काव्यानुवाद - श्रीमद्भगवद्गीता, चौदहवाँ अध्याय (गुणत्रयविभागयोग)

राकेश शंकर त्रिपाठी,
कानपुर

कॉरपोरेट लर्निंग्स

1. प्रत्येक व्यक्ति के गुणों को पहचानना : श्री गीता जी के चौदहवें अध्याय को गुणत्रय विभाग योग के नाम से जाना जाता है।

इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को प्रकृति के बारे में ज्ञान उपलब्ध कराया है। यह एक कुशल नेतृत्व के लिए अति आवश्यक है कि वह अपने टीम के सदस्यों के बारे में, उनकी प्रकृति के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान रखे, जिससे उनसे किस प्रकार से व्यवहार करे कि उनके अंदर व्यक्तिगत विकास और उत्थान सके। साथ ही साथ सम्पूर्ण टीम के प्रदर्शन और कार्यों के निष्पादन में गुणवत्ता आ सके और कार्य अपने सिद्धि को प्राप्त करे।

भगवान श्री कृष्ण ने तीन प्रकार के गुणों को परिभाषित किया है – सत्त्व, रज और तम गुण। प्रत्येक मनुष्य इन तीन गुणों से सदैव ही प्रभावित रहता है। और ये तीनों गुण समय और परिस्थिति के अनुसार अपने प्रभाव प्रदर्शित करते रहते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने इन तीनों गुणों को पहचानने, पता लगाने और उनसे तादात्म्य स्थापित करने के तरीकों से अवगत कराते हैं। इन्हें जानकर और पहचान कर निश्चित कर्मों के द्वारा सुधार और उन्नति के मार्ग प्रशस्त कर लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है।

2. गुणों का प्रभाव : विवेक, निर्मलता, स्वच्छता सत्त्व गुण को प्रकट करता है। किसी भी संस्था का उद्देश्य सत्त्व गुण से प्रेरित मानव संसाधन को प्राप्त करना और तम गुण से अभिप्रेरित मानव को सत्त्व में रूपांतरण करना।

सत्त्व गुण में स्थित नेतृत्व सदैव ही ऊर्ध्व को प्राप्त करता अर्थात् वह सदैव उन्नति की ओर अग्रसर रहता है। इस स्थिति में सदा ही नवाचार, आविष्कार, स्पष्टता आदि का समावेश रहता है।

प्रमाद, मोह हो, अप्रकाश, ये सब तम गुण से ग्रसित व्यक्ति के लक्षण हैं और इन लक्षणों का अतिक्रमण कर समस्त कमियों को दूर करना एक संवेदनशील व्यक्ति का, नेतृत्व का पुनीत कर्त्तव्य है। तम गुण से प्रभावित संस्था या नेतृत्व का सदैव ही पतन होता है। यह अवस्था राजनीति, अनुशासन हीनता, जिम्मेदारी का अभाव, सही दिशा और मार्ग दर्शन के अभाव में अवनति का पर्याय होती है। इसमें नेतृत्व को संवेदन शीलता का परिचय देते हुए ट्रेनिंग और मोटिवेशन पर विशेष देने की आवश्यकता होती हैं।

जहाँ लोभ हो, अशांति है, केवल नाम और प्रशंसा के लिए, लोकेष्णा के लिए कर्म करना हो, रज गुण के व्यक्ति की अभिव्यक्ति है। रज गुण का व्यक्ति गतिहीन और ठहरा हुआ रहता है। इस अवस्था में अधिक शोर, अधिक काम पर

परिणाम कम। यह burnout का प्रतीक है। ऊर्जा को सही दिशा प्रदान करना और उनके हितों को उद्देश्य से जोड़ने से स्थिति में सुधार लाना यह कुशल नेतृत्व का कार्य है।

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः।।14.18।।

3. गुणातीत नेतृत्व के लक्षण : अर्जुन अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए भगवान श्री कृष्ण से प्रश्न पूछा कि वह उस व्यक्ति के गुणों को आत्मसात कर सके जिसके ऊपर इन गुणों का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता, वह व्यक्ति जो निरपेक्ष होता है, अप्रभावित रहता है। अर्जुन ने पूँछा कि वह व्यक्ति किन लक्षणों से युक्त होता है, उसके आचरण कैसे होते हैं और कैसे इन तीनों गुणों का अतिक्रमण कर लेता है?

भगवान श्री कृष्ण ने इस प्रकार के व्यक्तित्व के बारे में श्लोक संख्या 22 से 25 श्लोक संख्या में प्रकाश प्रदान किया है, उनके गुणों के बारे में अवगत कराया है।

समदुःखसुखः स्वस्थः… …
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते।।14.24-25।।

(i) परिस्थिति निरपेक्ष : जो किसी भी अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति से लगाव रखता है और न ही विचलित होता है। निर्विकार भाव से अपने लक्ष्य के प्रति संवेदनशील होता है और उसकी प्राप्ति के लिए निरंतर ही प्रयासरत रहता है। वह अनुकरणीय है।

(ii) सम भाव : वह व्यक्ति अनुकरणीय है जो दुःख और सुख में समान रहता है। प्रमोशन मिले तो किसी भी प्रकार का अहंकार नहीं, असफलता प्राप्त हो तो नैराश्य का भाव नहीं। प्रोजेक्ट सफल हो तो अति उत्साह नहीं और असफल हो तो पूर्ण लगन से पुन: प्रयास।

(iii) मूल्य निरपेक्ष : जो ढेले, पत्थर और सोने में सम रहता है – इसका तात्पर्य यह है कि वह किसी के प्रति न तो आकर्षण है और न ही किसी के प्रति विकर्षण। टीम के प्रत्येक सदस्य के प्रति सम भावना रखना और उन सदस्यों के गुणों के आधार पर, उनकी योग्यता के आधार पर उनका उचित सदुपयोग करना। सभी की योग्यताओं को ध्यान में रख कर किसी भी प्रकार का राग और द्वेष न रखना।

(iv) आलोचना और आत्म संस्तुति से दूर : वह नेतृत्व वंदनीय है जो प्रिय – अप्रिय में, निन्दा – आत्मसंस्तुति में, मान – अपमान में सम रहता है। कोई निन्दा करे तो खिन्नता नहीं और कोई प्रशंसा करे तो प्रसन्नता नहीं। जो भी मिले उससे अप्रभावित रहें।

(v) पक्षपात रहित उपयोग : वह मित्र और शत्रु में कोई भी पक्षपात नहीं करता। इसका तात्पर्य यह है कि वह किसी से राग और द्वेष में अपनी ऊर्जा का ह्रास नहीं करता अपितु अपने धर्म के अनुसार, अपनी भूमिका के अनुसार अपने कर्त्तव्य का पूर्ण पालन करता है और उनकी योग्यता के अनुसार उनका उपयोग करता है ।

(vi) मिशन प्रति – बद्धता : चित्त में उस लक्ष्य को, उस गोल को, उस मिशन को, उस विजन को सदैव ही धारण किए रहना और उसे रत्ती भर ओझल न होने देना ही अव्यभिचारी भक्तियोग को परिभाषित और प्रतिपादित करता है। कारपोरेट भाषा में इसे – Unwavering commitment to purpose कहते हैं ।

गुणातीत नेतृत्व hellhole जैसी स्थिति में भी निष्क्रिय नहीं होता है अपितु वह स्वयं को ट्रांसफॉर्म करता है और टीम का भी क्रमिक विकास करता है। उसकी सौम्यता, निर्मलता और प्रयास सम्पूर्ण संस्था को प्रकाशित करती है । शान्ति, धैर्य और विवेक समस्त समस्याओं के निराकरण में vaccine का कार्य करती है।

श्रीभगवानुवाच

सभी ज्ञान में जो सदा, उत्तम है उत्कृष्ट ।
इस समान ना दूसरा, श्रेष्ठ बड़ा आकृष्ट।।
फिर से हूँ मैं कह रहा, सुनो लगाकर ध्यान ।
सर्वश्रेष्ठ है ये सदा, परम सिद्ध यह ज्ञान।।
जिसे समझकर लोग-मुनि, मुक्त हुआ संसार।
प्राप्त हुये हैं सिद्धि को, परम सार आधार।।1

आश्रय ले इस ज्ञान का, मुझ स्वरूप को प्राप्त ।
दिव्य प्रकृति को प्राप्त कर, उसमें लीन समाप्त ।।
सृष्टि काल के आदि में, होये ना उत्पन्न ।
महाप्रलय में भी नहीं, व्याकुल शरणापन्न ।। 2

सम्पूर्ण भूत की योनि जो, मूल प्रकृति का सार ।
मेरा ही यह महत ब्रह्म, रूप प्रकृति आधार ।।
गर्भ धान का वास यह, सभी भूत संसार ।
मैं ही थापित कर रहा, भूत प्रकृति व्यवहार ।।
जड़-चेतन संयोग से, भूतों की उत्पत्ति ।
धारण करते देह को, भारत ! यह निष्पत्ति ।। 3

सभी योनियों में दिखें, जितनी मूर्ति शरीर ।
पैदा होते वे सभी, मेरे ही तस्वीर ।।
मूल प्रकृति योनी सदा, धारण करती गर्भ ।
बीजारोपण मैं पिता, प्रकृति मातृ संदर्भ ।। 4

हे अर्जुन ये तीन गुण, प्रकृति करे उत्पन्न ।
सत रज तम इन तीन से,अनंत सृष्टि संपन्न ।।
जीवात्मा को देह में, बाँधे हैं ये तीन ।
अविनाशी देही रहे, इन गुण के आधीन ।। 5

हे अर्जुन इन गुणन में, सत गुण निर्मल सत्व।
स्वच्छ प्रकाशक है सदा, निर्विकार है तत्व ।।
वह सुख की औ ज्ञान से, भाव रखे आसक्ति।
देही को है बाँधता, रखता नहीं विरक्ति ।। 6

रज गुण राग स्वरूप है, तृष्णा से उत्पन्न ।
संग भाव से वह रहे, राजस रहे न भिन्न ।।
कर्मों की आसक्ति से, फल कर्मों की आस ।
देही को है बाँधता, कर्म सकाम प्रयास ।। 7

होता है अज्ञान से, तम गुण ये उत्पन्न ।
मोहित करता है सदा, करे बुद्धि को छिन्न ।।
नहीं ज्ञान कर्तव्य का, होता भ्रमित विवेक ।
देहधारियों में सदा, जागे है अविवेक।।
आलस-नींद-प्रमाद से, बँधते हैं सब जीव ।
उन्नति से वंचित रहें, जीवन हो निर्जीव ।। 8

सतगुण सुख से बाँधता, रज से कर्म सकाम ।
तमगुण ढँकता ज्ञान को, है प्रमाद का काम ।।
विजय करें हैं मनुज पर, गुण प्रवृत्ति आधार ।
जीव बँधा है घूमता, मुक्ती मिले न सार ।। 9

कर परास्त गुण अन्य को, सत गुण बने प्रधान ।
रज औ तम को दाब कर, करे जीव कल्यान।।
रज गुण बढ़ता जीव में, सत तम का हो ह्रास।
सत रज के ही ह्रास से, तम का होत विकास ।। 10

सब द्वारे यदि प्रकट हो, चित आनन्द प्रकाश ।
सतगुण समझो बढ़ गया, यदि विवेक है पास ।।
लोभ-प्रवृत्ति-अशांति औ, स्वार्थ-बुद्धि आरम्भ ।
आरम्भ कर्म सकाम से, रज वृत्ती प्रारम्भ ।।
प्रकट होत यदि मोह औ, जड़-प्रमाद उत्पत्ति।
होये लुप्त प्रकाश यदि, बढ़ता है तमवृत्ति ।। 11-13

देह छूटता मनुष का, बढ़ा हुआ जब सत्व ।
जाते निर्मल लोक में, स्वर्ग दिव्य-कर्तृत्व ।।
रजगुण में मरता यदी, पाता मानव योनि ।
तमगुण में यदि मर गये, मूढ़ योनि ही योनि।। 14-15

श्रेष्ठ कर्म का फल सदा, सात्विक निर्मल ज्ञान ।
दुःख है राजस कर्म का,तामस फल अज्ञान ।।
सत्वगुणे उत्पन्न है, ज्ञान रजोगुण लोभ ।
तमगुण से उत्पन्न हैं, मोह-प्रमादे-क्षोभ ।। 16-17

सतगुण स्थित पुरुष जो, जाते उच्चालोक ।
मानुष लोके रजगुणी, अधोगती तम शोक ।। 18

तीन गुणों के ना सिवा, देखे कर्ता और ।
मनुष विवेकी वह सदा, गुण ना उसका ठौर ।।
तीन गुणों से परे प्रभु, जाने जो यह तत्व ।
मम स्वरूप को प्राप्त वह, पाता है ब्रह्मत्व ।। 19

तीन गुणों को लाँघता, मुक्त होत हैं कष्ट ।
मृत्यु जरा औ जन्म से, छूटे मिले अभीष्ट ।।
तीन गुणों को लाँघ कर, प्राप्त होत अमरत्व ।
परमानंद अनंद हो, मिले उसे परमत्व ।। 20

अर्जुन उवाच

गुणातीत जो पुरुष हैं, किस लक्षण से युक्त ।
कैसे इनके आचरण, क्या उपाय उपयुक्त ।। 21

श्रीभगवानुवाच

यदि प्रवृत्त होते सभी, मोह-प्रवृत्ति-प्रकाश ।
नहीं द्वेष उसको रहे, यदि प्रवृत्ति आभास ।।
होते यदि ये लुप्त हैं, होयें सभी निवृत्ति ।
गुणातीत हैं ना करें, इच्छा और प्रवृत्ति ।। 22

उदासीन वत जो रहे, गुणातीत वह व्यक्ति ।
विचलित गुण से है नहीं,गुण से रहे विरक्ति ।।
गुण ही गुण में बरतते, सभी क्रिया सम्पूर्ण ।
निर्विकार स्थित रहे, निज स्वरूप परिपूर्ण ।। 23

आत्म भाव स्थित रहे, दुख सुख एक समान।
मिट्टी-पत्थर-स्वर्ण में, देखे दृष्टि समान ।।
ज्ञानी प्रिय औ अप्रिय को,माने एक समान ।
निन्दा-संस्तुति में सदा, रखता भाव समान ।। 24

माने औ अपमान में, सम है रहे विचार ।
मित्रम् वैरी शत्रु संग, रखता सम व्यवहार ।।
सर्वारम्भा त्याग के, रहे रहित अभिमान ।
कर्ता पन से रहित जो, गुणातीत वह जान ।। 25

अव्यभिचारिण भक्ति से, भजे निरंतर नित्य ।
तीनों गुण को लाँघ कर,ब्रह्म प्राप्त यह सत्य ।। 26

जो अविनाशी ब्रह्म है, शाश्वत अमृत धर्म ।
निराकार उस ब्रह्म का,सुख अखंड मम मर्म ।।
ऐकान्तिक सुख का सदा, मैं ही आश्रय एक।
मेरे रूप स्वरूप में, मिलती शान्ति अनेक ।। 27

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