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सबकी अपनी राम-कहानी (12th Edition) – janmaitri

सबकी अपनी राम-कहानी

राज किशोर वाजपेयी "अभय" ग्वालियर

अरे! किसी को चाहत धन की,
कोई खोजता पद व पदवी ,
और किसी का प्यार अधूरा,
कोई लड़ता कुश्ती नूरा।
सूखा कहीं आँख का पानी।
सबकी अपनी राम-कहानी।।

ढूँढ रहा अपनापन कोई,
छला गया कोई अपनों से,
सपनें बिखर गये हैं किसके,
कोई सम्मोहित सपनों से,
सिसक रही है मन की वानी।
सबकी अपनी राम-कहानी।।

ऊपर से तो शांत दिख रहे,
अंदर से कंपन हैं पाले,
भेद छिपाते पाप-कर्म के,
उजले वसन लिये मन काले।
खुद से पार कहाँ है पानी।
सबकी अपनी राम-कहानी।।

मैं, मैं करते गयी जिंदगी,
हम का कभी न भाव सँभाला,
कौर नहीं मुख दिया किसी के,
सबका छीना खूब निवाला,
अपनी ग़लती कभी न मानी।
सबकी अपनी राम-कहानी।।

हर धड़कन के बीच बसा है,
भाव-रंग से खूब रचा है,
प्राण-चेतना आतुर मिलने को,
सृष्टि की यही रीति पुरानी,
किससे जाती सही बखानी ?
सबकी अपनी राम-कहानी।।

तीन ऐषणा घेरें सबको,
धरती ताक रही अम्बर को,
सूखा मन का तभी मिटेगा,
नभ-विवेक का बरसे पानी।
सबकी अपनी राम-कहानी।।

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