काव्यानुवाद - श्रीमद्भगवद्गीता, तेरहवाँ अध्याय (क्षेत्रज्ञविभागयोग)

कॉरपोरेट लर्निंग्स
1. सम्पूर्ण ज्ञान का प्राप्त होना : श्री गीता जी के तेरहवें अध्याय को क्षेत्र – क्षेत्रज्ञ विभाग योग के नाम से जाना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को शरीर चाहे वह स्थूल हो, सूक्ष्म हो या कारण हो के सम्बन्ध में सम्पूर्ण रूप से ज्ञान उपलब्ध कराया है। यह सम्पूर्ण शरीर किन – किन तत्त्वों से मिलकर बना है, इस ज्ञान को प्राप्त करने का अवसर इस अध्याय से हमें प्राप्त होता है। इस सम्पूर्ण क्षेत्र को जो जानता है उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं, अर्थात् उसे सम्पूर्ण क्षेत्र का ज्ञान प्राप्त है और यह क्षेत्रज्ञ ही अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सत्ता है, वह चाहे लौकिक जगत से सम्बन्धित हो अथवा अलौकिक जगत से।
“क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम।।13.2।।”
इससे हम यह सीखते हैं कि हम जिस भी संस्था में कार्यरत हैं, जिस भी भूमिका में हैं, जिस भी क्षेत्र में अपना योगदान प्रदान कर रहें हैं, उसकी संरचना के बारे में, उसकी नीतियों के बारे में, उसके मिशन के बारे में, वैल्यूज के बारे में सम्पूर्ण रूप से ज्ञान प्राप्त होना सफलता के लिए अत्यावश्यक है। यदि हमें अपनी भूमिका के बारे में ही ज्ञान नहीं होगा तो किसी भी कार्य का निष्पादन उचित प्रकार से होना असम्भव प्रतीत होगा, तथा उस कार्य में हम अपने आप को पूर्णतया इन्वॉल्व नहीं कर पायेंगे और उस आनन्द से वंचित रहेंगे जो कार्य के सफलता पूर्वक समाप्ति पर प्राप्त होती है।
“तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत्। स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु।।13.3।।”
यह नेतृत्व की भूमिका है कि वह सम्पूर्ण ज्ञान को अपने प्रत्येक ह्यूमन कैपिटल को उनकी भूमिका के अनुसार उपलब्ध कराए, प्रशिक्षित करे और चुनौतियों के लिए तैयार करे। वह उस क्षेत्र के बारे में समस्त गुण और दोषों से अवगत कराए जिससे कि गुणों के आधार पर उन्नति और प्रगति को प्राप्त करे तथा दोषों को नियंत्रित कर ग्रोथ में भूमिका का उचित प्रकार से निर्वहन कर सके। प्रमाण के साथ ज्ञान को साझा करने से विश्वास को पूर्णता प्रदान करता है।
“ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्। ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चतैः।।13.4।।”
भगवान श्री कृष्ण ने चौबीस तत्त्वों के समुदाय को शरीर और उसके सात विकारों के बारे में विस्तृत रूप से चर्चा की है। जब तक सम्पूर्ण गुण और दोष का ज्ञान नहीं होगा, निर्णय लेना कठिन होता है। हमें अपने माइक्रो और मैक्रो एन्वायरमेंट के बारे में पता रहना चाहिए तभी एक सशक्त नेतृत्व की भूमिका को प्रदर्शित किया जा सकता है। हाल ही में यूरोपियन यूनियन के साथ किए गए समझौते विश्व पटल पर होने वाले विकारों के अध्ययन, उनके समाधान के विकल्पों को ध्यान में रखकर, एक बेहतर अवसरों को प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त किया है। जागरूकता सदैव ही समस्त समस्याओं के निदान में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करती है।
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः। मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते।।13.18।।
2. आदर्श नेतृत्व के गुण और विशेषताएं: इस अध्याय से हम यह आत्मसात कर सकते हैं कि एक कुशल नेतृत्व के लिए किन – किन गुणों का होना और किन – किन विशेषताओं का होना अत्यावश्यक है। भगवान श्री कृष्ण ने श्लोक संख्या 7 से लेकर श्लोक संख्या 11 तक बीस गुणों को प्रतिपादित किया है। अपने में श्रेष्ठता का भाव न होना, दिखावटीपन न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, अपने से श्रेष्ठ का सम्मान, आंतरिक एवं वाह्य पवित्रता, स्थिरता, मन का वश में होना, आसक्ति का न होना, अहंकार का न होना, दोषों का आत्म चिंतन एवं विश्लेषण करना आदि गुणों को किसी भी व्यक्ति के जीवन को उत्थान और ऊर्ध्व की ओर गति प्रदान करते हैं।
“अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्। आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः।।13.7।।……….
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्। एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा।।13.11।।“
3. नेतृत्व की विभिन्न भूमिकाएं: प्रत्येक व्यक्ति के विभिन्न प्रकार की भूमिकाओं का निर्वहन करना होता है और उसे प्रत्येक भूमिका के साथ न्याय करने की अपेक्षा होती है। इस अध्याय से हम यह सीखते हैं कि एक नेतृत्व किस प्रकार की भूमिकाओं में अपनी टीम से तादात्म्य स्थापित करता है:
टीम के साथ सम्बन्ध रखने से उपद्रष्टा की भूमिका, सम्मति और अनुमति देने से अनुमन्ता की भूमिका, भरण – पोषण करने से भर्ता की भूमिका, उनके संग सुख और दुःख भोगने से भोक्ता की भूमिका और अपने को उन सब का स्वामी मानने से महेश्वर की भूमिका का निर्वहन एक कुशल नेतृत्व से अपेक्षित है।
उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः।।13.22।।
तथा एक नेतृत्व सभी के प्रति समान भाव रखता है। सभी उसके लिए प्रिय होते हैं और अपनी – अपनी योग्यता के अनुसार महत्वपूर्ण होते हैं। नेतृत्व को उस आकाश के समान होना चाहिए जो सभी जगह व्याप्त है किंतु कहीं भी और किसी से लिप्त नहीं है तभी वह प्रभावशाली हो सकता है।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते। सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते।।13.32।।
4. लक्ष्य प्राप्ति के अनेक रास्ते: किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के कई मार्ग होते हैं और प्रत्येक नेतृत्व का यह दायित्व है कि वह अपनी संस्था, टीम के सदस्यों को उपलब्ध संसाधनों, उनकी शक्ति, गुण और कमजोरियों को दृष्टिगत रख कर उचित मार्ग अपनाने का प्रयास करे। भगवान श्री कृष्ण जीवन के सबसे श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चार प्रकार के मार्गों का प्रतिपादन किया है, उनमें से तीन मार्ग हैं – ध्यान योग, सांख्य योग और कर्म योग। कुछ व्यक्ति इन मार्गों के बारे में पूर्णतया नहीं जानते किन्तु वे चतुर्थ मार्ग को अपनाकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं और यह मार्ग है – सुनना और सुनकर उसके अनुसार आचरण करना। श्रेष्ठ व्यक्ति से सुनकर उन तत्त्वों को अपने जीवन में आचरण के रूप में आत्मसात करना परिपक्वता को प्रदान करता है। लिसनिंग प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण अंग है। एक अच्छा श्रोता होने के लिए गुणों का होना अत्यावश्यक है।
“तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।।13.25।।”
5. एकाग्रता: प्रत्येक समय लक्ष्य के प्रति समर्पण ही वांछित सफलता को प्रदान करता है।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।..समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।..।।13.27-28।।
(क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभाग का ज्ञान “विवेक” कहलाता है। जो साधक इस विवेक को महत्त्व देकर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभाग को ठीक – ठीक जान लेते हैं…….वे चिन्मय परमात्मतत्त्व को प्राप्त हो जाते हैं। – स्वामी रामसुखदास जी)
श्रीभगवानुवाच
हे अर्जुन कौन्तेय हे, यह शरीर अभिव्यक्त।
कहते इसको क्षेत्र हैं, कई तत्व संयुक्त।।
जो इसको है जानता, कहें उसे क्षेत्रज्ञ।
ज्ञानी जन हैं मानते, उसको ही सर्वज्ञ।। 1
हे अर्जुन तू जान यह, मुझको ही सर्वज्ञ।
सभी क्षेत्र का मैं सदा, सदा रहूँ क्षेत्रज्ञ।।
मेरे मत में ज्ञान यह, है यथार्थ यह ज्ञान।
क्षेत्रज्ञ क्षेत्र जो ज्ञान है, वही ज्ञान प्रज्ञान।। 2
जो है जैसा है तथा, जिन विकार से युक्त।
जिससे पैदा क्षेत्र है, जिससे वह संयुक्त।।
जैसा है क्षेत्रज्ञ भी, वैसा रहे प्रभाव।
मैं कहता संक्षेप सब, कैसे आविर्भाव।। 3
बहुत विधा विस्तार से, ऋषिभि: गाये गीत।
तत्व क्षेत्र क्षेत्रज्ञ का, वर्णन किया पुनीत।।
सभी वेद के मंत्र औ, विविध ऋचाएं छंद।
बहु प्रकार से व्यक्त है, पृथक पृथक आनंद।।
युक्ति युक्त निश्चित किये, ब्रह्म सूत्र पद युक्ति।
वर्णित हैं ये क्षेत्र जो, क्षेत्रज्ञ: अभिव्यक्ति।। 4
मूल प्रकृति अव्यक्त जो, अहंकार औ बुद्धि।
महाभूत हैं पाँच औ, इंद्रिय दस हैं विध्दि।।
इन्द्रि-विषय भी पाँच हैं, मन है केवल एक।
चौबिस तत्वों से बना, क्षेत्र यही है नेक।। 5
दुख-सुख इच्छा-द्वेष औ, प्राण-चेतना शक्ति।
धृति विकार सब सहित हैं, देह-क्षेत्र संक्षिप्त।। 6
क्षमा-अहिंसा-सरलता, भीतर-बाहर शुद्धि।
मन यदि वश में है रहे, शुद्ध रहे है बुद्धि।।
अहंकार ना श्रेष्ठ का, दम्भ भाव से दूर।
गुरु की सेवा भक्ति हो, वश में मन भरपूर।। 7
इन्द्रिय विषयों से रहे, रहे सदा वैराग्य।
अहंकार का भाव ना, यह अभाव सौभाग्य।।
जन्म-मृत्यु व्याधी-जरा, दुख दर्शन अनुभूति।
चिंतन और विचार से, राग दूर औ प्रीति।। 8
धन स्त्री घर पुत्र से, नहीं रहे एकात्म।
संग रहित ममता रहित, रहे भाव परमात्म।।
इष्ट-अनिष्टे प्राप्ति में, चित्त रहे सम भाव।
ना विकार उत्पन्न हों, होता नहीं प्रभाव।। 9
भक्ती मेरे प्रति रहे, रहे अनन्य प्रशान्त।
मुझमें ही तल्लीन हो, वास-शुद्ध-एकान्त।।
जन समूह से दूर हो, ना हो उनसे प्रीति।
मुझमें नितप्रति लीन हो, भक्ती उसकी नीति।।
नित्य निरन्तर वह रहे, आत्म ज्ञान तल्लीन।
तत्व ज्ञान के रूप में, परमात्म सर्व आसीन।।
तत्व ज्ञान परमात्मा, अध्यात्म ज्ञान ही ज्ञान।
ये सब ज्ञान ही ज्ञान हैं, बाकी सब अज्ञान।। 10-11
भली भाँति मैं कह रहा, जानो यह पर्याप्त।
जानो तुम उस ज्ञेय को, अति अनंद है प्राप्त।।
ज्ञेय ब्रह्म जो परम है, तत्व अनादी मान।
ना तो वह है असत ही, ना ही सत है जान।। 12
सभी जगह वे व्याप्त हैं, स्थित हैं सर्वत्र।
सभी ओर हैं हाथ औ, सभी ओर हैं नेत्र।।
सभी ओर हैं पैर भी, हैं सिर मुख औ कान।
स्थित होकर व्याप्त हैं, परमात्मा वह ज्ञान।। 13
मूलस्रोत है वह सदा, इन्द्रिय विषय-प्रकाश।
फिर भी इंद्रिय है रहित, परमात्मा अविनाश।।
पालनकर्ता जीव का, अनासक्त भगवान।
निर्गुण होकर भी सदा, भोक्ता सब गुणगान।। 14
बाहर भीतर वास है, सभी जीव परिपूर्ण।
वे ही चर हैं अचर भी, जग में हैं सम्पूर्ण।।
बहुत दूर पर हैं निकट, रहते साथ अनंत।
समझ नहीं आते प्रभू, सूक्ष्म रूप अत्यन्त।। 15
बिना भाग परमात्मा, स्वयं रहे अविभक्त।
सब जीवों में है दिखे, स्थित रहे विभक्त।।
योग्य-जानने है सदा, गुण उसके जो रूप।
भिन्न भिन्न स्वीकार पर, रहता एक स्वरूप।।
ब्रह्मा से उत्पन्न हैं, सभी भूत संसार।
पालन पोषण विष्णु सा, रुद्र रूप संहार।। 16
सब ज्योतिन के ज्योति हैं, तम से हैं अति दूर।
ज्ञानस्वरूप व ज्ञेय हैं, बसते हृदय – शरीर।।
तत्व ज्ञान से प्राप्त को, करने के हैं योग्य।
साधन कोई और ना, करता प्राप्त सुयोग्य।। 17
क्षेत्र ज्ञान औ ज्ञेय को, कहा गया पर्याप्त।
तत्व रूप से जानकर, मम स्वरूप है प्राप्त।। 18
प्रकृति पुरुष दोनों सदा, समझो इन्हें अनादि।
प्रकृती से उत्पन्न हैं, गुण विकार इत्यादि।।
कार्य-करण उत्पन्न में, प्रकृती बनती हेतु।
सुख दुख भोक्तापन रहे, पुरुष बना है हेतु।। 19-20
प्रकृति मध्य में पुरुष ही, भोगे त्रिगुण पदार्थ।
ऊँचे – नीचे योनि में, जन्म लेत हैं पार्थ।।
उपद्रष्टा है वह सदा, परमात्मा भी जान।
भर्ता भोक्ता महेश्वर:, अनुमन्ता भगवान।।
देहे स्थित जीव पर, बन्धन से निर्लिप्त।
वास्ता ना है देह से, नहीं क्रिया में लिप्त।। 21- 22
इस प्रकार जो पुरुष को, समझे मनुज सुजान।
गुणों सहित जो प्रकृति को, जाने तत्व महान।।
जन्म नहीं लेता पुन:, मुक्ति उसे है प्राप्त।
सब प्रकार के कर्म से, निर्विकार को प्राप्त।। 23
अनुभव करते परम को, विविधे विविध प्रकार।
कई सांख्य औ कर्म से, करें योग आचार।।
करते हैं कुछ मनुष वे, परम तत्व का ध्यान।
स्वयं आप ही आप में, परमात्मा का ज्ञान।। 24
और नहीं जो जानते, ऐसे विविध प्रकार।
महापुरूष से वे सुने, तत्व ज्ञान आचार।।
सुनकर करें उपासना, करें तत्व व्यवहार।
मृत्यु रूप संसार से, तरते भव से पार।। 25
भरत वंश में श्रेष्ठ हे, समझ ठीक से बात।
प्राणी जो उत्पन्न हैं, थावर जंगम ज्ञात।।
क्षेत्रज्ञ क्षेत्र का मिलन जब, होता है संयोग।
इन्हीं तत्व संयोग से, तादात्म्य बना उद्योग।। 26
नष्ट होते सब भूत में, जो देखे यह भाव।
नाश रहित वह परम है, उसका यही स्वभाव।।
है स्थित सम भाव से, सभी चराचर जीव।
वही सत्य है देखता, यही यथार्थ अतीव।। 27
है स्थित समरूप से, सभी जगह है व्याप्त।
ईश्वर है सम भाव से, सभी जीव को प्राप्त।।
जो पुरुष करता नहीं, हत्या स्वयं कि आप।
परमात्मा को प्राप्त वह, प्रभु का मिले प्रताप।। 28
प्रकृती करती है सभी, सभी क्रियायें कर्म।
जो देखे है पुरुष यह, प्रकृती के गुण धर्म।।
जो समझे सब कर्म को, करे प्रकृति हे पार्थ।
आत्मा कर्ता है नहीं, देखे वही यथार्थ है।। 29
एक प्रकृति स्थित सभी, पृथक पृथक सब भाव।
देखे हैं इन भाव को, प्रकृती एक प्रभाव।।
उसी प्रकृति से देखता, भूतों का विस्तार।
उसी काल वह पुरुष है, प्राप्त ब्रह्म अविकार।। 30
कुन्ती नन्दन ! पुरुष ये, है अनादि यह मुक्त।
अविनाशी निर्गुण सदा, रहे देह हर वक्त।।
करता कुछ है यह नहीं, ना होता है लिप्त।
शाश्वत दिव्य अनादि है, भोगों से निर्लिप्त।। 31
बहुत सूक्ष्म आकाश सा, सभी जगह है व्याप्त।
लिप्त नहीं है वह कहीं, यही भाव पर्याप्त।।
ऐसे ही सब जगह वो, है निर्गुण यह आत्म।
लिप्त नहीं है देह से, आत्मा ही परमात्म।। 32
जैसे एकहि सूर्य से, चमके है संसार।
पूर्ण प्रकाशित जगत यह, सूर्य एक आधार।।
वैसे ही आत्मा सदा, करे प्रकाशित क्षेत्र।
चेतनता से व्याप्त है, प्रकाश देह सर्वत्र।। 33
देखे समझे जो सदा, जाने बूझे गूढ़।
अंतर है यदि जानता, बुद्धिमान ना मूढ़।।
क्षेत्रज्ञ क्षेत्र का भेद जो, जाने वही विवेक।
भूत प्रकृति के मोक्ष को, जाने हैं कुछ एक।।
मुक्त होत हैं प्रकृति से, कार्य सहित अलगाव।
अनुभव यदि साधक करे, प्रभु का प्रादुर्भाव।।
ज्ञान चक्षु से जानता, जाने जो है भेद।
परमात्मा को प्राप्त वह, प्राप्त ब्रह्म सब वेद।। 34
राकेश शंकर त्रिपाठी, कानपुर
