काव्यानुवाद - श्रीमद्भगवद्गीता, पंद्रहवाँ अध्याय (पुरुषोत्तम योग)

कानपुर
कॉर्पोरेट लर्निंग्स: श्रीमद्भगवद्गीता के “पुरुषोत्तम योग” से नेतृत्व के सूत्र
श्री मद्भगवद्गीता का पंद्रहवां अध्याय “पुरुषोत्तम योग” के नाम से जाना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने पुरुषोत्तम के स्वरूप, उसकी प्राप्ति और उसके लक्षणों का वर्णन किया है। आधुनिक कॉरपोरेट जगत में एक सफल लीडर और संगठन के लिए इन सूत्रों को जानना, समझना और आत्मसात करना अत्यंत आवश्यक है।
1. संगठनात्मक संरचना: “ऊर्ध्वमूलम् अश्वत्थम्”
यह अध्याय संसार की तुलना एक अश्वत्थ वृक्ष से करता है जिसकी जड़ें ऊपर और शाखाएं नीचे हैं। वेद इसके पत्ते हैं। ।।श्लोक संख्या:15.01-15.05।।
किसी भी संस्था की जड़ें उसका मिशन, विजन और मूल्य हैं। जड़ जितनी गहरी और मजबूत होगी, संस्था की स्वीकार्यता और अस्तित्व उतना ही दीर्घकालिक होगा। यही संस्था के आधार, विस्तार और विकास को तय करती हैं।
“वेद रूपी पत्ते” बसंस्था की कार्यप्रणाली हैं – नियम, नीतियां, SOP और सिस्टम। इनका अनुपालन वेद के समान पवित्र और अनिवार्य होना चाहिए। साथ ही हर संगठन में तीन प्रकार की ऊर्जा कार्य करती हैं – सात्त्विक (सकारात्मक), राजसिक (मिश्रित) और तामसिक (नकारात्मक)। लीडर का काम सात्त्विकता को बढ़ाना है।
2. फल से विरक्ति: “असंग शस्त्रेण दृढेन छित्वा”
गीता कहती है कि इस वृक्ष को आसक्ति रूपी दृढ़ शस्त्र से काटना होगा। ।।श्लोक संख्या 15.83।।
अल्पकालिक लाभ, व्यक्तिगत अहंकार और “मैं” की आसक्ति को त्याग कर दीर्घकालिक मूल्य निर्माण पर ध्यान देना होगा। संस्था के इंफ्रास्ट्रक्चर से अधिक उसकी “आत्मा” यानी मिशन को सींचना होगा।
व्यक्तिगत उन्नति के स्थान पर सामूहिक विकास को अपनाना ही असंग का शस्त्र है जिससे संगठन की बाधाएं नष्ट होती हैं।
3. कुशल नेतृत्व के गुण:
एक उत्तम लीडर वही है जो निम्न गुणों को आत्मसात करता है:
मान-मोह से रहित, निष्पक्ष, समदर्शी, लक्ष्य के प्रति समर्पित और सुख-दुख, लाभ-हानि में समत्व भाव रखने वाला।
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा / अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै / र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ।। श्लोक संख्या: 15.05]
ऐसा नेतृत्व ही “अव्यय पद” यानी लक्ष्य को प्राप्त करता है।
लीडर के लिए गुरुता के साथ-साथ गंभीरता भी आवश्यक है।
4. आवश्यकताओं की पूर्ति: “सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्ट:”
जिस प्रकार प्रकृति प्रत्येक प्राणी को उसकी योग्यता के अनुसार संसाधन देती है, उसी प्रकार संस्था का नेतृत्व भी प्रत्येक सदस्य को उसकी क्षमता, योग्यता और आवश्यकता के अनुसार संसाधन उपलब्ध कराए।
।।श्लोक संख्या :15.12 – 15.15।।
भगवान कहते हैं – सूर्य, चन्द्र और अग्नि का तेज भी मेरा ही है।
संगठन में हर विभाग, हर टीम का तेज अलग है, पर उसका स्रोत एक ही है – विजनरी लीडरशिप।
जब नेतृत्व सभी के हृदय में स्थान बना लेता है और यह विश्वास जगा देता है कि हर परिस्थिति में सही दिशा, ज्ञान और समाधान मिलेगा, तब अटूट श्रद्धा पैदा होती है। यही संस्था की उन्नति का मेरुदंड है।
5. विवेक: “क्षर और अक्षर”
संसार दो तत्वों से बना है – क्षर यानी नाशवान और अक्षर यानी अविनाशी। [श्लोक 15.16]
कोई भी संस्था इन्हीं दो से मिलकर बनी है।
क्षर= टैंजिबल – संसाधन, इन्फ्रा, प्रोडक्ट
अक्षर = इंटैंजिबल – मूल्य, संस्कृति, मिशन, विजन, ब्रांड
संसाधन बदलते रहते हैं, पर मूल्य और मिशन अपरिवर्तनशील रहते हैं। बुद्धिमान लीडर इसी विवेक से निर्णय लेता है।
6. उत्तम पुरुष: “यद्यदाचरति श्रेष्ठ:”
उत्तम पुरुष वह है जो सबका भरण-पोषण करता है और सबका मार्गदर्शक है। नेतृत्व को इसी परिधि में होना चाहिए।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ ।।3.21।।
नेता जो आचरण करता है, कर्मचारी वही करते हैं। नेता जिसे प्रमाण मानता है, संगठन उसी का अनुसरण करता है।
यदि शीर्ष नेतृत्व सदाचारी, कर्तव्यनिष्ठ और पारदर्शी होगा तो पूरे संगठन में स्वतः ही अच्छे मूल्यों का प्रसार होगा।
निष्कर्ष:
पुरुषोत्तम बनना है तो जड़ें मजबूत करो, फल की आसक्ति छोड़ो, और स्वयं उदाहरण बनो।
यही गीता का संदेश है और यही 21वीं सदी की सच्ची कॉरपोरेट लीडरशिप है।
श्रीभगवानुवाच
ऊपर जिसका मूल है, शाखाएँ अध ओर।
अव्यय शाश्वत वृक्ष है, वृक्ष रहे प्रति ओर।।
आदि पुरुष ही मूल है, शाखा ब्रह्मा रूप।
पत्ते जिसके वेद हैं, पीपल रूप स्वरूप।।
संसार रूप इस वृक्ष को, जाने जो है मूल।
तत्व रूप से जानता, जाने वेद समूल।।
ज्ञाता है वह वेद का, जाने वेद यथार्थ।
परम तत्व अनुभूति ही, वेद सार परमार्थ।। 1
संसार रूप इस वृक्ष की, शाखायें सर्वत्र।
ऊपर नीचे मध्य सब, फैलीं यत्रे तत्र।।
कोपल से हैं युक्त सब, शाखा विषया-भोग।
पोषित पुष्पित पल्लवित, तीन गुणों के योग।
मनुष लोक में हैं बँधे, कर्मों के अनुसार।
ममता अहम् व वासना, बाँधें सभी प्रकार।।
जड़ इनकी फैली हुयीं, सभी लोक में व्याप्त।
मानव योनी में पुरुष, इन विकार को प्राप्त।। 2
सार रूप इस वृक्ष का, जैसा कहा स्वरूप।
सम्भव नहि इस जगत में, देखे वैसा रूप।।
आदि अंत ना दीखता, दिखता ना आधार।
दृढ़ मूलों का वृक्ष जो, पीपल सा संसार।।
किन्तु मनुष को चाहिये, काटे सभी विकार।
करे शस्त्र वैराग से, करे विरक्ति प्रहार।। 3
फिर खोजे वह परम पद, पाये सद्गति ज्ञान।
लौटे ना संसार में, करे प्राप्त भगवान।।
आदि रहित है चल रहा, नित्य निरंतर काल।
विस्तारित है सृष्टि यह, चले अनादी काल।।
दृढ़ निश्चय होकर करे, करे परम का ध्यान।
आदि पुरुष परमात्म का, शरण ग्रहण कल्यान।। 4
मोह मान से रहित है, नष्ट हुआ सम्मोह।
संग दोष को जीत ले, छूटे ऊहापोह।।
नित्य निरन्तर जो रमे, सत्य परम नित तत्व।
शाश्वत में स्थित सदा, एक भाव ब्रह्मत्व।।
सुख दुख नामक द्वंद्व से, हो विकार से मुक्त।
अविनाशी पद प्राप्त हो, ज्ञानी होत विमुक्त।। 5
पाकर जिसे न लौटता, जिसे प्राप्त मम धाम।
वह जो है अति परम पद, ऊँचा है आयाम।।
नहीं प्रकाशित कर सके, सूर्य-अग्नि औ चन्द्र।
स्वयं प्रकाशित है सदा, परम दांव आनन्द।। 6
जीवात्मा मम अंश है, जीव लोक संसार।
सदा सनातन रूप यह, शाश्वत है आधार।।
आकर्षित करता उन्हें, प्रकृती जिनका वास।
मन इंद्रिय मिल षष्ठ से, बँधता जीव प्रयास।। 7
गंधाशय से वायु जब, ग्रहण करे है गन्ध।
ले जाता वह साथ है, छोड़ मूल सम्बन्ध।।
वैसे ही इस देह का, ईश्वर जो जीवात्म।
छोड़े जब है साथ यह, रहे शरीर अनात्म।।
वैसे ही मन-इन्द्रि को, ले जाये जीवात्म।
जिस शरीर को प्राप्त हो, उससे हो एकात्म।। 8
विषयों का सेवन करे, लेकर मन का साथ।
इन्द्रिन के सब योग से, सभी विकार यथार्थ।।
श्रोत्र-नेत्र-रस-घ्राण औ, स्पर्श विषय जब ध्येय।
जीवात्मा के लिए ही, हैं इन्द्री पाथेय।। 9
देह छोड़ जाते हुये, या प्रवेश पर देह ।
विषय भोगते या मनुष, मोहित गुण से नेह ।।
मूढ़ मनुज ना जानते, विषय भोग आसक्त ।
तीन क्रियाओं में सदा, बदले ना अव्यक्त ।।
ज्ञानी जन हैं जानते, विषय गुणों के दोष ।
मोहित रहित विकार से, ज्ञान चक्षु परितोष ।। 10
योगी जो हैं चाहते, करते यत्न प्रयत्न ।
अनुभव करते हैं वही, तत्व रूप जो यत्न ।।
हृदय स्वयं के जो सदा, रहे परम जो तत्व ।
तत्पर व्याकुल भाव से, पाते हैं देवत्व ।।
अंत: हो यदि शुद्ध ना, अविवेकी अज्ञान ।
अनुभव मिले न तत्व ना, मिले न उसको ज्ञान ।। 11
सूर्य प्रकाशित है करे, विश्व जगत संसार ।
तेज सूर्य को प्राप्त जो, मेरा ही आधार ।।
सूर्य-चंद्र औ अग्नि में, दिखता है जो तेज ।
उसको मेरा जान तू, मुझसे ही वह तेज ।। 12
पृथ्वी में जो दीखता, धारण रूपी शक्ति ।
मेरी ही यह शक्ति यह, यह मेरी अभिव्यक्ति ।।
कर प्रवेश प्रति लोक में, धारण करता जीव ।
रस स्वरूप मैं चंद्र बन, औषधि पुष्ट अतीव ।। 13
सब जीवों के देह में, मैं वैश्वानर अग्नि ।
प्राण अपाने युक्त-सम, मैं हूँ जठरा अग्नि ।।
चार भेद जो अन्न के, उनके भेद अनेक ।
पचते मेरी शक्ति से, ना जाने अविवेक ।। 14
मैं हूँ स्थित हृदय में, सब जीवों के पार्थ ।
मुझसे स्मृति ज्ञान औ, विस्मृति यही यथार्थ ।।
सब वेदों औ शास्त्र से, मैं जानन के योग्य ।
सत्य ज्ञान परमात्म का, करते प्राप्त सुयोग्य ।।
वेदों का संकलक हूँ, निर्णय कर्ता रूप ।
अर्थ भाव सब वेद के, जानूँ पूर्ण अनूप ।। 15
दो प्रकार के पुरुष हैं, नाशवान अविनाश ।
जीवात्मा अविनाश है, क्षर शरीर का नाश ।।16
इन दोनों से श्रेष्ठ जो, उत्तम पुरुष है अन्य ।
परमात्मा कहते इन्हें, जो जाने वह धन्य ।।
तीनों लोक प्रविष्ट हो, पालन करता लोक ।
अविनाशी ईश्वर करे, आलोकित आलोक ।। 17
प्रतिक्षण बदले क्षर सदा, प्रति पल होता नष्ट।
मैं अतीत क्षर से सदा, तू जाने सुस्पष्ट ।।
अक्षर से मैं श्रेष्ठ हूँ, उत्तम श्रेष्ठ महान ।
पुरुषोत्तम के नाम से, वेदों लोक बखान ।। 18
मोह रहित वह मनुष जो,जाने इसी प्रकार ।
पुरुषोत्तम जाने मुझे, जाने तत्व व सार ।।
हे भारत ! जो जनता, ज्ञानी पुरुष प्रकार ।
सर्वज्ञ भाव से भज रहा, वासुदेव मैं सार ।।
प्रति पल प्रतिक्षण है करे, गाये प्रभु का नाम ।
कीर्तन भजन व गान से, परम आत्म अभिराम ।। 19
हे अर्जुन निष्पाप सुन, गोपनीय अव्यक्त ।
मैंने इसको है कहा, मेरा यह अभिव्यक्त ।।
गोपनीय यह शास्त्र है, अति रहस्य से युक्त ।
इसको जो है जानता, होता भव से मुक्त ।।
ज्ञान प्राप्त होता उसे, होता महत कृतार्थ ।
बुद्धिमान कृतकृत्य वह, भारत यही यथार्थ ।। 20




