समर्पण

डॉ. लक्ष्मी शंकर त्रिपाठी कानपुर

आनन्दकन्द, आनंदनिधान
आनंदधाम जिनकी छत्रछाया में,
सान्निध्य में, बीत रहे थे–
आनंद, आनंद एवं
अतीव आनंद के क्षण।
हठात, आदेश हुआ–
मृत्यु लोक में, मानव जन्म लेने का।
ऐसे आनंदमय वातावरण से
अनजान स्थान को जाने का
रुदन होना ही था। क्यों?
मुझे ही क्यों? और भी तो हैं।
भूल गया कि-
प्रतिदिन इस दिव्य लोक में
आवागमन होता रहता है
कुछ आते हैं, कुछ जाते हैं।
मैं तो स्वयं को स्थायी समझने लगा था।
विचार करने लगा-
कोई अपराध, कोई अवज्ञा तो नहीं हुई।
रुदन – बार बार रुदन, फिर
क्रंदन, इस आशा से-
संभवतः मेरे आंसू, मेरी स्थिति देखकर
करुणानिधान, कुछ पसीजें !
बताया गया–
अर्जित पुण्य का, प्रतिफल था।
संचित पुण्य के पूरे होने पर
मृत्यु लोक जाना ही होता है।
दयानिधान ने समझाते हुए
दुलराते हुए कुछ निर्देश
कुछ निषेध, कुछ संदेश

करणीय एवं अकरणीय कर्म
भाग्य के साथ मुट्ठी में बन्द करते हुए कहा-
यही तुम्हारी निधि है।
बिछड़ने के दुःख के साथ
रोते हुए बन्द मुट्ठी के साथ
होता है जन्म।
कालान्तर में—
पुनः ऐसी ही परिस्थिति
प्रथम बार पारिवारिक परिवेश से
विलग होने पर, विद्याध्ययन अथवा
उपार्जन हेतु देश, परदेश जाने पर–
क्या करना है, क्या नहीं के स्पष्ट निर्देश।
किन्तु ! माया के प्रभाव से
निषेधमय कर्म ही करने लगे
आकर्षित एवं प्रभावित।
आनन्दकन्द ने भाग्य को बांधा था
कर्म से करणीय एवं
अकरणीय निर्देश के साथ।
लगभग ऐसा ही था पारिवारिक आदेश में भी।
किन्तु शीघ्रातिशीघ्र धन, पद, दबदबे को
पाने की लालसा में भूल गए सत्कर्म।
अच्छे लगने लगे निषेधमय कर्म।
याद ना रहा— परोपकार,
दीनों पर दया, गुरु, माता पिता,
श्रेष्ठ जनों का आदर, परस्पर सहयोग,
एवं सात्विक प्रवृत्ति।
अपनाया–

स्वार्थ, लिप्सा, परनिंदा, ईर्ष्या,
क्रोध,अहंकार, दुर्व्यसन।
जीवन की सांध्य बेला में
याद आने लगा परमपिता द्वारा
मुट्ठी बन्द करने के पहले का
निर्देश।
अब रह गया सिर्फ पछतावा
बार बार पछतावा।
खुली हथेली से आपके श्री चरणों में
विनम्र एवं कातर निवेदन—
हे प्रभु , हे आनंदस्वरूप,
तुम तो क्षमाशील हो।
जो कुछ अर्जन कर पाया
तेरा ही तो प्रसाद है।
हे मायापति, माया भी तुम्हारी
मैं भी तो तुम्हारा हूँ
मेरे सारे गुण, अवगुण
तुम्हारा ही प्रदान है।
है सर्वस्व समर्पण तुझको
सब कुछ तुम्हें समर्पण।

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