ज़िन्दगी यू चलती रहे

राकेश मणि त्रिपाठी , मुंबई

जिन्दगी यूँ चले यूँ ही चलती रहे,
लौ तुम्हारी सदा यूँ ही जलती रहे।।

पुष्प सा मैं सदा यूँ ही खिलता रहूँ,
दोसती कंटकों से भी निभती रहे ।।

चाह अमृत की मन में सभी के लिए,
बूँद विष की मुझे यूँ ही मिलती रहे ।।

द्वेष के अग्नि में मैं सदा क्यूँ जलूँ,
राग की चासनी यूँ ही घुलती रहे ।।

अन्तरों में मिले साज जीवन का नित,
गान की धुन सदा यूँ ही बजती रहे।।

दूर करता रहूँ सब विकारों को मैं,
दूरियाँ नित सदा यूँ ही घटती रहे ।।

आपकी छाँव में मैं सदा ही जियूँ,
ये चमक ये ललक यूँ ही बढ़ती रहे ।।

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