भूलभुलैया है यह सारी दुनिया

डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी, गया

हम जो देख रहे हैं वह सच है, या कोई सपना है?
अपना जिसको कहते हैं हम, क्या वह सचमुच अपना है?
बात दूसरों की क्या करें, स्वयं का ही जब बोध नहीं?
जब तक मौत ना आ जाए, जीवन-राहों पर खपना है।

संघर्षों की सतत श्रृंखलाओं को जीवन कहते हैं।
खुशियों की चाहत में कितनी ही पीड़ाएँ सहते हैं।
पाने की अभिलाषा में, खोती जा रहीं नित्य श्वांसें।
चिंतन कभी, कभी चिंताओं की ज्वाला में तपना है।

भूलभुलैया है यह सारी दुनिया, हम सब भटक रहे।
रहकर धरती पर भी, सारे आसमान में लटक रहे।
कोई तो है ही जो हमें बना कठपुतली खेल रहा।
बता उसे नटवर नागर, नित नाम उसी का जपना है।

हम जो देख रहे हैं वह सच है, या कोई सपना है?
अपना जिसको कहते हैं हम, क्या वह सचमुच अपना है?

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