हरा नोट

मुंबई
बाहर से आती हहराती हवा की आवाज मंगेश के कानों पर हथौड़ा सी बरसा रही थी। सावन की बरसती बूंदों ने भी हाहाकारी रूप सा धर लिया था। बीच-बीच में बिजली की गड़गड़ाहट रात की स्तब्धता को चीर दे रही थी। तभी सर पर पड़ी बूंद से चौक कर मंगेश ने सर उठाया, “कमबख्त कोठरी ने फिर से चूना शुरू कर दिया, जाने कब से मरम्मत मांग रही है छत। लेकिन कहां से कराएं ? पेट की रोटियों का जुगाड़ हो ले वही बहुत है।”
एक भगोना लाकर मंगेश ने टपकती छत के नीचे रख दिया। टन टन धातु पर बूंद के लगने से आवाज होने लगी। “थोथा चना बाजे घना, कंगाली का ढोल इसी तरह बजाओ ” – मंगेश बड़बड़ाया।
माँ एक कोने में खाट पर लेटी थी। आज तो मंगेश ने चाय बना कर भी बुढ़िया को नहीं दी थी। देता कहाँ से जेब खाली थी। जो पैसे पास थे उससे भांग की पुड़िया खरीद ली थी। रोज चाय न मिलने पर आवाज देती थी माँ लेकिन आज चुप है, शायद भूख की कमजोरी से बोल नहीं पा रही। कल नशे में रोटी भी तो नहीं बनाई उसने। उठा तो था लेकिन फिर सो गया था। उसने पास जाकर मां को आवाज़ दी, लेकिन वो कुछ न बोली। मंगेश एक कोने में रखे टूटे स्टूल पर बैठ गया रंग उड़ी दिवार जैसे उसे मुंह चिढ़ा रही हो। कोने में बंधी रस्सी पर धुले कपड़े टंगे हैं। मां की किनारीदार सफेद धोती भी तहाई रखी है, कल ही सुबह धोकर तहा कर रखा था उसने। अब तो करने को कुछ है नहीं। राशन है नहीं दूध चाय बनाने का जुगाड़ भी नहीं है। माँ को चाय पिलाने, खाना खिलाने में ही उसका भी पेट भर जाता था। आज तो दोनों का ही पेट भरने का जुगाड़ नहीं है।
उसने लेटी हुई मां की ओर देखा, बुढ़ापे से पोपला झुर्री से भरा मुंह, सिर्फ उम्र की ही विवशता या वेदना नहीं खुदी थी इस मुंह पर, लिखा था अपमान और अनादर का पूरा इतिहास। माँ ममता देवी जिन्होंने पति के शासन काल में न जाने कितनों को आश्रय दिया, पर खुद वृद्धावस्था में निराश इधर-उधर भटकती रही। चार-चार बेटों की मां होकर भी उनका बुढ़ापा बोझ हो गया था।
मंगेश को याद आया दो दिन पहले मां बड़बड़ा रही थी “मुझे भगवान भी नहीं पूछेंगे मेरी उन्हें भी जरूरत नहीं है, किसी को भी मेरी जरूरत नहीं है।”
मंगेश ने कहा भी बुड्ढी मुझे तो है तेरी जरूरत। तब माँ ने जिस दीनता भरी मुस्कान से उसे देखा तो मंगेश जैसे भीतर से हिल गया था। ऐसी मुस्कराहट जैसे स्केच बनाते समय आर्टिस्ट की पेंसिल टूट गयी हो और लकीर टेढ़ी हो गयी हो।
बुढ़ापा वाकई अभिशाप भी है, और खास कर एक ऐसी माँ के लिए जिसका जीवन सिर्फ उसके परिवार के इर्द गिर्द ही केन्द्रित रहा, एक माँ जो अपने परिवार का केंद्र थी। सारी जिंदगी बच्चों और पति की सेवा में समर्पित रही, लेकिन बुढ़ापा आते ही और पति के मरते ही उसकी जिंदगी बदल गयी। पति के मरते ही जायदाद बच्चों के नाम आ गई और उन्होंने तुरंत बेच कर रकम भी खड़ी कर ली। ममता देवी से किसी ने नहीं पूछा कि इस जमीन जायदाद को तिनके तिनके कर उन्होंने पति के साथ जोड़ा था, उसका क्या किया जाए। सच्चाई तो ये है कि कानून कितनी भी दुहाई दे दे, लेकिन इस समाज का कानून औरतों के लिए अलग ही है। सच में तो औरत का जीवन स्वतंत्र है ही नहीं बचपन में पिता पर आश्रित, जवानी में पति पर और बुढ़ापे में बच्चों पर उसका पूरा जीवन यूं ही कटता है, फिर भी सच्चा आश्रय उसे कहीं नहीं मिलता। जिस घर गृहस्थी को वह प्राण पण से जोड़ती है, उस पर तो बहुएं कब्जा कर लेती हैं फिर उसका घर कहां रहता है उसका अपना घर ? ममता देवी को पता ही नहीं चला कब वे घर से बेघर हो गयीं। उनका अपना घर, कितने जतन से जोड़ी गयी गृहस्थी। उनके पति को सिल बट्टे की चटनी पसंद थी, उन्हें मिक्सी में पीसी हुई चटनी बिलकुल नहीं अच्छी लगती थी। इसलिए एक बार जब वे मायके गयीं तो गाँव में लगे मेले से पत्थर का सिल बट्टा ले आयीं। पति का अच्छा खासा प्रेस चलता था लेकिन बड़े बेटे की असमय मौत ने उन्हें तोड़ दिया। काम से उनका मन हटने लगा था। प्रूफ देखते समय भी बहुत भूलें होने लगीं थी।
बड़े लड़के की मौत के बाद उसके परिवार को भी देखने की समस्या थी, अतः प्रेस अपने बड़े पोते को सौंप कर और अपने पोतों और बड़ी बहू की व्यवस्था कर बुढ़ापे में पति-पत्नी गांव में रहने लगे। तीन लड़कों और तीन लड़कियों की शादी हो गयी थी। सिर्फ मंगेश ही बाकी रह गया था।
मंगेश बचपन से ही लम्पट आवारा था, कभी किसी जगह उसके पैर ही ना टिक पाए। पिता के मरने के बाद भाइयों भौजाइयों ने भी पल्ला झाड़ लिया, लेकिन मां के लिए तो वह बेटा ही था। फिर छोटे बेटे होने के कारण और अकेला होने के कारण ममता का केंद्र बिंदु वही रहा। पिता की मृत्यु के बाद भी कुछ दिन माँ अकेली ही गांव में रही क्योंकि कोई भी बहू उन्हें साथ ले जाने का मन नहीं बना सकी। माँ जी आप यहीं रहिए बेचारे मंगेश को सर छुपाने का ठिकाना तो रहेगा बीच वाली बहू ने कहा तो माँ कुछ नहीं बोली।
गांव में भी किसी तरह रह ही रही थी लेकिन तभी एक दिन उन्हें बिजली का झटका लगा। आंख से तो कम दिखने ही लगा था नंगा तार जमीं पर पड़ा था। बेचारी देख नहीं पाई और उन्हें तार छू गया। कमजोर काया पीड़ा से कराहती रही। यह तो अच्छा हुआ कि झटका खाकर काफी दूर गिरी थी, वरना उनके जीवन की कहानी वहीं समाप्त हो जाती। घर पर कोई था नहीं, क्योंकि मंगेश को जायदाद के बेचने पर मिले रुपयों को खर्च करने का शौक चर्राया था, और उसका कहीं पता ही नहीं था। गांव वालों ने उनके और लड़कों को खबर भिजवाई, लेकिन कोई नहीं आया। ममता देवी के भाई उधर गाँव की तरफ आए तो बहन का हाल लेने पहुंचे। वहां पहुंचकर असहाय पड़ी बहन को फिर वह अपने साथ लिवा ले गए। छः महीने माँ वहीं रही। फिर उनकी बड़ी लड़की ने उन्हें बुलवाया वे उसके घर पर रहने लगीं। तब तक मंगेश के पैसे खत्म हो गए थे, पेट के आग ने उसे फिर मां के पास भेज दिया। जहां तक मां की बात थी बेटी के साथ उनकी निभ ही जाती, लेकिन मंगेश के तौर तरीकों से जीजा और बच्चे उसके खिलाफ हो गए। जब देखो तब बदजबानी करना और रोज रोज की नौटंकी से घर का जीवन नर्क बने लगा। जब बात हद से आगे बढ़ गयी तो मां मंगेश को साथ लेकर अलग कमरा लेकर रहने लगी। सभी लड़कियों ने ये तय किया की बाकी सब भाई बहन खर्च भेजते रहेंगे और मंगेश उनकी सेवा टहल करता रहेगा।
कुछ दिन ऐसे ही चलता रहा, लेकिन फिर मंगेश के पैरों के चक्र ने जोर मारा, और जीजा के साथ झगड़ा करके उसने इस घर का रास्ता बंद कर लिया। और मां एक बार फिर से बेघर हुई। इस बार बीच वाली बेटी के पास एक कमरा लेकर रही। मंगेश को नौकरी भी दिलवा दी गई। लेकिन महीने में जब निश्चित रकम खर्च को आती थी, तो मंगेश को गुलामी क्यों कर स्वीकार होती। जल्दी ही नौकरी को लात मार कर वह स्वतंत्र हो गया, और वह माँ के लिए आये हुए पैसों से अपनी आजादी की मशाल जलाने लगा। भाइयों के भेजे हुए खर्चे के पैसों से वह मजे से अपना नशे पानी का खर्च भी निकालता, भले ही माँ एक समय भूखी क्यों ना रहे। ममता की मारी बुढ़िया भूख भी बर्दाश्त कर लेती ,लेकिन असमय भूख के चलते बूढ़े शरीर ने साथ देने से इंकार कर दिया। फिर माँ के पेट के निचले हिस्से में दर्द उठने लगा। मंगेश ने बेटी को खबर की तो बेटी माँ को लेकर डॉक्टर के यहाँ गई। डॉक्टर ने बताया कि दर्द किडनी के स्टोन का है। दर्द निवारक दवाई दी गई। माँ जब तक दवाई रही खाती रही दर्द ठीक रहा, और बेटी भी नियमित रूप से आकर देखभाल कर रही थी। बीच में बेटी की बहू की तबीयत ठीक ना होने की वजह से वह मां के पास ना आ सकी। इधर दवा ख़त्म हो गयी, और अंत में इलाज भी रुक गया। फिर जब तेज दर्द उठता, तो मंगेश उन्हें भांग की गोली खिला देता नशे में बुढ़िया दर्द भूल कर पड़ी रहती। दवा लाने का खर्च मंगेश के व्यक्तिगत खर्चों के सामने दब जाता। कुपोषण और भांग ने चलती फिरती काया को बिस्तर से लगा दिया। बेटी को पता चला तो माँ को अपने घर ले आई। लेकिन अब माँ सिर्फ बिस्तर की हो गई थी। कुछ दिन बेटी ने सेवा की लेकिन फिर उसके घर में भी बीमार लोगों के रहने की वजह से वह इस शहर में, जहां उसका मझला भाई रहता था, उसके घर में माँ को छोड़ आई।
मंझली बहू एक अलग ही नमूना थी। कैंची की तरह चलती जबान और स्वार्थ की साक्षात् मूर्ति। बहू ने माँ की खबर को भीतर आने तक नहीं दिया, और पति और लड़कों से उनको इस मरणासन्न अवस्था में बड़ी बेटी के यहां भिजवा दिया। बेटी के यहाँ मां कुछ ठीक हुई तो मंगेश फिर आ धमका। फिर से अलग कोठरी, मासिक खर्च का चक्र शुरू हुआ, तब से मंगेश माँ के साथ रह रहा है।
सुबह उठकर पहले मां के शरीर को परिष्कार करके साफ कपड़ों में लपेट देता था, और फिर चाय बनाकर मां को भी पिलाता था। दोपहर का खाना बना कर खिला देता था माँ को। शाम को चार पराठे सेंक लेता। मां शाम को खाती नहीं थी, दूध बेटी के घर से आता था वही पी लेती थी।
आज भी रोज की तरह मुंह अंधेरे बाथरूम से आकर उसने माँ को पुकारा। मां रोज इतना बुलाने पर तुरंत बोल उठती – का है, काये चिल्लाए रहो। लेकिन आज कोई प्रति उत्तर ना आया। मंगेश थोड़ा परेशान हुआ, फिर वो अपने दैनिक कार्यों को निपटाने में लग गया। कुछ देर बाद फिर उसने माँ को बुलाया। माँ नहीं बोली। पास आकर उसने बुढ़िया को छुआ, शरीर बर्फ की तरह ठंडा था, पोपला सा मुंह चिड़िया की तरह खुल गया था, आज खुली आंखों से वो मंगेश को ही देख रही थी। माँ का नश्वर शरीर उसके सामने था।
मंगेश उधर ही घूरता रहा। माँ इतने दिन तक उसके साथ थी और आज वो अकेला है। उसका जोर से रोने का मन हुआ। रुलाई उसके पेट में बादलों की तरह उमड़ घुमड़ रही थी, लेकिन साथ ही एक अलग तरह का दर्द भी पेट को मरोड़े दे रहा था। उसे याद आया कि उसने कल रात से कुछ भी खाया नहीं है। अचानक उसे ख्याल आया इस महीने का खर्च शाम तक आ जाएगा, अगर मां के मरने की खबर थोड़ी देर में दी जाए तो इस महीने के खर्च के रुपए तो मिल ही जाएंगे, और अगले महीने की अगले महीने देखी जाएगी।
आत्मा ने सर उठाया उसने खुद को धिक्कारा, मरी हुई माँ के सामने उसकी स्वार्थपरता नंगी हो गयी। लेकिन पेट के सवाल के आगे आत्मा परमात्मा सब नगण्य हो गए। मंगेश ने चादर से माँ को ढांप दिया, कोठरी में ताला लगाकर बाहर निकल आया। चाय की दुकान पर खड़े होकर चाय पी उसने, कुछ खाने की इच्छा नहीं हुई। थी तो माँ ही उसे जन्म देने वाली, खिलाने वाली, आश्रय देने वाली। आखिर इतने दिन माँ की ओर से मंगेश ही तो खा रहा था अपने पेट को खाली रखके भी उसका पेट भरती रही हमेशा। मंगेश की आंखें डबडबा आयीं। ऊपर आकर उसने कोठरी का दरवाजा खोला सामने माँ लेटी थी निष्पन्द। अचानक मंगेश को लगा कि उसका सर चकरा रहा है। धीरे से उसने देखा तो पाया कि वह माँ को नहीं देख रहा, माँ की जगह पड़ा है एक बड़ा सा हरा नोट।




