन-वसन-भवन, जिससे जीवन में रस आए
खिल जायँ अधर, हँस दें आँखें, ऐसा वसन्त जग में आए
ऐसा वसन्त तो ग्रीष्म-शिशिर में भी वसन्त कहलाएगा।
जब निराशा और वेदना घनीभूत होकर जीवन-उपवन को पतझर की भांति निष्प्रभ कर दे, आत्मीयता का अभाव अंतर्मन को गहरी वीरानी से भर दे; तब उमंग, उल्लास एवं प्रेम की वासंती-बयार ही जीवन में बहार ला सकती है, कोयल की कूक ही दिल की हूक को मिटा सकती है। कितनी हृदयस्पर्शी हैं गीतकार कुँअर बेचैन की ये पंक्तियाँ –
पतझर ही पतझर था मन के मधुवन में
गहरा सन्नाटा-सा था अन्तर्मन में
लेकिन अब गीतों की स्वच्छ मुंडेरी पर
चिंतन की छत पर ख्वाबों के आँगन में
बहुत दिनों के बाद चिरैयाँ बोली हैं,
ओ बासन्ती पवन हमारे घर आना।
बहुत दिनों के बाद खिड़कियाँ खोली हैं,
ओ बासन्ती पवन हमारे घर आना ।।
सामयिक संदर्भों से युक्त गीतों की रचना के कारण रमानाथ अवस्थी की विशिष्ट पहचान है। जातिगत वैमनस्य, साम्प्रदायिक विद्वेष, पारस्परिक विभेद से ऊपर उठकर प्रेम के निष्कम्प दीप को प्रज्ज्वलित रखना ही हर सर्जक का मूल ध्येय होता है। वासन्ती उल्लास घर-घर में आनन्द की व्याप्ति करे, प्रभु से यही प्रार्थना करते हुए रमानाथ जी कहते हैं –
धरती के ऊपर आकाश के तले
प्रतिपल निष्कंप प्यार का दिया जले
आओ हम वन्दना करें।
नफरत की आँधी का अंत हो यहाँ
बस्ती बस्ती सदा वसंत हो यहाँ
आँगन-आँगन में आनंद हो यहाँ
आपस में खींचतान बन्द हो यहाँ।
इस गीत में कवि ने ‘हर चेहरा हम सबको राम सा लगे / हम सबके भीतर वाला देवता जगे’ कहकर अभिव्यक्ति को प्रभावशाली बना दिया है।
वसन्त केन्द्रित एक छंद में जगदम्बा प्रसाद ‘हितैषी’ की भावाभिव्यक्ति रेखांकित करने योग्य है :
मधुपों ने कहा, जन माधव के हम,
प्यार हमारा वसन्त पे है।
पतझार के मारे द्रुमों ने कहा,
कि सँभार हमारा वसन्त पे है।।
सुमनों ने कहा नही स्वत्व, तो
सर्वप्रकार हमारा वसन्त पे है।
किया घोष पुकार के कोकिला ने,
अधिकार हमारा वसन्त पे है।।
कवि निराला ने देवी सरस्वती की आराधना करते हुए ‘नवगति, नवलय, ताल-छंद नव’ कहकर प्रत्येक क्षेत्र में नवीनता की आकांक्षा व्यक्त की थी। उसी मुद्रा में ऋतुराज वसन्त का अभिनन्दन करते हुए भगवती चरण वर्मा ने जो कामना की है, उसे गुनगुनाते हुए हम सब भी वसन्त की अगवानी करें –
तुम नयी स्फूर्ति इस तन को दो,
तुम नयी चेतना मन को दो।
तुम नया ज्ञान जीवन को दो,
ऋतुराज तुम्हारा अभिनन्दन ।।
