वायु प्रदूषण से जंग

कर्नल प्रवीण शंकर त्रिपाठी, नोएडा

वर्तमान काल खंड में जो सबसे ज्वलंत मुद्दा जो जनजीवन को प्रभावित करता है वह है बहुआयामी प्रदूषण। इसका एक महत्वपूर्ण कारक है वाहनों से उत्पन्न वायु प्रदूषण। सी एस ई (सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट) की एक रिपोर्ट को माने तो दिल्ली के स्थानीय प्रदूषण स्रोतों में वाहनों से हुए उत्सर्जन का योगदान 51.5% तक है। एक अध्ययन के अनुसार दिल्ली एनसीआर में अभी भी लगभग 27% पुराने वाहन (BS-I – BS-III) चल रहे हैं। वहीं इनके साथ BS-IV (16.16%) और BS-VI (25.26%) जैसे नए मानकों वाले वाहन भी बड़ी संख्या में चल रहे हैं। इन नए और पुराने वाहनों का मिश्रण प्रदूषण को बढ़ाता है। इसके अतिरिक्त बड़ी संख्या में पड़ोसी तथा देश के अन्य राज्यों से एनसीआर में आने वाले या इस क्षेत्र से गुजरने वाले व्यावसायिक व निजी वाहन जिनमें बहुत बड़ी तादात में पुराने मानकों वाले वाहन भी शामिल हैं जो वायु गुणवत्ता को खराब करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

वायु प्रदूषण वैसे तो वर्ष भर रहता है परंतु सर्दी के महीनों में यह खतरनाक स्तर तक पहुँच जाता है। अगर हम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की बात करें तो आई आई टी कानपुर के एक के शोध के अनुसार इस दौरान PM2.5 प्रदूषण में वाहनों का योगदान लगभग 25% होता है। वाहनों से होने वाले उत्सर्जन के अलावा सड़कों की धूल, निर्माण गतिविधियों से उत्पन्न धूल, बायोमास जलाने और औद्योगिक उत्सर्जन भी वायु प्रदूषण में बड़ा योगदान देते हैं।

अतः प्रतिवर्ष अक्टूबर से फरवरी तक एनसीआर गैस चैम्बर में बदल जाता है जो कि स्वास्थ्य के लिए एक खतरनाक स्थिति है। इस भयावह स्थिति से लड़ने के लिये सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर प्रयास जारी हैं। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विभिन्न विभाग व संस्थाएं अनेक उपाय करती हैं; जैसे ग्रैप (ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान), जो दिल्ली-NCR में वायु प्रदूषण (Air Pollution) के स्तर के आधार पर लागू की जाने वाली एक आपातकालीन योजना है, जिसमें प्रदूषण बढ़ने पर प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए अलग-अलग चरणों में सख्त कदम (जैसे निर्माण पर रोक, गाड़ियों पर प्रतिबंध, स्कूल बंद करना, बिना PUCC के वाहनों को फ्यूल न देना) उठाए जाते हैं ताकि हवा की गुणवत्ता में सुधार हो सके।

लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है अतः इस विकट परिस्थिति से उबरने के लिए नागरिकों को भी स्वेच्छा से आगे आना होगा। क्योंकि प्रदूषण का शिकार हर उम्र और हर वर्ग के नागरिक ही होते हैं। एनसीआर के विस्तार और प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोत्तरी होने से लोगों की जीवन शैली में बदलाव हुआ है। जो लोग पहले दैनिक कार्यों के लिए पैदल चलते थे अथवा साइकिल से चलते थे वे आज दुपहिया या चार पहिया वाहनों का उपयोग धड़ल्ले से कर रहे हैं जिसका सार यह है कि “सड़कों पर अधिक वाहन मतलब अधिक प्रदूषण।” अतः हम सबको ही सचेत होकर यत्नपूर्वक अपनी दिनचर्या को बदलना होगा और सामुदायिक स्तर पर जागरूकता फैलाना और विभिन्न उपायों पर अमल करना होगा।

इनमें सबसे पहले आता है ‘पैदल चलना या साइकिल से आवागमन’, जिन्हें हम विलासिता के चक्कर में भूल चुके हैं। पहले हम सिवाय दूध और फल-सब्जियों के, बाकी का सामान महीने भर की आवश्यकता के अनुसार इकट्ठे ले लिया करते थे परंतु अब ऐसा नहीं करते, बल्कि पूरे महीने रोजमर्रा की वस्तुएं टुकड़ों में लाते हैं जिसके लिए थोड़ी दूरी के लिए भी दुपहिया अथवा चौपहिया वाहन का उपयोग करते हैं या फिर ऑनलाइन ऑर्डर कर देते हैं जिन्हें डिलीवरी करने वाला किसी न किसी वाहन से लाता है। यदि हम स्वयं को व्यवस्थित कर लें तो बेकार की अतिरिक्त भागदौड़ बच जायेगी। फिर भी यदि पास के बाजार में जाना ही पड़े तो या तो पैदल जायें अन्यथा साइकिल से जायें, जिससे न केवल फ्यूल की बचत होगी और वायु प्रदूषण घटेगा बल्कि स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

इसी क्रम में दूसरा उपाय है कार पूल या चार्टर्ड बसों का उपयोग, जो ऑफिस आनेजाने के लिये न केवल सस्ता उपाय है बल्कि नगरीय वायु प्रदूषण कम करने में बहुत सहायक सिद्ध होगा क्योंकि ‘सड़कों पर जितने कम वाहन, उतना ही स्वच्छ वायु’। इस व्यवस्था का उपयोग करने में थोड़ा अतिरिक्त समय तो लग सकता है पर अपनी दिनचर्या में थोड़ा परिवर्तन करके न केवल आने-जाने के खर्च में कमी आएगी, सड़कों पर जाम की समस्या से भी छुटकारा मिलेगा बल्कि वायु प्रदूषण में में उल्लेखनीय कमी आयेगी।

एक अन्य उपयोगी उपाय है सार्वजनिक वाहनों का अधिकतम उपयोग। जिसके लिए जहाँ एक ओर नागरिकों को अपने समय का ठीक से समायोजन करते हुए स्वयं को मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार करना होगा। परंतु इस उपाय में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि महानगरों में सार्वजनिक परिवहन(मेट्रो या बसों) की समुचित व्यवस्था नहीं है। जिसके लिए सरकारों और स्थानीय निकायों को “लास्ट माइल कनेक्टिविटी” सुनिश्चित करने के लिए फीडर सर्विस को सुदृढ़ करना होगा।

अंत में यह कह सकते हैं कि प्रदूषण से जंग जीती जा सकती है पर इसके लिए न सिर्फ सरकारों को ठोस उपाय करने होंगे अपितु समाज को भी अपने व्यवहार बदलने, यातायात के साधनों का बुद्धिमता से उपयोग करने और अधिक से अधिक पैदल चलने की आदत डालनी होगी।

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