मुस्कुराहट

मीनू त्रिपाठी  नोएडा

अहिल्या बाई किले में घूमते घूमते एक आवाज कानों में पड़ी,   “सर, एक माला ले लीजिए।”

पंद्रह सोलह साल की लड़की ढेर सारी मालाएं हाथों में फंसाए अभय से माला खरीद लेने का इसरार कर रही थी।

अभय ने अनिच्छा दिखाते हुए मुँह फेर लिया पर वह कहाँ पीछा छोड़ने वाली थी, “ले लीजिए न… असली पत्थर की हैं।”

उसके इतने बड़े झूठ पर अभय ने हैरत भरी नजर उस पर डाली फिर उपेक्षा से उसके हाथों में लटकी अनगिनत मालाओं में से एक को छूकर  बोला, “ये ! और असली पत्थर की…और कोई बेवकूफ न मिला।”

“अरे नहीं ,  सच में… असली पत्थर की ही हैं।” उसने बड़ी- बड़ी आँखें फैलाकर और बड़ी कर दी तो अभय ने गौर किया उसकी आँखें नीली थी…या शायद थोड़ी हरी सी भी। अभय को उसकी आँखों में मासूमियत की जगह चपलता दिखी…चपलता ग्राहक को फंसाने की।

“ले लीजिए सर, यहाँ की  निशानी रहेगी।”

“पर माला मेरे काम की नहीं है। तुम उनके पास जाओ, शायद तुम्हारा काम बन जाए।”

अभय ने दूर खड़ी अपनी पत्नी स्नेहा की ओर इशारा किया। इतिहास में रुचि रखने वाली स्नेहा इस समय बड़े गौर से किले में खुदे शिलालेखों को पढ़ रही थी।

अभय के हाथ के इशारे पर वह लड़की फुर्ती से उस ओर बढ़ी।

जैसा कि अभय को विश्वास था… स्नेहा ने हर बार उसे न ही कहा। वह अच्छी तरह से जानता था कि उस लड़की की दाल वहाँ नहीं गलने वाली।

स्नेहा के गले में सोने की पतली सी जंजीर और कानों  में हीरे के टॉप्स वह जमाने से देख रहा है। उसे आदत ही नहीं ऐसी रंग बिरंगी नकली जेवर पहनने की।

वो लड़की अब मायूस थी, उसके चेहरे से साफ जाहिर था कि उसके बार बार किए आग्रह को स्नेहा ने नहीं स्वीकारा है।

ऐतिहासिक धरोहरों में रुचि रखने वाली स्नेहा किले का कोना – कोना छानती रही। अभय थकान उतारने के उद्देश्य से वहीं एक बेंचनुमा पत्थर  पर बैठ गया।

वह लड़की अन्य पर्यटकों के इर्द- गिर्द भटकने के बाद फिर अभय के पास आई और बोली, “मैडम तो नहीं ले रहीं। आप ही उनके लिए ले लीजिए, प्लीज…”

उसके ‘ प्लीज़’ कहने का अंदाज अभय को प्रभावित कर गया और वह पूछ बैठा,

“पढ़ती हो क्या…?”

“जी…” माला बेचने की आस में उस पर टिकी उन नीली हरी आँखों वाली ने सिर हिलाकर छोटा सा जवाब दिया।

अभय कुछ पल उसे निहारता रहा तो उस लड़की ने संभावित प्रश्न को भांपकर धीरे से कहा,

“दसवीं का इम्तहान दूंगी। आज इतवार है तो आज माँ को आराम दे देती हूं।”

“हम्म्म…” अभय की रहस्यभरी हुंकार  पर वह असहज हुई। उसकी असहजता ने अभय को उत्साह प्रदान किया। अब वह नीली हरी आँखों वाली को उन्मुक्तता से निहारने लगा।

उसी दौरान उसने नोटिस किया कि वह नारंगी रंग का बुशर्ट और भूरे रंग की स्कर्ट पहने थी और काफी खूबसूरत दिखती थी।

“बहुत सुंदर हो तुम!” अभय के मुँह से बेसाख्ता निकला तो वह पल भर ठिठकी फिर मुस्कुराई पर शरमाई नहीं… मानो जानती हो कि वो सुंदर है या फिर यह जानती हो कि वह यही कहने वाला है पर अब वह वहाँ रुकी नहीं और चली गई। अभय अपने शब्दो पर गौर करने लगा… नहीं, उसके शब्दों में ऐसी कोई अभद्रता या अश्लीलता तो थी नहीं, वो वाकई बहुत खूबसूरत थी। यौवन के पायदान चढ़ती उस बाला में आकर्षण और सम्मोहन भरपूर था।

कितनी अदा से वह मुस्कुराई भी थी। मन में मलाल सा हुआ कि क्यों नहीं ले ली माला उससे। कुछ बातें करने का मौका ही मिलता…उसकी सुंदर मुस्कान का आनंद उठाने का अवसर मिलता।

अपनी  दृष्टि दूर खड़ी उस लड़की पर टिकाए  वह मन ही मन सोच ही रहा था कि तभी स्नेहा ने उसके कंधे को हौले से छुआ और बोली, “बच्ची है, एक दो माला ले ही लो उससे।”

वह हकबका कर यूं चौंका मानो उसकी चोरी पकड़ी गई हो…

“मैंने उसे तुम्हारे पास भेजा तो था। तुमने ही क्यों नहीं ले लिया।” अभय ने अचकचाकर प्रति प्रश्न किया।

“ले लेती, पर खुदरा पैसे नहीं थे। मतलब कार्ड तो हैं पर छुट्टे रुपए उस चायवाले के यहाँ खर्च हो गए।”

स्नेहा के कहने पर अभय आश्वस्त हो गया। उत्साह में भरकर वह उस नीली हरी आँखों वाली लड़की को बुलाने उठता उससे पहले ही स्नेहा ने ही उसे आवाज दे दी, “ए बेटी, जरा इधर तो आओ।”

वह लड़की दौड़ कर आई और स्नेहा पर आशा भरी नजरे ठीक वैसे ही टिकाई जैसे कुछ देर पहले अभय पर टिकाई थी…स्नेहा वात्सल्य भरी नज़रों से उसे देखते हुए बोली,

“मैं ये सब पहनती तो नही हूँ, पर इतनी सुंदर माला लग रही हैं कि सोचती हूं एक ले ही लूं।”

सुनकर वह मुस्कुरा पड़ी, हालांकि उसकी मुस्कुराहट अभय को दी उस मुस्कुराहट से भिन्न थी। उस मुस्कुराहट में कुछ संशय, कुछ प्रश्न…कुछ भाँप जाने के भाव थे पर स्नेहा को दी इस मुस्कुराहट में खालिस आश्वस्त होने का भाव ही  था।

“तुम तो कभी पहनती नहीं क्या करोगी इसका?” वह माला के बदले पैसे लेकर प्रसन्न भाव से चली गई तब अभय ने स्नेहा से पूछा।

“हम्म, पहनती तो नहीं, पर कभी – कभी कुछ चीजें बस यूं ही ले ली जाती हैं।”

मुस्कराकर कहते हुए स्नेहा ने अभय की ओर  गहरी नजर डाली और  कहा, “अपनी नूपुर की उम्र की ही तो है इसलिए उसे उदास न देख पाई।  माला लेने से मैंने मना किया तो निराश हो गई थी पर अभी देखो, कैसे मुस्कुरा पड़ी थी। कितनी प्यारी लगती है बिल्कुल नूपुर की तरह…”

बेटी की याद में स्नेहा की आँखों में उमड़ आए वात्सल्य को देख अभय ने अपनी नजरें चुरा ली इस भय से कि कहीं वो भी न पढ़ ले उसके भाव… जैसे उसने अभी अभी  पढ़े स्नेहा की आँखों में उतर आए उस लड़की के प्रति ममत्व में लिपटे भाव…

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