स्वीकार हो

डॉ. दुर्गेश कुमार शुक्ल, प्रयागराज

मैं शब्दों का सीमित स्वरूप;
अर्थों का पूर्ण विस्तार हो तुम।

मैं प्रणय कुंज का दिवाना अलि,
सातों जन्मों का प्यार हो तुम!!

तुम कहती मुझको हो छलिया;
मैं भी तुमको नादान कहूँ।

मैं तेरी खातिर नाकाबिल था,
जैसी हो मुझको स्वीकार हो तुम!!

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