मरीचिका

डॉ. कनक लता तिवारी, मुंबई

अगस्त की उमस भरी दोपहर थी। हवा में बरसात की नमी थी, पर निष्ठा के मन में जैसे रेगिस्तान पसरा था। रसोई में सब्जी का छौंक लगाते हुए वह चौंक गई—

“आज उन्नीस अगस्त हो गया! बस तीन महीने ही तो रह गए हैं भाभी की डिलीवरी में।”

उसने जैसे खुद से कहा, पर स्वर में उम्मीद की मृदु थरथराहट थी। अब तो हर दिन गिनती में है। हर तारीख उसके लिए एक पर्व जैसी लगती है। जिन-गिन कर दिन कट रहे हैं।

“आख़िर अब वह क्षण आने ही वाला है… जब मेरी गोद भरेगी, जब मैं अपनी अभिलाषित वस्तु से मिलूँगी…” — उसने मन-ही-मन बुदबुदाया।

निष्ठा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई, पर भीतर कहीं स्मृतियों की लहरें उठने लगीं। उसे याद आया वह दिन—जब डॉक्टर ने ठंडी आवाज़ में कहा था,
“मिसेज़ गुप्ता, आप माँ नहीं बन सकतीं।”

उस वक्त दुनिया जैसे थम गई थी। उसके कानों में शून्य गूंज उठा था। कितनी रोई थी वह! पर किसी ने नहीं देखा उसके आँसू। उसने अपने दर्द को इतनी गहराई में दबा दिया था कि खुद उसके मन को भी उसका पता न चले।

मयंक—उसका पति, उसका प्रेमी, उसका संबल—उसने बहुत समझाया था,
“निष्ठा, बच्चा हमारे प्रेम का प्रमाण नहीं है। हमारे बीच जो है, वही सबसे बड़ा रिश्ता है। बच्चे हों या न हों, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ।”

पर निष्ठा कैसे मान लेती? वह तो स्त्री थी—वह अधूरी कैसे रहती! मातृत्व उसके लिए कोई सामाजिक उपलब्धि नहीं था, बल्कि आत्मा की पूर्णता का प्रतीक था।

उसे लगता—
“मेरी गोद खाली है, तो मेरा जीवन भी रिक्त है। मेरे आँगन में हँसी नहीं गूँजेगी तो इस घर की दीवारें भी निःशब्द रह जाएँगी।”

फिर एक दिन—जैसे किस्मत ने करवट ली। भाभी—जो पहले ही तीन बच्चों की माँ थीं—चौथी बार गर्भवती हुईं। उस खबर ने निष्ठा के भीतर जैसे कोई उम्मीद जगा दी।

भाभी से बात हुई तो वे हँसकर बोलीं,
“निष्ठा, अगर यह बच्चा तू लेना चाहे तो… मैं तैयार हूँ। मैं अब और नहीं चाहती।”

निष्ठा के लिए वह क्षण किसी चमत्कार से कम न था। मानो सूखे रेगिस्तान में अचानक मरीचिका नहीं, सचमुच का जल स्रोत फूट पड़ा हो। उसकी आँखों में आशा की चमक लौट आई—
“क्या सचमुच भगवान ने मेरी सुन ली?”

अब वह हर दिन इस आने वाले जीवन की तैयारी में लगी रहती। घर का एक कमरा धीरे-धीरे बच्चे की वस्तुओं से भरने लगा—छोटा-सा झूला, रुई की गड्डियाँ, रंग-बिरंगे खिलौने, फूलों की छपाई वाला रजाई-कंबल।

दीवार पर लटकता एक छोटा-सा फ्रेम—जिसमें उसने खुद अपने हाथों से लिखा था—
“मेरे सूरज के स्वागत में।”

उसका उत्साह देखकर मयंक भी मुस्कुराता, पर भीतर-ही-भीतर वह जानता था—यह मातृत्व केवल शरीर का नहीं, आत्मा का भी प्रश्न है।

कभी-कभी पड़ोस की बुजुर्ग बूढ़ी चाची ताना मार देतीं,
“बिटिया, दूसरे का बच्चा आखिर दूसरा ही होवे है। चाहे जितना प्यार दे देना, पर बड़ा होकर अपनी जननी की ओर ही भागेगा।”

निष्ठा मुस्कुरा देती,
“चाची, जब वह मेरे आँचल में सोएगा, मेरे हाथ से दूध पिएगा, मेरी गोद में खेलना सीखेगा—तब उसे कैसे पता चलेगा कि मैं उसकी माँ नहीं हूँ? प्रेम ही तो असली जन्मदाता होता है।”

मयंक उसे देखकर कहता,
“पहले बच्चा आ तो जाने दो, फिर सोचेंगे वो किसकी ओर भागेगा।”

दोनों हँस पड़ते।

अब बस कुछ ही दिन रह गए थे। निष्ठा का मन एक मीठे व्याकुल उत्साह से भरा था। रातों को वह बच्चे के नाम सोचती—आरव? आर्या? अन्वी?—और फिर खुद ही मुस्कुरा देती।

वह बच्चे के लिए लोरियाँ ढूँढती, दूध पिलाने के समय का चार्ट बनाती, डॉक्टर से फीडिंग और टॉनिक के बारे में जानकारी लेती। मयंक ने बैंक के सारे कामों से उसे छूट दे दी थी—
“अब बस तू आराम कर, और उस पल का इंतज़ार कर।”

दिन गुज़रते गए। और फिर—वह रात आई।

ट्रेन की कर्कश आवाज़ कमरे में गूँजी। निष्ठा चौंककर उठी। फोन की घंटी बज रही थी। उधर से भैया की घबराई आवाज़ आई—
“निष्ठा! भाभी को अचानक दर्द शुरू हो गया है। उन्हें अस्पताल ले जा रहा हूँ। तुम भी जल्दी पहुँचो।”

उसका हृदय तेज़ी से धड़कने लगा। वह तुरंत अटैची में छोटे-छोटे कपड़े, रजाई और खिलौना रखने लगी।

मयंक ने कार निकाली। रास्ते में वह सिर्फ एक ही बात सोचती रही—
“बस अब कुछ घंटों की बात है… फिर सब बदल जाएगा।”

अस्पताल के गेट पर पहुँचते ही उसने देखा—भैया बेचैनी से टहल रहे थे और माँ जप-माला थामे खड़ी थीं।

“ऑपरेशन चल रहा है।”

भैया के यह कहते ही निष्ठा वहीं बेंच पर बैठ गई। उसकी उंगलियाँ आपस में जुड़ती और खुलती रहीं। समय जैसे ठहर गया था।

घंटों बाद ऑपरेशन थिएटर का दरवाज़ा खुला। भैया बाहर आए—चेहरा सफेद, आँखें बोझिल।

निष्ठा के होंठ काँप उठे—
“भाभी…?”

भैया ने सिर झुकाकर कहा—
“भाभी ठीक हैं… पर बच्चा… बच्चा नहीं रहा।”

वह क्षण—जैसे किसी ने उसके भीतर की धरती को चीर दिया। सारी तैयारियाँ, सारी प्रतीक्षाएँ, सारे सपने—एक ही क्षण में बिखर गए।

वह वहीं बैठी रह गई—आँखों में सूखते आँसू, होंठों पर निरुत्तर मौन।

माँ ने उसे गले लगाया, मयंक ने समझाया, पर उसके आँसू नहीं थमे। वह रोती रही—शायद अपने खोए हुए बच्चे के लिए नहीं, बल्कि अपने उस स्वप्न के लिए जो कभी सच हुआ ही नहीं।

कुछ देर बाद वह खिड़की के पास गई। बाहर हल्की बारिश हो रही थी—जैसे आकाश भी उसके साथ रो रहा हो।

निष्ठा के हृदय में एक मरीचिका फिर जन्मी। दूर कहीं उसे लगा जैसे एक नन्हा चेहरा मुस्कुरा रहा है।

वह आगे बढ़ी—पर वह छवि धीरे-धीरे धुँधली पड़ गई।

उसे समझ में आ गया—यह वही मरीचिका है, जो रेगिस्तान में जल बनकर छलती है।

पर उसने मन-ही-मन कहा—
“अगर यह छल भी है, तो भी मैं इसे जीऊँगी। क्योंकि मरीचिका भी तो जीने की चाह को ज़िंदा रखती है।”

घर लौटते हुए उसकी गोद खाली थी, पर उसका मन अब उतना शून्य नहीं था। उसे लगा—मातृत्व केवल जन्म देने से नहीं, बल्कि प्रेम करने से मिलता है।

वह अब भी बच्चे के कमरे में जाती, झूले को हल्के से झुला देती और धीमे से कहती—

“तू आया तो नहीं, पर मेरी प्रतीक्षा का हिस्सा बनकर रहेगा सदा।”

रेगिस्तान का सूरज अब भी तपता था, पर उसके भीतर की मरीचिका ने उसे जीवन का एक अर्थ दे दिया था।

अब वह जान गई थी—
हर स्त्री माँ बनती है,
कुछ अपने गर्भ से,
और कुछ अपने प्रेम से।


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