आधुनिक युग में आत्मबोध की अनिवार्यता

अवनीश कुमार गुप्ता, प्रयागराज

मनुष्य जब तक स्वयं को “शरीर” मानता है, तब तक रोग, दुख, मोह और माया उसे सताते हैं। यह देह नश्वर है, किन्तु आत्मा सनातन और शाश्वत है। जब आत्मा का प्रकाश प्रकट होता है, तब विष भी अमृत हो जाता है। जीवन में हित-अहित का बंधन केवल दृष्टि का फेर है—जो हमें पीड़ा देता है, वह हमारे भीतर की ममता और धैर्य का परीक्षण कर रहा होता है, और जो सुख देता है, वह हमारे कर्तव्य और सेवा का स्मरण करा रहा होता है। सिद्ध ऋषि की दृष्टि में न कोई पराया है, न कोई अपना। जो प्रेम करता है, वह आत्मा का प्रकाश है, और जो कष्ट देता है, वह आत्मा की परीक्षा।

जब कोई व्यक्ति सांसारिक मोह-माया में उलझा रहता है, तब उसका चित्त चंचल होता है। सुख और दुख के द्वंद्व में फँसकर वह कभी आह्लादित होता है तो कभी व्यथित। किन्तु जो इन दोनों से परे हो जाता है, वही सच्चे अर्थों में जीवन का तत्व जानता है। समुद्र की तरह धैर्य रखो—लहरें आएंगी, जाएंगी, किन्तु उसका विस्तार सदा अटल रहेगा। मन की स्थिरता ही आत्मा का बोध कराती है। जब मन अडिग हो जाता है, जब मनुष्य सुख-दुख में समान हो जाता है, तब ही वह आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है।

“यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः।।” (भगवद्गीता 6.19)

अर्थात् जिस प्रकार वायु से रहित स्थान में रखा दीपक नहीं टिमटिमाता, उसी प्रकार योगी का चित्त भी परमात्मा में स्थिर रहता है।

सिद्ध ऋषि अपने आंतरिक अनुभव से जानते हैं कि जीवन केवल कर्म का विस्तार नहीं, अपितु आत्मा की यात्रा है। यह यात्रा तभी सफल होती है जब मनुष्य बाह्य परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना अपने भीतर के प्रकाश को अनुभव करता है। तूफानों से जूझकर जो खड़ा रहता है, वही आत्म-तत्व को जानता है। जब तक कोई सहारा खोजता है, तब तक वह बंधनों में है; जब अपने भीतर ही संबल पा लेता है, तब मुक्त हो जाता है।

जीवन के प्रति एक ऋषि की दृष्टि समत्व में स्थित होती है। न वह किसी से घृणा करता है, न किसी से आसक्ति रखता है। वह जानता है कि संसार क्षणभंगुर है और यहां सब कुछ परिवर्तनशील है। किन्तु वह परिवर्तनशीलता में ही शाश्वतता को देखता है। उसके लिए जीवन की प्रत्येक परिस्थिति एक साधना है—कष्ट भी उतना ही आवश्यक है जितना सुख। जिस प्रकार सोने को तपाकर कुंदन बनाया जाता है, उसी प्रकार आत्मा भी दुख और संघर्षों की अग्नि में तपकर ही तेजस्वी होती है।

उदाहरण स्वरूप, महर्षि वशिष्ठ का जीवन कठिनाइयों से भरा था, किन्तु वे कभी विचलित नहीं हुए। जब राजा विश्वामित्र ने उनके तप को भंग करने का प्रयास किया, तब भी वे समत्व में स्थित रहे। इसी प्रकार, महात्मा विदुर ने महाभारत में धृतराष्ट्र को सत्य का बोध कराया, भले ही वे स्वयं राजसत्ता से दूर रहे। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि जो सच्चे आत्मज्ञानी होते हैं, वे किसी भी परिस्थिति में अपनी बुद्धि और धैर्य को स्थिर रखते हैं।

सिद्ध ऋषियों का जीवन इस सत्य को प्रकट करने का माध्यम रहा है। उन्होंने दिखाया कि यदि मनुष्य अपने कर्मों को निष्काम भाव से करता है, यदि वह किसी भी परिस्थिति में समता भाव बनाए रखता है, तो वह अपने भीतर दिव्यता को प्रकट कर सकता है। यह दिव्यता ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है। जब तक हम बाह्य जगत के सुख-दुख, लाभ-हानि, निंदा-स्तुति में उलझे रहते हैं, तब तक हम अपनी आत्मा के स्वरूप को पहचान नहीं सकते। किन्तु जब हम इन सबसे ऊपर उठ जाते हैं, तब हमारा चित्त शांत हो जाता है और हम ब्रह्म-तत्व में स्थित हो जाते हैं।

“न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।” (भगवद्गीता 2.20)

अर्थात् आत्मा न कभी जन्म लेती है और न ही मरती है। वह नित्य, सनातन और अविनाशी है। शरीर के नष्ट होने पर भी वह नष्ट नहीं होती है।

आधुनिक मानव जीवन की चुनौतियाँ और समाधान
आधुनिक युग की विसंगतियों ने मनुष्य को बाहरी उपलब्धियों के पीछे अंधी दौड़ में धकेल दिया है, जहाँ उसकी आत्मा प्यासे पथिक की भाँति भटक रही है। इस प्रतिस्पर्धी संसार में हर व्यक्ति सुख की खोज में भाग रहा है, परंतु उसके भीतर एक रिक्तता बनी रहती है। यह रिक्तता तब तक बनी रहेगी जब तक मनुष्य आत्मबोध से विमुख रहेगा। वास्तविक सुख बाहरी भौतिक पदार्थों में नहीं, बल्कि अंतर्मन की स्थिरता में है। किन्तु दुर्भाग्यवश, आज का मानव अपने मन को ही समझ नहीं पा रहा। निरंतर मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद उसके जीवन के अभिन्न अंग बन चुके हैं। उसकी चेतना बाह्य आकर्षणों में उलझी हुई है, और वह भूल गया है कि आत्मिक शांति केवल आत्मबोध से ही संभव है। योग, ध्यान और स्वानुशासन आत्मा की शुद्धि के मार्ग हैं, किन्तु आज मनुष्य इन्हें उपेक्षित कर चुका है। उसका मन क्षुब्ध है, और उसकी चेतना विक्षिप्त हो चुकी है, क्योंकि उसने स्वयं को संसार की अस्थिरता के अधीन कर दिया है।

नैतिक मूल्यों की गिरावट भी आधुनिक मानव के पतन का प्रमुख कारण है। जब मनुष्य सत्य से विमुख होकर छल-कपट और स्वार्थ में लिप्त हो जाता है, तब उसका हृदय कलुषित हो जाता है। लालच और असंतोष उसे क्षणिक सुखों की ओर धकेलते हैं, और वह भूल जाता है कि सच्चा आनंद केवल त्याग और सेवा में निहित है। सिद्ध ऋषियों ने यह बताया कि जो देता है, वही पाता है; जो परोपकार करता है, वही शाश्वत संतोष का अनुभव करता है। महर्षि दधीचि ने अपनी अस्थियों तक का दान कर दिया, क्योंकि वे जानते थे कि देह नश्वर है, किन्तु त्याग अमर रहता है। आज की दुनिया में यदि मनुष्य इस सत्य को समझ ले, तो समाज में प्रेम, करुणा और सहिष्णुता का पुनः संचार हो सकता है।

शारीरिक अस्वास्थ्यता भी आधुनिक जीवन की एक विकराल समस्या बन चुकी है। जंक फूड, अनियमित दिनचर्या और व्यायाम की उपेक्षा ने मनुष्य को रोगों का घर बना दिया है। उसका शरीर विषाक्त हो गया है, और मनुष्य प्रकृति से कटकर कृत्रिम जीवनशैली में जी रहा है। प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान हमें सिखाता है कि शरीर केवल भोग का साधन नहीं, अपितु आत्मा का मंदिर है। जब तक हम इसे स्वस्थ और संतुलित नहीं रखेंगे, तब तक आत्मा की उच्च चेतना का अनुभव नहीं कर सकते। योग, प्राणायाम और सात्त्विक भोजन हमें केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक रूप से भी सशक्त बनाते हैं। आधुनिक मानव यदि पुनः इन सिद्धांतों को अपनाए, तो वह अपने भीतर स्थायी ऊर्जा और स्वास्थ्य का संचार कर सकता है।

परिवारिक विघटन भी आज के समाज का एक कटु सत्य बन गया है। पहले जहाँ परिवार प्रेम, एकता और संस्कारों का केंद्र होता था, वहीं आज वह एक औपचारिक संस्था मात्र बनकर रह गया है। सहनशीलता, परस्पर सम्मान और संवाद की कमी के कारण पारिवारिक संबंध कमजोर हो रहे हैं। माता-पिता अपने बच्चों को बाह्य शिक्षा तो देते हैं, परंतु उन्हें आत्मबोध और आध्यात्मिक मूल्यों का पाठ नहीं पढ़ाते। इस विघटन का मूल कारण अहंकार और स्वार्थ है। यदि हम अपने भीतर प्रेम, करुणा और समर्पण का भाव जागृत करें, तो पारिवारिक ताने-बाने को पुनः सुदृढ़ बना सकते हैं। ऋषियों ने कहा है कि जो दूसरों के लिए जीता है, वही सच्चे अर्थों में जीवन को जानता है।

सिद्ध ऋषियों का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन काल में था। जब तक मनुष्य बाह्य पदार्थों को ही सुख का कारण मानता रहेगा, तब तक वह आत्मिक शांति से वंचित रहेगा। आत्मसाक्षात्कार ही सच्ची उपलब्धि है। जो स्वयं को जान लेता है, वह संसार के समस्त भ्रमों से मुक्त हो जाता है। इस अस्थिर और परिवर्तनशील जगत में केवल आत्मा ही शाश्वत है। अतः जागो! अपने भीतर झाँको! सत्य का प्रकाश तुम्हारे ही भीतर है, उसे अनुभव करो, और अपने अस्तित्व के वास्तविक स्वरूप को पहचानो।

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