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बड़ा दर्दीला बिल्ला : पैनकार्ड (12th Edition) – janmaitri

बड़ा दर्दीला बिल्ला : पैनकार्ड

दिनेश-गंगराड़े
दिनेश गंगराड़े, इंदौर

आय, सबको पसंद है किंतु कर किसी को भी नापसंद है। कर याने हाथ की बात नहीं हो रहीं हैं। कर माने टैक्स का कड़वा जिक्र कर रहा हूँ जो सालाना जुलाई में शूल बन कर चुभता है। करदाता रोता है, मतदाता हंसता है, सबका दाता मुस्कुराता है, दानदाता सुकूँ पाता है। कष्टदाता कर्मों से दुख पाता है। जन्मदाता प्रसव पीड़ा पाकर तुम्हे प्राप्त करता है। व्यक्ति बमुश्किल जॉब पाता है और पहली सेलेरी से ही टैक्स का लफ़ंदर पीछे पड़ जाता है। दुनिया नहीं कमाने वाले मतकमाऊ को ताना मारती है और ज्यादा कमाने वाले को इंकम टैक्स विभाग वाला झिलाता है। रीछ के पांव की तरह पकड़ा जाता है? छोड़ो तो और नहीं छोड़ो तो गत नहीं, बस मजबूरन पकड़े रखो?

यह केंद्र सरकार का ऐसा दस्तावेज है जो पहचान से अधिक दर्द देता है, तभी तो उसका नाम पैन (दर्द) कार्ड है। सन निन्यानवे में जब तन खाने वाली तनख्वाह निन्यानवे के फेर में पड़ी तब बना था पैनकार्ड याने “दर्दीला बिल्ला”? अपन बड़े खुस हुए कि पहचान का स्थायी बिल्ला बन गया, दीवार फ़िल्म के सात सौ छिय्यासी टाइप का, किंतु इन पांच पचोल वर्षों में हमारी पहचान परिवार में तो न हो सकी अपितु कमाई-धमाई वाले विभाग, आयकर में जरूर हो गई? पहचान, कमाने वाले लोगों में कर दाता के रूप में हो गई। कथा सुनने गए थे लेकिन दानपेटी गले पड़ी? पैन कार्ड उर्फ दर्दीला बिल्ला का कष्ट पच्चीस वर्षो से भुगत रहा हूँ। सेवा से रि ‘टायर’ हो गया हूँ लेकिन पीछा नहीं छूट रहा है। माई बाप गोरमेंट के धाड़की स्केल से कैसे बचें की टैक्स न देना पड़े?

इधर चौथेपन में शरीर तकलीफ दे रहा है उधर आयकर विभाग। दुनिया में लोगों को शरीर में जगह-जगह दर्द (पैन) होता है किंतु कर दाताओं को उसकी आमदनी पर दर्द छलकता है, टैक्स के शूल के रूप में? इस दर्द का लेखा-जोखा है “दर्दीला बिल्ला” अथवा पैनकार्ड, जो वर्षों तक स्थाई तकलीफ देता है। दर्दीले बिल्ले का थोबड़ा चित्र, फ़ोटो चाहे बेकार, घटिया, बदशक्ल हो किंतु विभाग तत्क्षण पहचान कर हिसाब-किताब कराता है। पुराने लोग कहते हैं सरकारी पैसा लोहा का, कोई पचा नहीं सके। इस दर्दीले बिल्ले का एक स्थाई राष्ट्रीय नम्बर प्रदाय होता है जो नम्बरी लोगों को वल्दियत के साथ, सड़े फोटो युक्त देय होता है, जिसमें अवतरण दिवस भी टँकित होता है। साथ में केंद्र सरकार का तीन शेरों वाला राष्ट्रीय चिन्ह भी अंकित होता रहता है ताकि आप इन शेरों से भयभीत हो समय पर बिना हीला हवाले किये टैक्स भरते रहो वरना..? लेट लतीफी में शास्ति, पेनल्टी के साथ प्यार से भरना पड़ेगा। नम्बर चाहे जो हो लेकिन तयशुदा है कि आप नम्बरी हो और सरकार के खातेदार हो? उधारिया भगत की तरह।

किसी भी लफड़े-धफड़े में ये दर्दीला बिल्ला उर्फ पैनकार्ड रामबाण सिध्द होता है। बेचारे करदाताओं की पूंछ दबी होने से वे बिल्ले के ऊपर छपे बदसूरती फोटो की शिकायत क्या खा कर करें? वैसे भी लंबे अरसे तक विभाग से पाला पड़ने की वजह से टैक्स पेयर का फोटो स्वतः ही खिंच जाता है? कई महामनाओं का तो इस महकमे से यमलोक तक जाने तक भी पिंड नही छूटता है। समझदार व्यक्ति बोलते हैं ये कर, वो कर, मत कर, हाँ कर, सुन कर, बोल कर, पर आयकर से बच? जीवन मे सठियाने की वय में इंसान को पैसे अधिक कमाने का अफसोस टैक्स पेड करते वक्त होता है। जीवन भर मनी-मनी करते करते, व्यक्ति दना दनी पर उतारू हो जाता है और खुद ‘शनि’ सा हो जाता है? अंत में कह उठता है मोह, माया सब बेकार है। माया महा ठगनी हम जानी, ये है सुकुनी कम, कड़क गुनगुनी, फिर भी लोभी नर, चाहता खूब चर, करता मनी-मनी, दिली तमन्ना रखता पैसा पुनि पुनि?

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