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प्रगति के अवशेष समेटो (8th Edition) – janmaitri

प्रगति के अवशेष समेटो

amit-mishra

अमित मिश्रा, सरायकेला

प्रगति उतनी ही आवश्यक है जितना कि देश। भारत की आजादी के पश्चात अब तक कई महत्वपूर्ण प्रगतिवादी क्रांतियां हुई हैं। कृषि, वाणिज्य को आत्मनिर्भर बनाने वाली दुग्ध क्रांति, मत्स्य क्रांति इत्यादि। आज समंदर से जुड़े उद्योगों को तलाशा जा रहा है। मोती उत्पादन, खनिज – तेल – गैस उत्पादन इत्यादि अन्य विभिन्न स्तरों पर खोज व नियोजन पनप रहे हैं। सभी तरफ बाजार और पैदावार मांग – पूर्ति को लक्ष्य करके आधुनिकता की सबलता में अर्थवाद को पोषती हुई आर्थिक संतुलन को बनाए रखने के प्रति प्रतिबद्ध दिख रही हैं। परन्तु विकास की दौड़ में प्रकृति के साथ सामंजस्य टूटता जा रहा है। विभिन्न कल – कारखानों ने चिमनियां खोल, वातावरण में प्रदूषण घोल दिया है। बढ़ते वाहनों ने भी प्रदूषण मानकों की अनदेखी की है। धुएं और कचड़े ने सांसों में बीमारी भर दी है और नदियों का स्वास्थ्य गिर गया है। एक बहुत बड़ी आबादी व क्षेत्रफल में, जहां उत्तर भारत की गंगा नदी के किनारे बसे नगरों, कसबों तथा गांवो में पूर्णतः गंगा नदी के पानी पर दिनचर्या निर्भर करती है, किनारे खड़े हरे – भरे क्षेत्र विषाक्त हो गए हैं। पर्यटन क्षेत्र में इजाफा का स्तर निम्नतम होता जा रहा है। गंगा नदी न हमें जीवन जल देती है, बल्कि पुरातन समय से सभ्यता को जन्म देने वाली गढ़ भी मानी जाती रही है। नदियां भारत के लिए न केवल उपजाऊ मिट्टी का स्रोत हैं, बल्कि लोगों की धार्मिक मान्यताओं के लिए भी महत्वपूर्ण रही हैं। हिंदू अपने संस्कार इस नदी पर सम्पन्न करते आ रहे हैं, पर इनमें भक्ति तलाशने वाले आज कचड़ा फैलाए जा रहे हैं।

जनसंख्या की बढ़ती मुश्किलों को गंगा नदी एक निकास द्वार की तरह दिखती है। इस नदी के सहारे अपनी रोजी – रोटी चलाने वाले मछुवारे, टूरिस्ट गाइड, गंगा जल को बेचने वाले, नाविक, कृषक आदि इस नदी की अनदेखी कर रहे हैं। नेता इसकी स्वच्छता, निर्मलता के प्रति उदासीन हैं। नदी बचाओ उतना ही जरूरी है जितना देश बचाओ और प्रगति बढ़ाओ का नारा। इसकी ओर लापरवाह होने का सीधा अर्थ है – एक बड़ी आबादी को बीमार बनाना, भूखे – मारना और देश की अर्थतंत्र को सुखा देना। चूंकि गंगा न केवल जल देती है, बल्कि यह जड़ी – बूटी युक्त औषधि – अमृत भी देती है, लाखों परिवारों को आय देती है और उनका घर चलाती है — यह रोजगार प्रदायनी गंगा हर मायने में ममता की शुद्ध धारा बहाते रहती है और अपनी संतानों को जिलाती – पिलाती एवं उन्हें भव – सागर पार कराती हुई भारत कि परम पावनी नदी कहलाती है।

पर, जो दुर्दशा आज प्रगति और अर्थ गति के दौर में इसके साथ इनकी संतानों ने किया है, वो हर लिहाज से बेहद ही नकारात्मक है। बहता हुआ गंदा नाला जिसका मुख गंगा नदी में खोल दिया गया है, कल – कारखानों का अवशिष्ट निकास जिसका मुख गंगा नदी में खोल दिया गया है, चमड़ा – उद्योग खासकर, घरों का मलीन पानी जिसकी नाली गंगा की पवित्र धारा पर गिर रही है, शहर भर का कचड़ा गंगा के तट पर ला कर जमा कर दिया गया है, जगह – जगह पानी सड़ा और जहरीला हो गया है, विषाक्त जीवाणु – रोगाणु जल में पनप रहे हैं, छिड़काव, रख – रखाव की सुध कोई न लेने वाला है। केवल गंगा नदी को सब स्वार्थ साधने के लिए जगह जगह भीड़ बढ़ाए – उपयोग करके दूषित कर रहे हैं। भारत की सर्वाधिक जनसंख्या ऐसे उत्तम प्रदेश कहलाने वाले उत्तर – प्रदेश में रहने की आदी हो गई है। मक्खी – मच्छड़ बीमारी की सौगात लिए घर – घर भेंट – वार्ता करते भिनभिनाते बेधड़क आते – जाते रहते हैं, जमा और प्रदूषित नदी में मौज मनाते हैं। जनता – नेता, पंडे – पुरोहितों, जजमानों, यजमानों, धार्मिक श्रद्धालुओं को यह याद दिलाते हैं, कि यह नदी अब हमारा अड्डा है, जहा शुद्धता सरकारी कागजी गड्ढा है, खाना – पूर्ति और अपनी – अपनी रोटी सेंकना यह भारत की अर्थवाद में राजनीति का खेल भद्दा है।

इस गन्दगी को हटाओ, देश में प्रगति के पश्चात – फैले कचड़े को मिटाओ वरना जो है उससे भी हाथ धो बैठोगे। गंगा नदी की तरह खुद भी एक दिन रो बैठोगे। गंगा की पवित्रता को न करो खराब / हर गंगा निवासी ले अपने – अपने श्रेत्र में प्रगति के साथ स्वछता का हिसाब। पारदर्शी रहे नेता, कार्यकर्ता करे जांच / जीवन में अर्थवाद के साथ गंगा नदी को न आये आंच। गंगा का भी उद्धार हो, खुद सबको तारने वाली गंगा आज लोगो के द्वारा तार – तार कर दी जा रही है। लोगों ने गंगा नदी के प्रति जो रवैया अपनाया हुआ है वो उसकी सुबह – शाम की आरती के बनिस्पत उनकी मलिन हो रही श्रद्धा का काला मन खोलता है, जिसे गंगा का जल भी नहीं धो पा रहा है।

अतः आंतरिक शुद्धि गंगा स्नान से कहीं अधिक महत्व निष्ठा का है, जिस देश में नैष्ठिक आचरण का पतन विकास के शिखर से गिरकर हो रहा हो उस देश की नदियों का जीवन हाशिये पर है। अतः उम्मीद के साथ गंगा की निर्मलता लोगों के मन – भाव को तारे, उन्हें अपनी प्राकृतिक धरोवर को बचाने वाली मानव बुद्धि से तर करे। जिस गंगा को भागीरथ ने कठिन तप द्वारा इस धरा में अवतरित किया उसकी महान विरासत भागीरथी प्रयास से संरक्षित हो प्रदूषित नहीं, अपितु  अदूषित  हो…..

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