सेवन सिस्टर्स: सीमा नहीं, भारत की संवेदना

सतना
आज जब भारत विज्ञान, तकनीक, अंतरिक्ष अनुसंधान, डिजिटल क्रांति और वैश्विक कूटनीति के मंच पर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है, उसी समय हमारे सामाजिक मानस में एक ऐसा मौन घाव भी मौजूद है, जिसकी पीड़ा अक्सर शब्दों में प्रकट नहीं होती। यह घाव है अपने ही देश के उत्तर–पूर्वी राज्यों, जिन्हें हम प्रचलित रूप से सेवन सिस्टर्स कहते हैं, को अनजाने में ‘अलग’ मान लेने की प्रवृत्ति। यह अलगाव किसी सरकारी नीति से नहीं, बल्कि दृष्टि और संवेदना की कमी से जन्म लेता है। आँखों की आकृति, त्वचा का रंग, पहनावे की शैली या बोली की ध्वनि—इन सतही भिन्नताओं के आधार पर जब कोई भारतीय, किसी अन्य भारतीय को ‘पराया’ कह देता है, तब केवल एक व्यक्ति नहीं टूटता, बल्कि भारत की आत्मा सिसकती है। यह प्रश्न केवल सामाजिक शिष्टाचार का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संस्कार और सामूहिक चेतना का है।
भारतवर्ष को यदि केवल नक्शे में सीमाओं के भीतर समेटकर देखा जाए, तो यह दृष्टि अधूरी ही नहीं, अन्यायपूर्ण भी है। भारत एक भू-राजनीतिक संरचना से कहीं अधिक एक जीवंत सभ्यता है, जो सहस्राब्दियों से विचार, विश्वास और मूल्य की धारा के रूप में प्रवाहित होती रही है। ‘भारत’ शब्द स्वयं इस सत्य को उद्घाटित करता है—संस्कृत की ‘भा’ धातु, जिसका अर्थ है प्रकाश और ज्ञान, तथा ‘रत’, अर्थात उसमें रत होना। इस प्रकार भारत वह भूमि है, जो ज्ञान, करुणा और धर्म के प्रकाश में रत रहने की साधना करती है। यह साधना किसी एक क्षेत्र, भाषा या वेशभूषा तक सीमित नहीं हो सकती। इस दृष्टि से उत्तर–पूर्व भारत का कोई कोना नहीं, बल्कि उसी चेतना का अभिन्न अंग है। प्राचीन भारतीय दृष्टि में उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम केवल दिशाएँ थीं, दीवारें नहीं।
वैदिक परंपरा इस एकत्व की भावना को स्पष्ट शब्दों में उद्घोषित करती है। ऋग्वेद का मंत्र—“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्”—मानव समाज के लिए केवल एक नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन का सूत्र है। साथ चलना, साथ बोलना और मनों का एक होना, यही भारतीय सभ्यता का मूल स्वर है। यहाँ विविधता को कभी विखंडन का कारण नहीं माना गया, बल्कि सौंदर्य और शक्ति का स्रोत समझा गया। उत्तर–पूर्व की भाषाएँ, लोकगीत, नृत्य, पर्व और जीवन-शैली इसी विविधता का जीवंत प्रमाण हैं।
उत्तर–पूर्व भारत का भारतीय परंपरा से संबंध केवल राजनीतिक या प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक है। असम का कामरूप क्षेत्र प्राचीन काल से शक्ति-साधना का केंद्र रहा है। कामाख्या पीठ आज भी इस बात का साक्ष्य है कि वैदिक मंत्र, तांत्रिक साधना और प्रकृति-पूजन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यहाँ शक्ति किसी आक्रामक सत्ता का प्रतीक नहीं, बल्कि सृजन, करुणा और संतुलन की चेतना है। ‘या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता’ का भाव केवल श्लोक में नहीं, जनजीवन में प्रत्यक्ष दिखाई देता है।
अरुणाचल प्रदेश को प्राचीन ग्रंथों में प्राग्ज्योतिष कहा गया—वह भूमि जहाँ सबसे पहले सूर्य का प्रकाश पड़ता है। यह कथन केवल खगोलीय या भौगोलिक तथ्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संकेत है। प्रकाश यहाँ केवल सूर्य का नहीं, ज्ञान और चेतना का भी है। जिस भूमि को आलोक की प्रथम भूमि कहा गया हो, उसे भारत की आत्मा से पृथक मानना, स्वयं भारतीय दृष्टि को नकारने जैसा है।
मणिपुर के संदर्भ में भारतीय स्मृति और भी सजीव हो उठती है। महाभारत की कथा हमें बताती है कि अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा मणिपुर की राजकुमारी थीं। यह तथ्य केवल वैवाहिक संबंध का उल्लेख नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकात्मता का प्रमाण है। महाभारत भारत की सामूहिक स्मृति है और मणिपुर उस स्मृति का अविच्छिन्न भाग। जो मणिपुर को भारत से अलग मानता है, वह अनजाने में अपनी ही ऐतिहासिक चेतना से कट जाता है।
संस्कृति का अर्थ केवल बाहरी आडंबर, उत्सव या परिधान नहीं, बल्कि वह संस्कार है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। उत्तर–पूर्व की संस्कृतियों में प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा दिखाई देती है। पर्वत, नदियाँ, वन और वृक्ष वहाँ केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन के सहचर हैं। सामूहिक जीवन, सहभागिता और संतुलन वहाँ के समाज की विशेषता है। यह वही वैदिक दृष्टि है, जो अथर्ववेद के वाक्य में प्रकट होती है—“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” आधुनिक पर्यावरणीय चिंतन जिसे अब सीखने का प्रयास कर रहा है, उत्तर–पूर्व की जीवन-शैली उसे सदियों से जीती आ रही है।
इसके बावजूद, सामाजिक अज्ञान और भौगोलिक दूरी से उपजे पूर्वाग्रह आज भी हमारे व्यवहार में दिखाई देते हैं। कभी यह मज़ाक के रूप में सामने आता है, कभी संदेह के रूप में, तो कभी खुले भेदभाव के रूप में। किसी की आँखें छोटी हों, तो उसे विदेशी मान लेना; किसी की हिंदी में लहजा अलग हो, तो उसकी देशभक्ति पर प्रश्न उठा देना—ये सभी प्रवृत्तियाँ केवल व्यक्ति विशेष को नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र को क्षति पहुँचाती हैं। राष्ट्र भावना का मूल्यांकन चेहरे की बनावट या भाषा की ध्वनि से नहीं, बल्कि आचरण, समर्पण और संवेदना से होना चाहिए।
उत्तर–पूर्व भारत का योगदान केवल सांस्कृतिक ही नहीं, राष्ट्रीय जीवन के हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण रहा है। सीमाओं की रक्षा में वहाँ के लोगों ने सदैव अग्रिम पंक्ति में रहकर भूमिका निभाई है। जैव-विविधता का संरक्षण, जल-संसाधनों का संतुलन और पूर्वी एशिया से भारत के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संपर्क—इन सबकी आधारभूमि यही क्षेत्र है। सीमांत पर रहकर भी वहाँ के समाज ने भारत को केंद्र माना है। यह विश्वास किसी तात्कालिक प्रचार का परिणाम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे संस्कारों की देन है।
यदि इस मानसिक दूरी को समाप्त करना है, तो समाधान केवल नीतिगत घोषणाओं में नहीं, बल्कि संवेदना के विकास में है। शिक्षा प्रणाली में उत्तर–पूर्व के इतिहास, लोककथाओं और योगदान को यथोचित स्थान मिलना चाहिए। साहित्य और मीडिया को भी सनसनी और सतही प्रस्तुति से ऊपर उठकर आत्मीयता की भाषा अपनानी होगी। जब पहचान को सम्मान मिलेगा, तब अलगाव स्वतः समाप्त हो जाएगा।
भारत की भौगोलिक वास्तविकता को समझे बिना उत्तर–पूर्व भारत की संवेदना को पूर्णतः समझ पाना भी कठिन है। तथाकथित ‘चिकन नेक’ या सिलीगुड़ी कॉरिडोर केवल एक संकीर्ण भू-पट्टी नहीं है, बल्कि वह नाल है जिसके माध्यम से भारत का हृदय और उत्तर–पूर्व की चेतना एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। लगभग 20–25 किलोमीटर चौड़ा यह गलियारा, जो उत्तर–पूर्वी राज्यों को शेष भारत से जोड़ता है, अक्सर रणनीतिक चिंता के रूप में देखा जाता है, पर वस्तुतः यह भावनात्मक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
चिकन नेक को केवल सुरक्षा के चश्मे से देखना उत्तर–पूर्व के यथार्थ को संकुचित करना है। यह मार्ग केवल सेनाओं की आवाजाही या आपूर्ति का रास्ता नहीं, बल्कि विचारों, संस्कारों, रिश्तों और स्मृतियों का सेतु है। इसी मार्ग से शिक्षक, विद्यार्थी, कलाकार, सैनिक, व्यापारी और साधारण परिवार सदियों से आते-जाते रहे हैं। इसी संकीर्ण पट्टी ने उत्तर–पूर्व को कभी भारत से अलग नहीं होने दिया, चाहे भौगोलिक दूरी कितनी ही चुनौतीपूर्ण क्यों न रही हो।
वस्तुतः चिकन नेक भारत को यह निरंतर स्मरण कराता है कि उत्तर–पूर्व कोई परिधि नहीं, बल्कि राष्ट्र की संवेदनशील नाड़ी है। यदि यह नाड़ी स्पंदित है, तो राष्ट्र जीवित है। इसे कमजोर मानना या इसे केवल ‘रणनीतिक जोखिम’ कह देना, उस मानवीय सच्चाई की अनदेखी है कि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं, संपर्क और विश्वास से बनते हैं।
जब हम उत्तर–पूर्व के प्रति उपेक्षा या उपहास का व्यवहार करते हैं, तो हम अनजाने में इसी सेतु पर दरार डालते हैं। चिकन नेक का संकुचित होना केवल भूगोल की समस्या नहीं, चेतना का संकट बन सकता है। इसलिए उत्तर–पूर्व को समझना, सम्मान देना और आत्मीयता से जोड़ना राष्ट्रीय सुरक्षा से भी बड़ा सांस्कृतिक उत्तरदायित्व है।
भारत को यदि एक जीवित देह के रूप में देखा जाए, तो उत्तर–पूर्व उसकी धड़कन है और चिकन नेक उसकी वह नाड़ी है, जिसके बिना यह धड़कन शेष शरीर तक नहीं पहुँच सकती। यदि काशी उसकी आत्मा है, तो कामाख्या उसकी शक्ति है। यदि गंगा उसकी शिरा है, तो ब्रह्मपुत्र उसका प्राण है। यदि राम मर्यादा के प्रतीक हैं, तो उत्तर–पूर्व भारत की मौन साधना है—वह साधना जो बिना शोर किए, बिना प्रदर्शन के, राष्ट्र को भीतर से जीवित रखती है।
भारतीय परंपरा का अंतिम और शाश्वत संदेश स्पष्ट है—“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।” अपने-पराए का भेद संकीर्णता का लक्षण है; उदारता वही है जो समूचे भारत को एक परिवार के रूप में देखे।
सेवन सिस्टर्स को समझना कोई औपचारिक सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि राष्ट्रीय साधना है। उत्तर–पूर्व भारत को बिना चिकन नेक के समझना वैसा ही है, जैसे हृदय को नाड़ियों से अलग कर देखना। उत्तर–पूर्व कोई सीमा नहीं, भारत की संवेदना है। हम एक थे, एक हैं, और एक रहेंगे।
जय भारतवर्ष।
