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पत्राचार (11th Edition) – janmaitri

पत्राचार

प्रियंका शुक्ला, पुरी​
letter

आज सिखाते हुए बच्चों को पत्र लेखन,
याद आ गए मुझे वो चिठ्ठियों के बीते दिन।

छत की मुंडेर पर खड़े होकर डाकिए की राह तकना,
पत्र आने पर एक साथ दो तीन सीढ़ियों से कूदना;
न आने पर उदास मन से मुंह का फिर मोड़ना,
याद आते हैं ससुराल गई बुआ, दीदी, मौसी के पत्रों के दिन।

आदरणीय, पूज्यनीय, प्रिय, प्रियतम शब्द खो से गए हैं,
कुशलता, पूछना व्यक्त करना अब बच्चे भूल से गए हैं;
दूरसंचार के करीब तो भावनाओं से दूर हो गए है,
दूर रहकर भी कितने पास थे वो अनमोल पत्रों के दिन।

आड़ा तिरछा लिखकर अंतर्देशी का कोई कोना न छोड़ना,
नव वर्ष, होली, दिवाली की भेजनी हो जब शुभकामना;
चुनिंदा शब्दों के द्वारा तब भावनाओं को व्यक्त करना,
अब तो बस यादों में रह गए अंतर्देशी पोस्टकार्डो के दिन।

माँ का ससुराल में आया पत्र, बेटी कई बार पढ़ लेती थी,
बहन, सहेली, भाभी, भाई के पत्र वर्षो सहेज रख लेती थी;
बहुत कुछ अपना अनकहा लिखकर व्यक्त कर लेती थी,

अब भावनाओं के नहीं फारवर्ड और हैं कॉपी  पेस्ट  के  दिन।

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