उत्तर और दक्षिण का पद चिन्ह

भारत उपमहाद्वीप की विविधता में चारों दिशाओं ने अपनी प्रकृति से मानव संतति, संसाधनों से व वैविध्य संस्कृति से संपन्न छटा बिखेरी हुई हैं। अक्सर ये कहा जाता है कि भारत विविधताओं से भरा देश है, पर यह विविधताएं, विवशताएं भी बन गई हैं साथ ही कहीं कहीं अलगाववादी राजनीति का केंद्र भी हो गई हैं। तरह-तरह की बोली-वाणी के साथ जातिगत विभिन्नता ने केंद्रीकरण को लोकतंत्र की एकरूपता बढ़ाने की जगह लड़ाने के उपकरण के तौर पर नेताओं का हाथ मजबूत किया है। राष्ट्रीयता का भाव बिना कड़े प्रशासनिक अनुशासन, देशभक्ति का जज्बा और एक देश, एक कानून व दंड भय के बगैर खोखला हो जाता है। इसी खोखलेपन का जीता जागता उदाहरण है कि कई बार भारतीय नागरिक की पहचान अखिल भारतीय स्तर पर भी प्रांतीय पहचान के आधार पर परिसिमित करके तय की जाती है। राष्ट्रीयता की राष्ट्र पहचान, एक नागरिक की एकल पहचान, एक भारतीय होने की सर्वमान्य स्वीकृति को अनदेखा किया जाता है। तमाम स्कूल, कालेज अथवा अन्य संस्थाओं, प्रतिष्ठानों में इतने दस्तावेज प्रांत के भ्रांत कर दिए जाते हैं कि देश का युवक स्वयं की राष्ट्रीय पहचान ही भूल जाता है।
लोकतंत्र मे केंद्रीकरण और एक पहचान का सवाल आधुनिकता की 21 वीं सदी मे ज्यों का त्यों है। इस ओर जब तक हम जागरूक होने को 15 अगस्त, 26 जनवरी में तैयार किए जाते हैं, तब तक हमे एक अलग प्रांत का निवासी होने का भरपूर बोध करा दिया जाता है। इस बोझ तले हमारी भारतीय नागरिक की अखिल भारतीय राष्ट्र पहचान दबी कुचली जात पात के रिवायतों, दकियानूसी भाषाई मतवादों और अलगाववादी मानसिकता की भेंट चढ़ चुकी होती है। रोजगार का मसला प्रांतों के आपसी द्वेष भावना को और बढ़ा देते हैं। चरों तरफ की अराजक स्थिति ने भारत की पहचान को हमसे छीन रखा है। हम किस भारत के भारतीय होने की दावेदारी करते हैं, और हमारी नागरिक मानसिकता कैसी विरोधाभासी बना दी गई है – कि जब हम विदेश की यात्रा कर रहे होते हैं तो हम वहां कचड़ा यहां वहां फेकने, नदी प्रदूषित करने, कहीं भी थूक देने से बचते हैं, क्योंकि हमे उस देश के कानून का दण्ड भय होता है। पर वही नागरिक अपने देश लौट कर स्वछंद आचरण कर लोकतांत्रिक पहचान को दूषित करते हैं। न सिर्फ भारत छोड़ना चाहते है बल्कि NRI बनकर बसने की चाह रखते हैं। जो देशवासी और उनके राजनेता आका यहां मनमानी करने की छूट देते हैं, वे कूड़ा कचड़े से भरे शहर की अनदेखी कर रैली के दौरान वहां कपड़े का टैंट व तंबू तनवा देते हैं और जनता भी अपने क्षेत्रीय नेता की कारगुजारियों में स्वागत हेतु वाहवाही का गान करती भीड़ जुटाएं खड़े रहती है – जैसे की अब रथ पर सवार यात्रा जगन्नाथ के द्वारा चढ़े भोग का प्रसाद उनके लल्लू लाल समर्थक अंधभक्त कार्यकर्ता और चाटुकारों को बंटने वाला है।
इस चलती राजनीतिक की चक्की में गेंहू के साथ साथ आम जनता रूपी घुन भी पिसती है क्यों कि उसे किसी तबके की दलगत राजनैतिक पार्टी का फायदा नहीं मिलने वाला और ना ही आधार कार्ड का फायदा मिलने वाला है। स्वयं एकता और एकल प्रभाव के मजबूत हुए यह देश की माटी विभिन्न तरह की राजनीतिक चालबाजियों का यूं ही शिकार होती रहेगी।
यदि एक केंद्र का, एक राष्ट्र पहचान पूरे भारत में मजबूती से न व्याप्त हुआ तो उत्तर के हिंदी राज्यों और दक्षिण के राज्यों के बीच भाषा, संस्कृति, आधुनिकीकरण, साक्षरता दर, विकास में यूं ही मतभेद और अंतर उजागर होते रहेंगे। पर बाजी अंततः समृद्ध आधुनिक विकास नियोजन के तथा औद्योगिक रोजगार के मामलों इत्यादि में दक्षिण के राज्य ही काबिज करेंगे। चूंकि उत्तर भारत के राज्य मुख्यत्तः दुग्ध उत्पादन व अन्न उत्पादन पर ही निर्भर हैं और यह हम सब जानते हैं कि उत्तर भारतीय किसानों की दयनीय आर्थिक परिस्थिति ने उन्हें आत्म हत्या करने पर कितना बाध्य किया है। उत्तर भारतीय राज्यों की खेती-किसानी का बंटाधार है। उत्तर भारतीय धर्म, सांप्रदायिकता की राजनीतिक, जातिगत राजनीति के अलगाव व जनसंख्या बहुलता के प्रभाव के साथ ही साथ निरक्षरता दर का खामियाजा कागजी साक्षरता दर की अव्यवहारिकता से पस्त है। उतर भारत की राजनीति व उसके नेता, दक्षिण भारत की राजनीति और नेता के बीच नीयत, नैतिकता, शिक्षा, रुचि, इच्छाशक्ति और जनसेवा इत्यादि कई आयामों में मूलभूत अंतर उनके अपने राज्यों में किए गए उनके उद्घाटन के अमली जामों, उपलब्धियों, विकास सूचकांक GDP में योगदान के महान अंतर से स्वमेव उजागर है। जबकि सांप्रदायिक दंगो के मामलों में उत्तर भारत की राजनीति आग उगलती दिखती है। आपराधिक वारदातों की वृद्धि व राजनैतिक अस्थिरता तथा अवसर संरचना का अभाव इसके सर्वश्रेष्ठ बनने के दायरे को सीमित कर मात्र वोट बैंक की समृद्ध भीड़ के रूप में ही एक उत्तर भारतीय होने के साथ उत्तर भारत का होने की पहचान दे रहे हैं। उत्तर प्रदेश इस मामले मे अपनी कुख्यात पकड़ से बदनाम है और नेता गिरी का अड्डा भी कई सालों से बना हुआ है। पर फिर भी उसका विकास दक्षिण भारत के किसी राज्य के मुकाबले पिछड़ा ही कहेंगे। यदि विश्वमंच पर काम कर रहे CEO के रूप में हम नामचीन नामों को देखें तो सब दक्षिण भारत के राज्यों के हैं, तथा वहां की शिक्षा से पोषित ग्लोबल बदलाव करने वाले व्यक्तियों में से एक हैं – चाहे सुंदर पिचई हों या सत्या नडेला हों, चाहे शांतनु नारायण हों या अरविंद कृष्ण। तमिलनाडु में विदेशी उद्योग का निवेश एप्पल कंपनी का हुआ है, तमिनाडू देश का पहला ऐसा राज्य बना जिसने प्राइमरी स्कूल में दोपहर का भोजन देना शुरू किया।
चेन्नई को भारत का डेट्राइट कहते हैं। उत्तर भारत के भारी जनसंख्या का श्रमबोझ भारत के कई अन्य राज्य उठा रहे हैं। मुंबई जैसे वित्तीय राजधानी कहलाने वाले आधुनिक शहर में रोजगार के नाम पर इनका विरोध क्षेत्रीय नेता व दलों ने शुरू कर दिया है। पूरे भारत का सबसे गरीब राज्य बिहार है। यू पी की जनसंख्या में वृद्धि पलायन तथा बिहार में भी अराजक स्थिति द्वारा भ्रष्ट प्रशासन से पलायन होना जारी है। सबसे कम आर्थिक तरक्की करने वाले राज्यों में पहले स्थान में बिहार राज्य बना हुआ है। हमें यह समझना होगा उत्तर भारत की जन-बल, प्रजनन ताकत के बूते यहां के नेता अपना मनमाना हित साध रहे हैं और उत्तर भारत की जनता की कमियों, मजबूरियों का फायदा उठा रहे हैं। उनके समाज को धर्म, जाति, भाषा, सांप्रदायिकता के नाम पर अराजक बना रहे हैं। उन्हें अशिक्षित और कुपोषित रखने का षडयंत्र भारत में स्वस्थ लोकतंत्र के निर्माण व एक अखिल भारतीय पहचान, एकता में सबसे बड़ा सेंधमारी कर रही है। उत्तर भारत, दक्षिण भारत से पिछड़ा रो रहा है और अपनी समृद्ध राष्ट्र की एकल पहचान खो रहा है।
