नई सोच

कविता कोठारी, कोलकाता

क्यों हमारी पीढ़ी नई पीढ़ी के चरित्र, संस्कार, मूल्यों पर
हमेशा प्रश्नचिन्ह लगा देती है?

क्यों हम खुद से उनकी तुलना भी करते हैं और फिर यह
भी कहते हैं कि- हमसे दस कदम आगे हैं?

क्यों हम उनके स्वतंत्र सोच को उश्रृंखलता की
संज्ञा देते हैं ?

क्यों हमारा ध्यान हमेशा सिर्फ़ उनकी अनियमित जीवन
शैली पर जाता है, उनके संघर्षों और उपलब्धियों
पर नहीं?

क्यों हमारी दृष्टि हमेशा उस नगण्य 90 प्रतिशत
कमजोरियों पर ही अटक जाती है और 90 प्रतिशत
विशेषताओं पर नहीं जाती?

हमने भी तो कभी अपनी वैयक्तिकता की मौन लड़ाई
लड़ी थी, आज हम उन्हें आत्मकेंद्रित कह कर क्यों
खारिज कर देते हैं?

हमने हमेशा अपनी गलतियों से सीखा है, हमें उन्हें भी
गलतियों से सीखने का मौका देना चाहिए

हमें उनकी आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन के पथ का
बाधा नहीं, वरन उनका पथ निदेशक बनना चाहिए

रही संस्कारों की बात तो संस्कार सिखाए नहीं जाते, यदि
हमारा आचरण अच्छा हो तो वे हमें देखकर खुद ब खुद
सीख जाएँगे

दरअसल हमारी पीढ़ी में एक विशेष गुण है, सिर्फ़
अवगुणों को देखने का गुण

यदि सकारात्मक दृष्टि से देखें तो हमें उनके सद्गुण भी
नजर आएँगे, दृष्टिभेद से ही दृश्यभेद होगा।

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