कुर्ग की मनोरम वादियों में पुनर्जीवित होता जैन वैभव: आस्था और स्थापत्य का संगम 'जिरावला पार्श्वनाथ धाम'

राजकुमार जैन,
स्वतंत्र विचारक,
इंदौर

दक्षिण भारत का ‘स्कॉटलैंड’ कहा जाने वाला कुर्ग (कोडागु) अब केवल अपनी धुंधली पहाड़ियों, कॉफी के बागानों और मसालों की खुशबू के लिए ही नहीं, बल्कि एक उभरते हुए आध्यात्मिक केंद्र के रूप में भी विश्व मानचित्र पर अंकित हो रहा है। मैसूर-मंगलुरु राजमार्ग से कुछ दूरी पर स्थित ‘जिरावला पार्श्वनाथ धाम’ न केवल जैन धर्म की प्राचीन विरासत को समेटे हुए है, बल्कि यह आधुनिक युग में स्थापत्य कला का एक बेजोड़ उदाहरण भी बन रहा है।

सहस्राब्दी पुराना इतिहास: कुर्ग में जैन धर्म के पदचिह्न इतिहास के पन्ने पलटें तो कुर्ग में जैन धर्म का प्रभाव नया नहीं है। कुर्ग के राजप्रसाद संग्रहालय में संरक्षित खंडित प्रतिमाएं इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि 10वीं से 12वीं शताब्दी (लगभग 1000 वर्ष पूर्व) के दौरान यहाँ गंगा और होयसल राजवंशों के संरक्षण में जैन धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर था। इतिहासकारों के अनुसार, दक्षिण कर्नाटक का यह क्षेत्र ‘जिन शासन’ का प्रमुख केंद्र रहा है। इसी लुप्त होते वैभव को पुनर्जीवित करने के संकल्प के साथ आचार्य श्रीमद् नयचंद्र सूरीश्वरजी एवं अजीत चंद्रसागर महाराज के मार्गदर्शन में इस धाम की नींव रखी गई है।

स्थापत्य: जहाँ पत्थर गीत गाते हैं

जिरावला धाम का मुख्य मंदिर प्राचीन भारतीय शिल्पशास्त्र का एक अनुपम अध्याय लिख रहा है। यहाँ की नक्काशी को देलवाड़ा और रणकपुर के विश्वप्रसिद्ध मंदिरों की श्रेणी का माना जा रहा है।

अति प्राचीन उत्कृष्ट नक्काशी

कुशल शिल्पकार श्वेत और पीले पत्थरों पर ‘पल्लू’, ‘पाला’ और ‘होयसल’ कला शैलियों के मिश्रण से ऐसी सूक्ष्म नक्काशी उकेर रहे हैं, जो दर्शकों को विस्मित कर देती है।

अद्वितीय प्रतिमा विधान

गर्भगृह में विराजित की जाने वाली 55 इंच की मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा शांति और करुणा का सागर प्रतीत बनेगी। वहीं, पद्मावती माता की 108 हाथों वाली प्रतिमा, जो काले डेजर्ट स्टोन से निर्मित है, भारतवर्ष में अपनी तरह की प्रथम प्राचीन शैली की कृति होगी।

कलात्मक वैभव

मंदिर के रंग मंडप के स्तंभों पर सरस्वती और लक्ष्मी माता की 1008 लघु प्रतिमाएं उकेरी जा रही हैं। प्रवेश द्वार को एक रहस्यमयी गुफा का रूप दिया गया है, जिसमें अजंता-एलोरा की झलक के साथ कर्नाटक की संस्कृति का सामंजस्य दिखेगा।

आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र

यहाँ की वायु में एक विलक्षण शांति व्याप्त है। प्रतिदिन कावेरी के पावन जल से प्रभु का पक्षाल और ताजे फूलों से होने वाली ‘आंगी’ वातावरण को भक्तिमय बना देती है। श्रद्धालुओं का अनुभव है कि चिनार के वृक्षों से घिरे इस चार एकड़ के परिसर में कुछ पल का मौन ध्यान भी मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाकर आत्मिक संतुलन स्थापित करता है।

आधुनिक सुविधाएं और पर्यटन : आध्यात्मिकता के साथ-साथ यह धाम वैश्विक पर्यटकों की सुविधाओं का भी ध्यान रख रहा है।

सितारा सुविधा युक्त कॉटेज व धर्मशाला

सात्विक जीवन के अभिलाषियों के लिए स्वच्छ आवास और आधुनिक सुख-सुविधाओं से युक्त 7 सितारा कॉटेज का निर्माण हो रहा है।

शुद्ध जैन भोजन

यहाँ आने वाले यात्रियों के लिए शुद्ध, सात्विक और पारंपरिक जैन भोजन की उत्तम व्यवस्था है।

यात्रा का श्रेष्ठ समय

पूरे वर्षभर यहाँ की यात्रा का रास्ता रमणीय, मनमोहक और स्वर्ग समान है, मानसून में यहाँ की हरियाली एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करती है।

कैसे पहुँचें

कुर्ग जिला मुख्यालय (मडिकेरी) से लगभग 20 किमी की दूरी पर स्थित यह धाम सड़क मार्ग द्वारा मैसूर (120 किमी) और बेंगलुरु (260 किमी) से सुगमता से जुड़ा है। निकटतम हवाई अड्डा मंगलुरु या बेंगलुरु है।

जिरावला पार्श्वनाथ धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और कला का वह महाकुंभ है, जहाँ पहुँचकर मनुष्य स्वयं को परमात्मा के निकट पाता है। यदि आप दक्षिण भारत की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो इस दिव्य धाम के दर्शन कर जैन संस्कृति के पुनरुत्थान के साक्षी अवश्य बनें।

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