जनतंत्र

क्यों भाई हम सचमुच आजाद हो गए हैं। इस बात का पता हमें आज ही चला है। जब नेता जी ने झंडा फहराने के बाद कहा था। यह बात सत्य भी कहा था क्योंकि नेता आजाद हो गए हैं, जनता को तो गुलामी में भी मजा आता रहा है।
प्रजातंत्र की परिभाषा है जजिया कर! प्रजातंत्र की परिभाषा है चोर – उचक्कों का सीना तानकर चलना। अजी सुना था रामविलास के घर चोरी हो गई थी। चोरों को दूसरे गांव वालों ने पकड़वा लिया था। चोरों ने रामविलास के घर चोरी की बात स्वीकार भी किया था। जनतंत्र है बाबू, चोर भी तो वोटर होते हैं; इसीलिए उनको सुविधा शुल्क लेकर इज्जत के साथ छोड़ दिया गया था।
पुलिस कप्तान साहब ने सख्त हिदायत भी दिया था कि, ‘मार कूट नहीं करें, वह चिड़िया चोर हैं!’ चोर होंगे तो क्या हुआ, सुविधा शुल्क वही तो देते हैं!
हमारे पड़ोस में जनतंत्र कल ही आया है। जब पूरी रात जागकर चौकसी बरती गई थी। कुछ संदिग्ध आदमी दिखाई दिए थे। पुलिस को बुलाने के लिए 112 नंबर पर काल किया गया था। घंटों बाद पुलिस पहुंचने के पहले यानी एक किलोमीटर की दूरी बची थी कि, हूटर बजा – बजाकर पुलिस ने बताया था कि, ‘चोरो, बदमाशों भागो पुलिस आ रही है!’
फिर पुलिस आकर फोन करने वाले हमारे पड़ोसी को पकड़ा! पुलिस वालों ने हमारे पड़ोसी को धर दपटा, “साले, झूठ – मूठ की अफवाह फैला कर, पुलिस को परेशान कर रहा है। चल थाने, तेरी सब हेकड़ी निकालते हैं। बता कहां है चोर, कहां है कोई एक भी बदमाश!”
अंग्रेजों के जमाने में हमारा पड़ोसी बहुत छोटा था। वह थाने का नाम सुनते ही कांप गया था। जी एस टी की तरह लगा एक दलाल जो जनतंत्र लाया था, उसने हमारे पड़ोसी से पांच सौ रुपए लेकर सौ रुपए पुलिस वालों को दे दिया था। बांकी अपनी जेब के हवाले किया था, शाम को विदेशी बारुनी का जुगाड़ हो गया था। वैसे भी जनतंत्र में सौ नंबर को सौ रुपए चाहिए ही चाहिए!
जनतंत्र दूर – दूर तक फैला हुआ नजर आता है। अपनी गाढ़ी कमाई कोई गरीब बैंक में रखता है, पढ़ाई-लिखाई तो गांव में बची नहीं, मास्टरों को पशु गणना, बाल गणना करने में लगा देते हैं, वोटरलिस्ट बनाने के लिए बी यल ओ बना दिया जाता है। 27 काम मास्टर को देकर शिक्षा नाम मात्र के लिए रह गई है; बैंक वाले उस गरीब को ब्याज नहीं देकर उनके खाते में से जी एस टी 18 परसेंट का ही लेते हैं। यह जनतंत्र नहीं तो क्या है?
भैंस, गाय, बकरी पालन करके गांव के लोग दिन – रात मेहनत करके किसी तरह पेट पालते हैं। यहां जनतंत्र आया, हम स्वतंत्र हुए, इस बात का गवाह है कि, अंग्रेजों ने दूध – घी, दही पर कोई टैक्स नहीं लगाया था। हम आजाद हुए, जनतंत्र आया तो इन सब पर जी एस टी लगा दी गई!
पहले जब हम गो धन, गजधन, बाजिधन को धन मानते थे तब हम परतंत्र थे। हमारा गो धन उपेक्षित है तो इस बात का प्रमाण है कि, हम आजाद हैं, हम जनतंत्र में जी रहे हैं, सांस ले रहे हैं! पक्का जनतंत्र का सबूत है हमारी सांसों पर भी जी एस टी!
हमें पहले पता नहीं था कि, हम कौन हैं! हम मनुष्यों में हिंदू, हिंदू में कितनी जातियां, जातियों में अगड़ा – पिछड़ा, दलित आदि आरक्षित जातियां यह सब बातें हमें हमारे जनतंत्र ने बताया! मुसलमान, सिख, ईसाई धर्म में अल्पसंख्यक शब्द यह हमारी उपलब्धि है।
वोट के लिए स्त्रियां आधी आबादी मान ली गईं हैं। अपनों से लड़ना, नारी उत्थान में सहायक होता है। घर की सुख – चैन छीनकर तलाक पर जोर देना तमाम समितियां जो कुकुरमुत्ते की तरह उगी हुई हैं वह सब हमारे जनतंत्र की सबूत है।
अमीर की बातें भागवत कथा की तरह सुनना, गरीब की अच्छी, वाजिब बात को उपेक्षित करना यह हमरी स्वतंत्रता, जनतंत्र का एक हिस्सा है।
हम स्वतंत्र हैं, जनतंत्र हमारी व्यवस्था है। जानते हैं कैसे, हमारे आकाओं के प्राइवेट स्कूलों में भरकम कमाई हो रही है। लूटमार जारी है। सरकारी स्कूलों की कद्र नहीं है, यही तो जनतंत्र है।
गांव में किसानों की लड़ाई एक मेंड़ को लेकर होती है बाबा ( दादा ) मुकदमा दायर करता है, पोता भी उसकी तारीखों में दौड़ रहा है, फैसला कब होगा राम जाने, यह देश अब रामभरोसे चल रहा है, भला बताओ इससे बड़ा जनतंत्र कहां हो सकता है।
प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों की भारी भीड़ लगती है, वहां के डाक्टरों की चांदी ही चांदी है। पता नहीं कितने घर, कितनी गाड़ियां, कितने प्लाट, जहां जाओ डाक्टर साहब की जमीन मिल जाती है। इतना अच्छा जनतंत्र कहां हो सकता है।
हमारे जनतंत्र पर उंगली उठाना सर्वदा गलत है क्योंकि, एक बार हम बीमार पड़ गए थे; झोलाछाप डॉक्टरों की लाइन लग गई थी। भलाई वह डाक्टर साहब कक्षा दसवीं फेल हो गए थे लेकिन, अब वह बाटल चढ़ाने में कुशल थे। गांव के हिसाब से लहरियां बिखेरतीं सरांय विहार से प्रमाणपत्र जारी करवा लिया था।
एक डाक्टर तो नकल करने से बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण था, वह दवा से मर्ज को लड़ा देता था, खुद वहां से लम्बी काटता था। भाग्य रहा तो दवा जीतती है, वरना रोग जीतकर मौत निश्चित ही है। भला बताओ इस जनतंत्र पर उंगली उठाते शर्म आनी चाहिए क्योंकि, जहां सरकारी डॉक्टर हैं वहां दवा नहीं है। सरकारी अस्पताल जो गांव में हैं भी तो वहां डाक्टरों को रहना अनिवार्य नहीं है। अस्पताल है डाक्टर नहीं है।
हां तो हम इसी जनतंत्र के जन के नाते बीमार पड़ गए थे। आए हुए झोलाछाप डॉक्टरों को देखकर मेरी रूह कंपा गई थी। फिर भी मरता क्या न करता, दवा करवाया, विल बनवाया किसी तरह से एक कुंतल गेहूं देकर डाक्टर साहब को पैसे दिए थे।
इस जनतंत्र की जड़ विधायक, सांसद, मंत्री हैं जो बहुत तो नहीं पढ़े हैं पर कुछ – कुछ पढ़ लेते हैं, कुछ हस्ताक्षर करना सीख चुके हैं। उन सभी नेताओं के एक नहीं चार – छः स्कूल, कालेज चल रहे हैं। भला बताओ ऐसी जनतांत्रिक व्यवस्था से देश तरक्की नहीं करेगा तो क्या करेगा!
हम पूर्ण जनतांत्रिक हैं इसका प्रमाण है हमारे पास, कोई भी मांगेगा हम प्रमाण देंगे, जब विधानसभा सत्र शुरू होता है या लोकसभा सत्र शुरू होता है तब, जितनी सभ्यता की सीमाएं हैं सभी को परे रखकर विधिवत एक दूसरे के ऊपर वाक्य कीचड़ उछालने के अलावा कोई विकास की बात नहीं करता है। कुर्सियां तक चलती हैं, ऐसे पूरे सत्र का समय पास करते हैं कि, कोई भी मतलब की देशहित की, प्रदेश हित की बात नहीं करके सम्मान प्राप्त कर लेते हैं।
‘चोर – चोर मौसेरे भाई’ यह कहावत सही होती है जब, हवा पूरब से पछुआ चलने के आसार दिखाई देते हैं तब वही नेता जो पुरवाई की तरफ रुख रखते हैं, पैंतरा बदल कर पछुआ की रुख कर लेते हैं! सबकुछ वही रहता है, केवल कपड़े बदलते हैं। भला बताओ ऐसी जनतांत्रिक व्यवस्था, ऐसा जनतंत्र कहीं है क्या!
अब इससे ज्यादा जनतंत्र के लिए गर्व की बात कहीं नहीं हो सकती, जहां आजादी के साथ जंगल कट रहे हों, सरे आम, दिनदहाड़े भी इज्जत सुरक्षित नहीं है!
देखो जब हम राजतंत्र में थे, अंग्रेजों के जमाने में गुलाम थे तब हमें शराब पीने की स्वतंत्रता नहीं थी। जयसवाल भाई बनाते थे वह भी चोरी – छिपे! पुलिस जान जाती थी तो दफा साठ में चालान कर दिया करती थी। आज जनतंत्र में करोना लाकडाउन खुला था कि देशी – अंग्रेजी शराब स्वागत में खुली मिली थी।
परतंत्रता की छोड़ो आज जनतंत्र में आपको सभी गांवों, मुहल्लों में देशी – विदेशी, हिंदी – अंग्रेजी शराब की दुकान के पोस्टर जरूर दिखाई देंगे। यहां तक कि, जनतंत्र में किसानों की खाद एवं बीज, दवाई भलाई नहीं उपलब्ध होती है, खाद आधार कार्ड, खतौनी देखकर मिलती है पर, शराब कोई भी हो, कहीं भी हो, आदमी कोई भी, कैसा भी, कहीं का भी हो उसे मिल जाएगी, कभी भी, कितनी भीड़ हो, कितनी बड़ी लाइन हो शराब उपलब्ध रहेगी, कभी भी नहीं घटेगी!
देखो हमारे जनतंत्र की ताकत, सभी शराब पीकर झूमते हुए ज्ञान की बातें करने लगे हैं। घर में कितनी भी किल्लत हो पर शराब पीने के लिए पैसे मिल ही जाते हैं। चुनाव के समय सभी छोटे बड़े नेताओं के दर्शन मिल ही जाते हैं, सभी लच्छेदार भाषणों का आनंद लेते हुए वोट डालने जाते हैं। एक मोनालिसा बहू को जनता ने जिताया था पूरे चार साल तक मोनालिसा बहू का पता नहीं था, मिलने जाओ तो मिल ही नहीं पाते थे। आज चार साल बाद पोस्टर में मोनालिसा बहू दिखाई दे रही थी; बहुएं पर्दे पर रहती हैं क्यों मिले? जब चुनाव की घोषणा होगी मोनालिसा बहू जरूर आपका पैर छूकर आशीर्वाद लेने आएगी!
आज अपने घर, गांव का निवासी होने का प्रमाणपत्र मांगा जाता है, यह हमारे जनतंत्र की ताकत है। पुत्र से आधारकार्ड पर, उसके सभी कागजात पर दर्ज असली बाप का नाम है, तब भी बाप होने का सबूत मांगा जाता है। यह हमारे जनतंत्र की सभ्यता है।
जिंदा घूमता रहता है, उसे मरा बनाकर गरीब की जमीन हड़प ली जाती है। वह नेताओं, आफीसरों, न्यायालय के सामने चिल्ला – चिल्लाकर कहता है कि, “मैं जीवित हूं!” उसकी आवाज किसी को सुनाई नहीं देती है!
एक कागज पर करोड़ों रुपए का कर्ज लेकर फिर दिवालिया का प्रमाणपत्र देकर दुबारा करोड़ों रुपयों का कर्ज लेकर, कर्ज अदायगी नहीं कर रहा है, वह मूंछों में ताव देकर सम्मानित घूम रहा है। यह जनतंत्र है, किसान अपनी सारी जमीन गिरवी रखकर, मैनेजर, बिचौलियों को पर्सेंटेज हिस्सा देता है, महीनों गिड़गिड़ा कर चंद रुपए लेकर, फसल नहीं तैयार हो पाने से किसान कर्ज नहीं भरपाता है तो, उसे नोटिस जारी कर दी जाती है। कुड़की करते हैं, बेइज्जत करते हैं।
जिस देश का किसान, मजदूर, गरीब आत्महत्या करने पर मजबूर है, उस देश का जनतंत्र कितना महान है। जिस देश में व्यभिचारी, व्यभिचार करने के बाद हंसता – मुस्कराता हुआ घूम रहा है, सरकारी योजनाओं का शिलान्यास करता है, उद्घाटन करता है; इससे अच्छा जनतंत्र कहां हो सकता है!
कागज में सरकारी योजनाओं को पूरा कर दिया जाता है, मौके पर कुछ भी नहीं होता है, यही तो है जनतंत्र!
जिस देश का जनतंत्र ईमानदार पत्रकारों, साहित्यकारों की उपेक्षा करता है। चाटुकारिता को पत्रकारिता कहता है। जिस देश का ईमानदार, असली पत्रकार फांके मारता है, चाटुकार, बेईमान नकली पत्रकार मलाई मारता है वह देश जनतांत्रिक कहलाता है। असली जनतंत्र इसी में समाहित है।
हम स्वतंत्रता दिवस समारोह संपन्न करते हैं। हम जो अफसरशाही को, नेतृत्व को अच्छा लगता है वही भाषण में कहते हैं। अब भी आपको शंका है कि, यहां, हमारे यहां जनतंत्र नहीं है।
