सड़क पर बिछती युवा लाशें: जिम्मेदार 'तंत्र' नहीं, अति 'लाड़-प्यार' वाली परवरिश है

राजकुमार जैन

सड़क सुरक्षा नियमों की अवहेलना कर मौत को गले लगाते युवा और अपने दायित्व से मुंह चुराते अभिभावक—यह आज के दौर का सबसे खतरनाक और आत्मघाती गठजोड़ है।

सुबह के अखबार, सोशल मीडिया पर वायल वीडियो और टीवी की ब्रेकिंग न्यूज़ अब खबरों का माध्यम नहीं, बल्कि मातम का रोजनामचा बन गई हैं। हर दिन वही कहानी, कानफाड़ू संगीत के साथ देर रात तक दोस्तों के साथ अंतहीन पार्टी, धूम धड़ाका और अंत में सड़क पर बिखरा हुआ मांस और लोथड़े। यह दृश्य वीभत्स है, लेकिन उससे भी ज्यादा भयावह है इसके पीछे का कारण। मीडिया विश्लेषण चीख-चीख कर कह रहा है कि युवाओं की मौत का कारण ‘ड्रिंक एंड ड्राइव’, ‘ओवर स्पीडिंग’ और नियमों की धज्जियां उड़ाना है। लेकिन ठहरिए, क्या हम वाकई मानते हैं कि दोषी केवल वह युवा है जिसने स्टीयरिंग थामी थी? या फिर असली गुनहगार वह अभिभावक हैं, जिन्होंने उसे यह स्टीयरिंग थमाने के बाद अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली?

सड़क सुरक्षा नियमों की अवहेलना कर मौत को गले लगाते युवा और अपने दायित्व से मुंह चुराते अभिभावक—यह आज के दौर का सबसे खतरनाक और आत्मघाती गठजोड़ है।

पुलिस पर जिम्मेदारी थोपने का चलन

जब भी कोई बड़ा हादसा होता है, हमारी उंगलियां सबसे पहले पुलिस प्रशासन और ‘सिस्टम’ की ओर उठती हैं। “पुलिस कहां थी?”, “चेकिंग क्यों नहीं हुई?”, “इंफोर्समेंट सख्त क्यों नहीं है?” ये सवाल पूछना बहुत आसान है। यह अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने का सबसे सुविधाजनक तरीका है। आजादी के आठ दशक बीत चुके हैं (1947-2025), लेकिन हमारी मानसिकता आज भी वही है कि डंडा लेकर कोई सिर पर खड़ा रहेगा, तभी हम नियम मानेंगे।

हमने अपनी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियों का पूरा ठेका पुलिस के कंधों पर डाल दिया है। क्या यह संभव है कि हर गाड़ी, हर बाइक के पीछे एक हवलदार बैठाया जाए? पुलिस का काम कानून लागू करना है, आपके बच्चों को ‘बेबीसिट’ करना नहीं। सख्त इंफोर्समेंट की मांग करना और खुद नियमों को ‘सुविधा अनुसार’ तोड़ना, यह समाज का वह दोहरा चरित्र है जो आज युवाओं की जान ले रहा है।

संस्कार प्रदाता अभिभावक या मूक दर्शक?

सच कड़वा है, लेकिन इसे स्वीकारना होगा। इन मौतों के लिए अभिभावक भी बड़ी हद तक जिम्मेदार हैं। अपनी व्यस्तता, करियर की दौड़ और आधुनिक बनने की होड़ में हमने बच्चों को ‘संसाधन’ तो दिए, लेकिन ‘संस्कार’ नहीं।
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खूनी खिलौने: जब आप अपने नाबालिग बच्चे के हाथ में हाई-स्पीड बाइक या कार की चाबी थमाते हैं, तो आप उसे तोहफा नहीं, बल्कि एक ‘लोडेड गन’ दे रहे होते हैं।

नैतिकता का अभाव: शैशवावस्था से ही हम बच्चों को यह नहीं सिखाते कि नियम पालन एक नागरिक धर्म है। इसके बजाय, हम उन्हें यह सिखाते हैं कि कैसे सिग्नल तोड़कर जल्दी निकलना ‘स्मार्टनेस’ है।

गलत रोल मॉडल: बच्चा वही सीखता है जो वह देखता है। जब जल्दबाजी में पिता बच्चे को स्कूल छोड़ते समय रांग साइड से शॉर्टकट मारते हुए, खुद सीट बेल्ट नहीं लगाता या हेलमेट नहीं पहनता, तो वह बच्चे के अवचेतन मन में यह बीज बो रहा होता है कि “नियम केवल दूसरों के लिए हैं, हमारे लिए नहीं।”

दोहरे मापदंड का विरोधाभास

समाज का रवैया देखिए, हम सार्वजनिक मंचों पर कठोरता की मांग करते हैं, लेख लिखते हैं, मोमबत्तियां जलाते हैं। लेकिन जैसे ही पुलिस हमारे अपने बच्चे को नियम तोड़ते हुए पकड़ती है, तो हम फोन घुमाने लगते हैं। सिफारिशों का दौर शुरू हो जाता है। पुलिस पर “परेशान करने” का आरोप तक मढ़ दिया जाता है।

दुर्भाग्यवश, शायद ही कभी ऐसा देखा गया हो कि कोई पिता पुलिस थाने जाकर कहे, “मेरे बेटे ने नियम तोड़ा है, इसका चालान काटिए ताकि इसे सबक मिले।” इसके विपरीत, हम अपने बच्चों के अपराधों को ढकने के लिए अपने रसूख का इस्तेमाल करते हैं। यही वह क्षण है जब हम अपने बच्चे की मौत के वारंट पर हस्ताक्षर कर रहे होते हैं। 

आईना देखने का वक्त

जन-जागरूकता अभियान, पुलिस की सख्ती और मीडिया की बहसें तब तक बेमानी हैं, जब तक ‘जनमानस’ का पूर्ण समर्थन नहीं मिलता। अनुशासन को ‘डर’ से नहीं, ‘कर्तव्य’ से जोड़ना होगा। कठोरता की मांग करने वाले अभिभावकों को पहले स्वयं के गिरेबां में झांकना होगा। यदि हमने आज अपनी सोच और आचरण में बदलाव नहीं किया, तो याद रखिए, सड़क पर अगला खून किसी और का नहीं, हमारे अपने परिवार का हो सकता है। यह समय पुलिस को कोसने का नहीं, बल्कि अपने घर के भीतर एक ‘सुरक्षा संस्कृति’ विकसित करने का है। अपने बच्चों के लिए उपदेशक नहीं, बल्कि उदाहरण बनें।

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