महिला दिवस : पोस्टरों में सशक्त, जीवन में संघर्षरत

ममता त्रिपाठी,
कानपुर

हर वर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है मंच सजते हैं, नारों की गूंज होती है। सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं की बाढ़ सी आ जाती है। पूरे देश में इस दिन महिलाओं को समाज में उनके विशेष योगदान के लिए सम्मानित किया जाता है। हर जगह नारी सशक्तिकरण के आकर्षक नारे चमकते हैं, पर जब हम इन पोस्टरों से उतर कर यथार्थ की जमीन पर कदम रखते हैं तो स्त्री का जीवन अब भी संघर्षो, प्रश्नों और विरोधाभासों से घिरा नजर आता है। आज भी नारी का जीवन केवल सहजता और सौम्यता की कहानी नहीं है, बल्कि वह निरंतर संघर्ष साहस और संकल्प की जीवंत मिसाल है। नि:सन्देह महिलाएँ आज हर क्षेत्र में आगे बढ़ी हैं वे घर भी संभाल रही हैं और देश भी। शिक्षक भी हैं, चिकित्सक भी, वैज्ञानिक भी हैं और प्रशासक भी, पर उपलब्धियों के साथ साथ आज भी चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। लैंगिक भेदभाव, असमान वेतन, घरेलू हिंसा, अभी भी सामाज में मौजूद है।

महिला दिवस की चमकती तस्वीर के पीछे एक ऐसी स्री खड़ी है, जिसकी आंखों में कई अनकहे सवाल और मन में थकान का सन्नाटा है। रसोई की आँच से लेकर लैपटॉप की स्क्रीन तक उसकी दिनचर्या फैली रहती है। वह मुस्कराते हुए सब निभा लेती है, पर कोई यह नहीं पूछता कि — वह खुद कैसी है ?

आज नारी को अधिकार तो मिले हैं, पर अपेक्षाएँ उससे कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं। उसे सफल भी होना है संस्कारी भी। आत्मनिर्भर होना है पर ज्यादा स्वतन्त्र नहीं। हर भूमिका में श्रेष्ठ साबित करने की दौड़ उसे भीतर से खोखला कर रही है। सबसे दुखद यह है कि जिम्मेदारियों को निभाने की कश्मकश में वह अपनी सेहत, अपने सपनों और मन की आवाज़ को सबसे अंत में रख देती है। वह परिवार के हर सदस्य का ध्यान रखती है पर स्वयं डॉक्टर के पास जाना टाल देती है। थकान, तनाव और अकेलापन उसकी स्थाई साथी बन जाते हैं जिन्हें वह अपनी मुस्कान के पीछे कहीं छुपा लेती है।

आज “महिला दिवस” तभी सार्थक होगा जब हम केवल उसकी सफलता का उत्सव ना मनायें बल्कि उसकी चुनौतियों को भी समझें। हम यह स्वीकार करें कि स्री को “सुपर वुमन” नहीं बल्कि सम्मानित मनुष्य होने का अधिकार चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम महिलाओं को केवल आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि आत्मसम्मान से जीना भी सिखाएँ। उन्हें यह विश्वास दें कि उनकी आवाज़ मायने रखती है, उनके सपने मूल्यवान हैं, और उनकी थकान भी समझी जाएगी। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस केवल तालियों और नारों का दिन नहीं होना चाहिए। यह दिन होना चाहिए संवेदनशील सोच, ईमानदार स्वीकारोक्ति और वास्तविक परिवर्तन का, जहाँ हर महिला को हर दिन सम्मान और सुरक्षा मिल सके।

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