बुढ़ापे से मुलाकात (व्यंग)

डॉ. गिरिधर राय, कोलकाता

सुबह-सुबह किसी ने
दरवाजा खटखटाया।
धीरे से मैं बुदबुदाया—
इतनी सुबह-सुबह कौन आया?

माँ ने कहा, “दरवाजा खोल दे,
दूध वाला आया होगा।”

दरवाजा खोला,
सामने एक अजनबी खड़ा था।
मैंने पूछा, “आप कौन?”

बिना जवाब दिए उसने
मुझे ऊपर से नीचे तक नापा,
फिर धीरे से बोला—
“मैं बुढ़ापा।”

और मुझे लगभग ढकेलते हुए कहा—
“मुझे अंदर आने दो।”

मैंने कहा, “अभी नहीं,
अभी मेरी उम्र ही क्या हुई?
आपका अंदर आना मुश्किल है।”

बुढ़ापा हँस कर बोला—
“कोशिश बेकार है,
अब मुझे रोक पाना नामुमकिन है।”

मैंने कहा, “अभी कुछ दिन रहने दे,
अभी तक तो मैं परिवार के लिए जीता रहा।
अब मुझे कुछ दिन समाज के लिए
और कुछ दिन अपने लिए जीने दे।”

बुढ़ापा मुस्कुराया—
“अगर ऐसी बात है तो
जा, तू जी ले अपनी जिंदगी।

यदि तू यूँ ही हँसता-हँसाता रहा
तो तेरा कोई काम नहीं अटकेगा।
तेरी उम्र और अनुभव दोनों बढ़ते रहेंगे,
पर बुढ़ापा पास नहीं फटकेगा।”

तब तक भीतर से आवाज आई—
“कौन है बेटा?”

“बुढ़ापा है माँ!
मेरे पास आना चाहता है।”

माँ ने कहा, “पूछ, पगला गया है क्या?
इतना भी नहीं समझ सकता है?
अरे! जिसकी माँ जिंदा हो,
उसका बेटा बूढ़ा कैसे हो सकता है?!”

बुढ़ापा सहम गया,
चेहरे पर उदासी छा गई।
लेकिन अगले ही क्षण
उसकी आँखों में चमक आ गई।

बोला, “तब माता जी से ही मिल लेते हैं।”

माँ ने कहा—
“लगता है तू सचमुच सठिया गया है।
तेरे बारे में हम क्या कह सकते हैं?

अरे! जिसके बेटे सुसंस्कारी हों,
उसके माँ-बाप कभी बूढ़े हो सकते हैं?!”

बुढ़ापे ने सहमति भरे अंदाज में
सिर हिलाते हुए कहा—

“माता जी! आप अपनी पीढ़ी की बात कर रही हैं,
जो आने वाले दस-पंद्रह सालों में
इस पृथ्वी से ही खत्म हो जाएगी।

अब वो बात कहाँ?

अब तो जो व्यक्ति जिस परिवार को
एक मुकाम तक ले आता है,
वही परिवार उसे ही ‘मूढ़ा’ (बेकार) कर देता है।

माँ-बाप को उम्र नहीं,
अपनों का व्यवहार ही बूढ़ा कर देता है।”

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