नव वर्ष
सीमा त्रिवेदी ‘साज’, नवी मुंबई
जाम हाथ में, शोर हवा में, आतिश की बौछार है।
पूछ ज़रा उस भूखे से क्या, उसको लगे त्यौहार है?
शुभकामना के संदेश से, इनबॉक्स भर जाता है।
सड़क किनारे ठिठुर रहा जो, वह क्या इक घर पाता है?
गाज़ा की जलती मिट्टी पर, मानवता जब मरती है।
‘वीटो‘ के तानाशाही में, कूटनीति तब पलती है।
धधके जब यूक्रेन की धरा, दुनिया बस चिल्लाती है।
लाल–लहू से ही दुनिया क्या, नूतन वर्ष मनाती है?
पाँच सितारा होटलों में जब, खाना फेंका जाता है।
कूड़ेदानों से तब कोई ,एक निवाला पाता है।
जाति धर्म के नारों से जो, नफरत बाँटी जाती है।
सत्ता के गलियारों में वह, फसलें काटी जाती है।
नया साल बाज़ार सजा है, बिकते सब जज़्बात यहाँ।
किश्तों पर खुशियाँ गिरवी हैं, गिरवी है औकात यहाँ।
तारीखें बस अंक बदलतीं, दृष्टि कब तुम बदलोगे?
भीतर नफरत पाल रखी है, बाहर कब तक भटकोगे ?
वही सूर्य है वही क्षितिज है, सोच नई करनी होगी।
चेतन के मृत भस्म चीरकर, नई ज्योति भरनी होगी।
वर्ष नवल तब माना जाए, जब भूगोल सिमट जाए।
बारूदों का ज़हर मिटे और, फ़सल अमन की लहराए।
नया साल तो तब आए जब, भूखी प्रजा न सोई हो।
मजदूरी की लाचारी में, कोई आँख न रोई हो।
शोषण की ज़ंजीरें टूटें, न्याय यहाँ हर द्वार मिले।
कोरे इस कैलेंडर को तब, एक सबल आधार मिले।
समय एक अविरल धारा है, नहीं कहीं रूक पाएगा,
बदल कैलेंडर नाचे जग पर, वक़्त बदल ना पाएगा।
दीप जले ग़र समता का तो, भाग्य सभी का जागेगा।
स्वयं दीप जब बनोगे राही, नया साल तब आएगा।
