मातृ देवो भव

माँ के पायल बिछुए की रुनझुन ब्राह्म मुहूर्त में पावन स्वर में गूँजता है। बिल्कुल जैसे मंदिर की घंटियाँ, मस्जिद का अजान, गुरुद्वारे की अरदास। मधुर स्वरों में, भक्ति में पगी, सुमिरन कराते मन को, जागृत करने की, कोमल स्वर लहरियाँ, हृदय की चौखट को खोल कर आसन जमा कर बैठ जाती हैं। उधर गिरजाघर के घंटे समवेत स्वर में मन-मस्तिष्क के वातायन खोलने लगते हैं। माँ धीरे-धीरे मधुर स्वरों में गुनगुनाती रहती है —
“प्राण से प्रिय राम हमरो..प्राण से प्रिय राम।”
सचमुच संतति तो प्राण से प्रिय होती ही है। वसन, भूषण, अयोध्या का राज, सब उस प्रेम के समक्ष न्यून हो जाता है। माँ हाथ में पहले झाड़ू उठाती है। एक लक्ष्मी दूसरी लक्ष्मी से मिलती हैं। शिशु रवि के शुभागमन से पहले माँ घर की अस्वच्छताओं, विकृतियों को निकाल फेंकती है। शिशु रवि खिड़कियों से झांँककर कूदने लगते हैं। उनके पैर प्रदूषित न हो जाय, इसी भावनाओं को मन में पिरो कर शिशुरवि के स्वागत में तल्लीन हो जाती है माँ। फूल भी प्रफुल्लित होकर शिशु रवि के लिए सुगंधमयता की थाल सजाए हुए हैं। अभी सारे लोग सोए हुए हैं। माँ कुशल गृहिणी है, लक्ष्मीस्वरुपा है। भोर प्रहर में प्रातः स्नान करती है। तत्पश्चात् अनंत के श्यामल पट पर एक सुचिक्कण, कोमल, शीतल सिन्दूर का गोल तिलक आकाश का अभिषेक करता है। माँ उस रुपहले, श्यामवर्ण अनंत पर अभिषिक्त खेलते हुए लाल होठों और गालों को जल अर्पित करती है। जल के झीने पर्दों से बालरवि को नमस्कार करती है, परिक्रमा करती है। फिर तुलसी चौरा में जल देती है। धूप, दीप का अर्घ्य देती है।
घर के सभी सदस्य अभी भी सोए हैं। दादी-दादाजी के लिए दातुन और पानी रखती है। चूल्हे जलाती है, बच्चों के लिए दूध गरम करती है। सब के जगने के पहले भोजन का काम आरंभ कर देती है। माँ बिना नहाए रसोई में नहीं जाती है। अन्नपूर्णा की अपनी एक पवित्रता है। भोजन पवित्रता, राग, सहृदयता, आत्मीयता से सींच कर बनती है। स्वच्छता की सजगता रहती है। कहीं कोई शोरगुल न हो इसलिए माँ ब्राह्म मुहूर्त में उठकर प्रेम और अनुरागपूर्वक, भावपूर्वक कुशलता की देहरी पर पैर रख कर एक-एक चीजों का सम्यक निर्वहन करती है। बासी घर में बालरवि का स्वागत नहीं होना चाहिए। पीतल के बर्तन में पहला खाना गाय को देती है। सभी पशु-पक्षियों का भोजन में यथोचित अंश और स्थान रहता है। पीतल की पतीली में मिट्टी का लेपन लगा कर चूल्हे पर चावल-दाल चढ़ा देती है। सब्जी काटकर रख देती है। बच्चों के उठने से शोरगुल शुरु हो जाता है। सब को दूध पिलाती है। दादा-दादी को घर में बनाए पेड़े के साथ लोटे में पानी देती है। बाबूजी को छेना, अंकुरित चना, सेव काट कर देती है। कहीं किसी के बोलने या माँगने की बात नहीं। सर्वत्र कार्य समय तालिका से चल रहा है। मन-मस्तिष्क की अनंत संभावनाएंँ हैं। बौद्धिक क्षमता के समक्ष रोबोट बौना हो जाता है। नाश्ते के पश्चात् चाय बना कर सुघड़ता से सब को देती है।
इधर बाबूजी को ऑफिस जाना है। माँ सतर्क है, सभी संदर्भों के लिए, किसी प्रकार की आधुनिक सुविधा नहीं है। फिर भी काम समय सीमा का अतिक्रमण नहीं करता है। दादा-दादी को नाश्ता देना है। बच्चे स्कूल जाएंँगे तो समय के साथ नहलाती है। बच्चों को खाना खिलाती है, टिफिन देती है। दादा-दादी के नहाने का प्रबंध करती है। फिर प्रेम से उन्हें खाना खिलाती है। कितने प्रेम, सहृदयता, आत्मीयता और पवित्रता से सारे कार्यों का निर्वहन दक्षतापूर्ण करती है। बाबूजी का खाना देती है। फिर दूध देती है। नौकर चाकर को भी उसी प्रेम से खाना देती है। इसी क्रम में कोई अतिथि आ जाए तो उनके मान-सम्मान-आदर का यथोचित ध्यान भी रखती है।
सबको खिलाने-पिलाने के पश्चात माँ खाने बैठती तो उसका खाना हमेशा अधूरा ही रहता है। कभी दाल रही तो सब्जी नहीं। छुट्टी के दिनों में अक्सर हम बच्चे देखते कि वह थोड़ा-सा चावल-दाल सब्जी के अभाव में उस के फोरन के साथ खाती। कभी कोई अतिथि आ जाते तो चिउड़ा-भूजा से अपनी जठराग्नि शांत करती। कहती सब लोग अच्छी तरह से, प्रेमपूर्वक खा लिए तो समझो मेरा पेट उसी से तृप्त हो गया। उसी संजीवनी से शक्ति और ऊर्जा का प्रस्फुटन मेरे रोम-रोम में हो रहा है।
न जाने कहाँ गए वे दिन ? जिसमें इतनी शांति, संतुष्टि की खुराक मिलती रहती थी। आधुनिक सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण भरा-पूरा जीवन तो है लेकिन शांति पता नहीं कहाँ खो गई है ? ब्रह्म मुहूर्त में उठना जैसे कोई अभिशाप हो गया है। बच्चे भी रात को देर तक पढ़ते हैं और ब्रह्म मुहूर्त में सो जाते हैं। सूर्य की शीतल किरणें जागरण का संदेश देकर चुपके से चली जाती हैं। उसकी प्रखर किरणें उन्हें जगाती हैं लेकिन उसे वह दुलार नहीं मिलता जो माँ दिया करती थी। गृहणियांँ भी प्रखर किरणों से हिल मिल गई हैं। बालरवि तो अब भी आते हैं लेकिन उनके स्वागत, वंदना, अभ्यर्थना में किसी के हाथ माँ के समान नहीं उठते हैं। विटामिन “डी” के प्रथम खुराक से सब वंचित हो जाते हैं। गृहस्थी के कामों की कोई समय सारणी नहीं है। घर-बाहर हर जगह तनाव है। गृहस्थी की, शांति की, सोन चिरैया छत की मुरेड़ पर, वृक्षों के लाल, छोटे-छोटे पत्तों पर बैठकर सूक्ष्म अवलोकन कर रहें हैं। आज कहाँ गईं गृहलक्ष्मी की मर्यादा, उसके आदर्श, उसकी मान्यताएंँ ? संस्कारों, सिद्धान्तों की दहलीज और जिन सीढ़ियों से गुजरकर दिव्य पावनता की उपलब्धि होती थी वह कुशल, पारंगत, सुगृहिणी माँ अब शब्दकोश से लुप्त हो रही हैं। अब इस लुप्तप्राय प्रजाति को हम ढूँढ कर कहाँ से लाएंँ ? काश वह माँ फिर से पुनर्जीवित हो उठती! काश! ऐसा होता!
