धरा और मेघ
व्यग्र पाण्डे, गंगापुर सिटी (राजस्थान)
तुमने बरस कर मुझ पर
बहुत उपकार किया है
मेरी धूल धूसरित काया पर
हरित चादर जो उढ़ा दी
मेरे व्याकुल मन में
प्रेम के अंकुर घास बनकर
उग आए हैं अब
हे मेघ तुम दूर ही सही
पर मेरे मन के करीब हो
तेरी प्यार की बूँदों ने मुझे
सुहागन बना डाला
देखो मैं अब सज-धज गई हूँ
एक बार फिर छा जाओ मुझ पर
मैं फिर से एकाकार होना चाहती हूँ
मुझे पता है ऋतु बदली
तुम भी बदल जाओगे
फिर अगले सावन आओगे
आओ, ना गँवाएँ ये पल सारे
अब हर दिन हर रात हों हमारे
ये सुन मेघ ने फिर अट्टहास लगाया
बूँदों के रूप में प्यार बरसाया
प्रकृति सिकुड़ सी गई
अमृत पान करने को
अपनी झोली में
अकूत संपदा भरने को।
