मौसम
राकेश मणि त्रिपाठी , मुंबई
अभी दिखी थी धूप मुझे
अभी बरसता है पानी
कोई मुझको समझाएगा
मौसम की ये मनमानी
सोचा ले लूँ रेनकोट मैं
फिर सोचा कि रहने दूँ
माँ कहती थी छाता ले लो
लेकिन सोचा कहने दूँ।
आखिर देखो भीग गया मैं
बात नहीं उनकी मानी
अभी दिखी थी धूप मुझे
अभी बरसता है पानी
टिक जाती जो यूँ ही धूप
मेरा ठेला लग जाता
जल जाता भट्ठी का कोयला
कुछ भुट्टा भी बिक जाता
इतनी जल्दी बादल आए
होती मुझको हैरानी
अभी दिखी थी धूप मुझे
अभी बरसता है पानी
टिक जाती जो यूँ ही धूप
घर से बाहर आते लोग
चल पड़ता यह रिक्शा मेरा
बैठ कहीं पर जाते लोग
पल में ऐसे बदला मौसम
देखो इसकी शैतानी
अभी दिखी थी धूप मुझे
अभी बरसता है पानी
देख रहा मानव हित अपना
गलत कह रहा है मुझको
मैं भी हूँ आधीन प्रकृति के
कैसे समझाऊँ उसको
काम कर रही हूँ मैं अपना
मत समझो तुम मनमानी
धूप दिखाऊँगी एक दिन मैं
आज बरसने दो पानी




