ज्ञान की दीपशिखा
डॉ रामानुज पाठक, सतना
ज्ञान की दीपशिखा जब मन में उजास भरती है,
तो जिज्ञासा की नन्ही चिंगारी भी आकाश छूती है।
हमने पढ़े थे जो सूत्र, वे अब स्पंदन बनकर बोले,
यंत्रों की नीरव भाषा में भी अर्थ के स्वर खुलकर डोले।
उपनिषदों की मौन तपस्या से जो चिंतन निकला था,
वही आज उपग्रह बनकर नभ में विस्तृत चक्र रचता है।
सूक्ष्म कण से लेकर अनंत ब्रह्मांड की परिधि तक,
एक ही सत्य की लय गूँजती है—ज्ञान से अनुभव तक।
यह यात्रा केवल पथ नहीं, आत्मा का विस्तार बनी,
हर प्रश्न की थरथराहट में संभावनाओं की झंकार बनी।
हमने देखा—विज्ञान कोई शुष्क तर्क नहीं होता,
यह तो स्वप्न, श्रम और साहस का जीवंत समवेत होता।
जिज्ञासा जब संकल्प बनकर भीतर ज्योति जगाती है,
तभी मानव की सीमित दृष्टि भी अनंत को अपनाती है।
उपनिषद से उपग्रह तक यह जो पुल निर्मित होता है,
वहीं भारत अपने भविष्य को स्वयं आकार देता है।
