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छुड़ाये कैसे इनसे जान (10th Edition) – janmaitri

छुड़ाये कैसे इनसे जान

आस्तीन में नाग छिपे हैं
कैसे हो पहचान
छुड़ाएं कैसे इनसे जान?
रोज मुखौटा बदल-बदल कर
अपनेपन का राग सुनाते,
लेकिन अक्सर घात लगाकर
रग-रग में विष को पहुंचाते,
इनकी उन्मादी चाहत का
क्या रक्खें उनवान?
छुड़ाएं कैसे इनसे जान?
ऊपर अमृत घट छलके है
भीतर लेकिन ज़हर भरा है,
जो इनके संसर्ग में आया
तड़प-तड़प कर वही मरा है,
मानवता की खाल ओढ़कर
जीते ये शैतान!
छुड़ाएं कैसे इनसे जान?
सोच-सोच कर थके पहरुए
इनका तोड़ निकालें कैसे,
हिंसक हमलों भरे दंश हैं
खुद को कहो संभालें कैसे
सत्ता के आराधक इनका
करते हों गुणगान!
छुड़ाएं कैसे इनसे जान?

अशोक अंजुम, अलीगढ़

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