नेता का जनता गान (व्यंग्य)

अशोक अंजुम, अलीगढ़

हमको रास नहीं आता है, तेरा रास रचाना जनता 

हम गाते हैं जय-जय कुर्सी, तू जन-गण-मन गाना जनता 

पस्त रहे तू मस्त रहें हम, घोटालों में व्यस्त रहें हम 

तुझे लाख हों रोग हमें क्या, चरें देश को स्वस्थ रहें हम 

तू तो केवल आँख बन्द कर, हमें वोट दे जाना जनता 

तुझको रोना है तू रो ले, जितना सोना है तू सो ले 

अधिकारों की खातिर लेकिन, कोई अपने होंठ न खोले 

तुझे दिखायें सब्ज़बाग़ जब, तू बस खुश हो जाना जनता 

पगडण्डी से प्यार किए जा, हर गड़बड़ स्वीकार किए जा 

जो मिल जाए उसमें खुश रह, यूँ ही जीवन पार किए जा 

तुझे नहीं हक़ कभी बुने तू, कोई ताना-बाना जनता 

चाहे जी और चाहे मर तू, जो भी कहें समर्थन कर तू 

सब कुछ सहकर मुस्काती रह, कभी न करना अगर-मगर तू 

तुझे कसम है जोर-जुल्म हो, मत आवाज़ उठाना जनता 

 दिल का हर इक घाव तू सी ले, हर हालत में हँसकर जी ले 

अगर सहन करना हो मुश्किल, ठेके पर जा दारू पी ले 

हम जो चाहे राग सुनाएँ, तू बस ताल मिलाना जनता 

हम गाते हैं जय-जय कुर्सी, तू जन-गण-मन गाना जनता 

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