माँ का मन
– ममता त्रिपाठी, कानपुर
आज मेरा बेटा एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पद पर आसीन है।
ओजस्वी वाणी बन मिसाल।
सौहार्द भाव अंतस विशाल।
पग-पग संघर्ष अतुल विवाद।
मैत्री प्रमुदित मृदुल संवाद।
एक माँ के लिए इससे बड़ा गौरव और क्या हो सकता है?
यही तो वह सपना था जिसे मैंने न जाने कितनी रातें जागकर देखा था।
इसी दिन के लिए तो संघर्ष किए थे —
कभी अपने सपनों को टालकर,
कभी अपनी थकान को छिपाकर।
आज जब वह सफल है, सम्मानित है, आत्मनिर्भर है —
तो मन को प्रसन्न होना चाहिए था।
पर मन के किसी कोने में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है।
कभी जिस छोटे से हाथ को थामकर,
मैंने चलना सिखाया था,
आज वही हाथ
ज़िम्मेदारियों का आसमान थामे खड़ा है।
और मैं…
गर्व और खालीपन के बीच
खुद को तलाश रही हूँ।
मैं खुद से पूछती हूँ —
क्या मेरा बेटा अच्छा नहीं है?
नहीं ! ऐसा नहीं है
क्या मेरे संस्कारों में कहीं कमी रह गई?
नहीं ! ऐसा भी नहीं है।
फिर यह उदासी क्यों?
थोड़ी देर बाद उत्तर खुद ही उभर आता है
उसकी प्राथमिकताएँ बदल गई हैं।
वह अब सिर्फ “मेरा बेटा” नहीं है,
वह किसी का पति है,
किसी के सपनों का साथी है,
एक नई गृहस्थी की धुरी है।
अब उसकी सुबहें जिम्मेदारियों से भरी हैं,
उसकी शामें थकान से,
और उसकी रातें आने वाले कल की योजनाओं से।
और मैं…
मैं उस जीवन का हिस्सा नहीं रही,
जिसे मैंने अपने हाथों से गढ़ा था।
माँ होने का यही सबसे कठिन सच है —
हम बच्चों को उड़ना सिखाते हैं,
लेकिन यह नहीं सीख पाते
कि जब वे दूर उड़ जाएँ,
तो अपने मन को कैसे थामें।
हर माँ को यह समझना होगा —
बेटे का बदलना,
माँ से दूर जाना नहीं होता,
यह उसके जीवन का विस्तार होता है।
आज मैं शिकायत नहीं करती,
बस स्वीकार करती हूँ।
मैं जानती हूँ —
उसकी सफलता में मेरा मौन भी शामिल है,
मेरे त्याग भी,
मेरी अनकही इच्छाएँ भी।
आज मैंने अपने खाली मन को भरने का निर्णय लिया है —
शिकायतों से नहीं,
यादों से नहीं,
अपेक्षाओं से नहीं बस इस सुकून से कि मेरे
बच्चे दूर नहीं हैं
बस मेरा आँगन अभी
कुछ खाली खाली सा है।।
