गारेया

अशोक शंकर त्रिपाठी,
कोलकाता

बचपन में हमारे घरों के आंगन, चबूतरों पर एक छोटी सी चिड़िया फुर्र से आकर बैठ जाती थी। वह दाने चुगती, चहचहाती और फिर उड़ जाती। यह चिड़िया थी गौरैया। बचपन में इसे देखना बहुत अच्छा लगता था। बड़े लोग कहते थे जहां गौरैया रहती है वहां खुशहाली रहती है। लेकिन आज गांवों और शहरों में गौरैया पहले जैसी नहीं दिखाई पड़ती। यह खेद की बात है, क्योंकि गौरैया हमारे आस पास रहने वाली सबसे प्यारी और उपयोगी चिड़ियों में से एक है।

गौरैया को घरेलू चिड़िया भी कहा जाता है, क्योंकि यह घरों के अन्दर भी घोंसले बना कर रह लेती है। यह मानव एवं प्रकृति के लिए बहुत उपयोगी है क्योंकि यह कीड़ों को खाती है, जिससे कीड़े पौधों को हानि नहीं पहुँचा पाते हैं। यह नन्ही सी चिड़िया पर्यावरण के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इसके अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि गौरैया का अपने घर में आना हमारे लिए शुभ होता है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि यह चिड़िया शांति और स‌द्भावना का संदेश लेकर आती है।

विश्व गौरैया दिवस नन्ही घरेलू और अन्य पक्षियों को समर्पित है। गौरैया कि संख्या में हो रही उत्तरोत्तर कमी के विषय में जागरूकता पैदा करना और लोगों को इन परिचित पक्षियों की रक्षा करने / प्रश्रय देने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु यह दिवस प्रतिवर्ष 20 मार्च को मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का उद्देश्य गौरैया संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करने और उसके लिये अपने घरों के आस पास के वातावरण को इन नन्हे पक्षियों को आकर्षित करने योग्य बनाना है। इस दिवस (20-मार्च-2026) ने एक बार पुनः विश्व को याद दिलाया कि आम पक्षियों की भी देखभाल और उनपर ध्यान देने की आवश्यकता है। कभी उपेक्षित समझी जाने वाली गौरैया अब कई गाँवों और शहरों से विलुप्त हो रही हैं जो इस दिन को नित्यप्रति की जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य के प्रति चिंता का प्रतीक बनती हैं।

गौरैया को प्रश्रय देने के उ‌द्देश्य से हम अपने घर की बालकनी में उन्हें आकर्षित करने के लिए मिट्टी के बर्तन में चावल और पानी प्रातः ही रख देते हैं और रात में उन बर्तनों को उठा कर साफ करते हैं और अगले दिन यही प्रक्रिया पुनः दोहराते हैं। दिन भर में कई बार गौरैया आती हैं, दाना चुगती हैं और फुर्र से उड़ जाती हैं पर उनकी संख्या में निरन्तर गिरावट आ रही है।

पिछले वर्ष अपने ऑस्ट्रेलिया प्रवास के मध्य हमने वहां भी इस प्रक्रिया को चालू किया और यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां भी गौरैया आने लगीं और उनकी संख्या में उत्तरोत्तर प्रगति होने लगी जो किसी किसी दिन 10-12 तक पहुंच जाती थी, सम्भवतः वहां खुले आंगन और साथ में छोटे छोटे पेड़ पौधे उन्हें अत्यन्त आकर्षित करते थे। हाँ ! इस प्रक्रिया में यह अवश्य हुआ कि प्रतिदिन लगभग 100 ग्राम चावल के उपभोग की वृद्धि हो गई, क्योंकि गौरैया के साथ साथ अन्य पक्षी पेटुकी, मैना, आदि भी आने लगीं।

गौरैया मानव इतिहास के सबसे परिचित पक्षियों में से एक है। वे घरों, खेतों बाजारों और शहरी सड़कों के पास पाई जाती हैं। उनकी परिस्थिति यह प्रकट करती है कि किस क्षेत्र में अभी भी पर्याप्त भोजन, सुरक्षित घोंसले बनाने का स्थान और मूलभूत पारिस्थितिक संतुलन विद्यमान है। गौरैया की मधुर चहचहाहट कई देशों में सुबह और शाम के जीवन का अभिन्न अंग रही है। गौरैया छोटे, फुर्तीले पक्षी होते हैं जो 4 से 7 इंच तक लंबे होते हैं। उनका गोल शरीर और छोटी शक्तिशाली चोंच होती है। उनके पंखों पर धारियाँ या गहरे भूरे और हल्के सफेद रंग के धब्बे होते हैं। आज भी बच्चे जब कुछ समझने लगते हैं तो उन्हें अपने घर आँगन में जो पक्षी सबसे अधिक देखने को मिलता है वह नन्ही चिड़िया गौरैया होती है। यह चिड़िया बचपन में हमारी साथी बन जाती है जो बच्चों के आस पास घूमती रहती है और अपनी मीठी आवाज से उन्हें आकर्षित करती रहती है। गौरैया कई बार बच्चों के हाथ से खाने की वस्तु भी झपट कर ले जाती है। छोटे बच्चे उन्हें पकड़ने के लिए उनके पीछे दौड़ते हैं और वो फुर्र से उड़ कर ऊपर बैठ जाती हैं। गाँवों देहातों में यह आज भी देखने को मिल जाता है पर नगरों में ऐसा दृश्य कदाचित ही कहीं देखने को मिलता होगा।

गौरैया को मनुष्यों के आस पास रहना भाता है। यह प्रायः हर प्रकार की जलवायु में रहती है पर पहाड़ी स्थानों में कम दिखाई देती है। नगरों, कस्बों, गाँवों और खेतों के आस पास यह बहुतायत में पाई जाती है। नर गौरैया का ऊपरी भाग, नीचे का भाग और गालों का भाग भूरे रंग का होता है। गला, चोंच और आँखों पर काला रंग होता है। मादा के सिर और गले पर भूरा रंग नहीं होता है। नर गौरैया को चिड़ा और मादा को चिड़ी या चिड़िया कहते हैं।

गौरैया पक्षियों के पैसर वंश की एक जीव वैज्ञानिक जाति है जो विश्व के अधिकांश भागों में पाई जाती है। आरंभ में यह एशिया, यूरोप, और भूमध्य सागर के तटवर्ती क्षेत्रों में पायी जाती थी पर मानवों ने इसे विश्व भर में फैला दिया है। यह मनुष्यों के समीप कई स्थानों पर रहती है। पिछले कुछ वर्षों में नगरों में इसकी घटती हुई संख्या पर चिंता प्रकट की जा रही है।

गौरैया को घरेलू चिड़िया भी कह जाता है क्योंकि ये घरों के अंदर भी घोंसले बनाकर रह लेती हैं। ये वनों और प्रकृति के लिए बहुत उपयोगी है क्योंकि ये कीड़ों को खाती है जिससे कीड़े पौधों को हानि नहीं पहुँचा पाते हैं। गौरैया ऐसी चिड़िया है जो पर्यावरण के लिए अति आवश्यक है।

आधुनिक स्थापत्य की बहु मंजिला भवनों में गौरैया को रहने के लिए स्थान नहीं मिल पाता। कभी बड़ी संख्या में हमारे साथ रहने वाली गौरैया अब धीरे धीरे कम होती जा रही है। मगर जीवन की भागदौड़ में किसी का ध्यान इनकी घटती संख्या की ओर नहीं जा रहा है। बच्चों की सबसे निकट रहने वाली मित्र गौरैया जिस शीघ्रता से कम होती जा रही है उससे लगता है आने वाले समय में ये कहीं विलुप्त न हो जाए। इसलिए हम सब को मिलकर गंभीरता से ऐसे प्रयास करने चाहिए जिससे गौरैया को सुरक्षा मिल सके और उनकी संख्या में फिर वृद्धि संभव हो सके।

आंकड़े बताते हैं कि विश्व भर में घर के आँगन में चहकने फुदकने वाली छोटी सी प्यारी चिड़िया गौरैया की आबादी में 60-80% की कमी आई है। ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी आफ प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स ने भारत से लेकर विश्व भर में अनुसंधानकर्ताओं द्वारा किये गए अध्ययनों के आधार पर गौरैया को रेड लिस्ट में डाला था। वहीं आंध्र विश्वविद्यालय द्वारा किये गये अध्ययन के अनुसार गौरैया की आबादी में करीब 60% की कमी आई है। ये कमी ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में हुई है। पश्चिमी देशों में हुए अध्ययनों के अनुसार गौरैया की जनसंख्या घटकर चिंतनीय स्तर तक पहुँच गई है जबकि State of India’s Birds SOIB Report 2023 के अनुसार पिछले 25 वर्षों में गौरैया की जनसंख्या कुल मिलाकर काफी स्थिर रही है। यद्यपि भारत में गौरैया कि संख्या में कमी आने की आम धारणा है। गौरैया के संरक्षण के प्रति जागरूकता को लेकर दिल्ली सरकार ने 2012 और बिहार सरकार ने 2013 से गौरैया को राजकीय पक्षी घोषित कर रखा है।

कभी हमारे घर-आँगन में गिरे अनाज खाने गौरैया फुर्र से आती थी और दाना चुग कर उड़ जाती थी। गाव में आज भी कई घरों में गौरैया आ रही है। गौरैया की संख्या में कमी के पीछे कई कारण है जिन पर लगातार शोध हो रहे हैं। गौरैया की संख्या में कमी के पीछे के कारणों में आहार की कमी, बढ़ता आवासीय संकट, कीटनाशक का व्यापक प्रयोग, जीवन शैली बदलाव, प्रदूषण और मोबाइल टावरों से निकालने वाले रेडिएशन को दोषी बताया जाता रहा है।

गौरैया के प्रजनन के लिए अनुकूल आवास में कमी को भी इसकी संख्या में कमी का एक कारण माना जा रहा है। कच्चे घरों को कान्क्रीट के जंगलों में परिवर्तित होने से नगरों में इनके प्रजनन के लिए अनुकूल आवास नहीं मिलते हैं। यही कारण है कि एक नगर के कुछ क्षेत्रों में ये दिखती हैं और कुछ में नहीं। गौरैया संरक्षण से जुड़े लोग कृत्रिम घर बनाकर गौरैया को प्रजनन के लिए आवास देने की पहल चला रहे हैं। इनमें गौरैया अंडे देने के लिए भी आ रही हैं।

जहां तक गौरैया का सवाल है यह मानवों की मित्र तथा किसानों की सहायक है। गौरैया मानवों के साथ रहते हुए उन्हें सुख शांति प्रदान करती है। बच्चों का बचपन इनके साथ खेलते हुए व्यतीत होता है। लेकिन हम मानवों ने ही इसे अपने से दूर कर दिया है। भारत में पक्षियों की कुल मिलाकर 1250 प्रजातियां हैं जिनमें से 85 प्रजातियां विलुप्त होने के निकट हैं जिसमें गौरैया का भी नाम भी है। गौरैया का सुरक्षित रखना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि ये खेतों की फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को खा लेती है जिससे किसान की उपज खराब होने से बच जाती है गौरैया अपना घोसला मानवों के निकट ही बनाती है जिससे उनके घोसले उजाड़ दिये जाते हैं। बढ़ता वायु प्रदूषण भी इन पक्षियों के लिए समस्या है इसलिए आवश्यक है कि हम अभी से ये समझने की कोशिश करें कि छोटी सी गौरैया हमारे जीवन के लिए कितनी महत्वपूर्ण है ऐसे में उसकी रक्षा हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। गौरैया को बचाने के लिए हम निम्नांकित छोटे छोटे उपाय कर सकते हैं:

1. घर के आस पास पेड़ पौधे लगाएं
2. छत, आँगन, या बालकनी में दाना पानी रखें
3. दीवार या पेड़ पर छोटे घोंसले (नेस्ट बॉक्स) लगाएं
4. प्रकृति और पक्षियों से प्यार करें।

यदि हम उपरोक्त उपायों को अपनाएंगे तो संभवतः एक दिन पुनः हमारे आँगन में गौरैया चहचहाती हुई दिखाई पड़ेगी, और जब वह पुनः फुर्र से उड़कर आएगी तो समझ लेना कि प्रकृति आनंदित हो रही है।

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