किराने की दुकान, आफत का सामान ?

दिनेश गंगराड़े

आज के जमाने में दुकानदार बनना और वो भी किराने सामान की, सबसे बड़ा योद्धा बनने से भी ज़्यादा खतरनाक है। भेजा पच्ची का सीधा रास्ता है? भाई, लड़ाई का मैदान छोड़ दो,असली जंग तो किराने की दुकान खोलने में है। मैं तो कहता हूँ कोई सी दुकान खोलने में है? पहले तो घर-बार बेचकर या बैंक से कर्ज लेकर चालीस-पचास लाख की पूँजी जुटाओ, और कोई निजी संस्था, कंपनी से कर्जा उठा लिया तो गई भैंस टोटल पानी में। नहीं जुटा पाए? कोई बात नहीं, पर कर्ज उठा लिया तो ब्याज चुकाते-चुकाते, मूलधन तक खुद धरा से उठ जाओगे। किराए की दुकान लो, वो भी महीने का कम से कम पंद्रह-बीस हजार, बड़ी जगहों पर तो पचास हजार तक मासिक किराया आसानी से देना पड़ेगा तब जाकर दुकान नसीब होगी। फिर भागो सरकार के चक्कर में ट्रेड लाइसेंस, जीएसटी नंबर, शॉप एक्ट रजिस्ट्रेशन, उद्यम बगैरह, बगैरह? सब कुछ कराओ। दुकान खालीखट्ट,अब माल भर दो, स्टाफ रखो, सैलरी दो।

बिजली का बिल, सुरक्षा गार्ड की भेंट पूजा अलग से। फिर लोगों को माल बेचो नकद तो ठीक है, लेकिन ज़्यादातर उधार, मतलब नौ नगद, तेरह उधार। आप खूब बड़े अक्षरों में लिखा लो, आज नगद, कल उधार पर आज कभी आता नहीं, कल आता रहता है और सयाने, साणे लोग मीठा बोलकर उधार ले जाते हैं और मांगो तो बोलते हैं, किसका खाया ? जो तुम्हारा खा जाएंगे फिर रोज़ उगाही का खेल शुरू, घिंघियाते हुए बोलो भैया, पैसे कब दोगे? अरे सर, अगले महीने। बस आप तो लाल डायरी में लिख लो। बच्चे की फीस है, थोड़ा टाइम दो – रोज़ सुबह से रात तक हिसाब-किताब रखो, डायरी मेंटेन करो।

यूपीआई, कैश, ऑनलाइन, क्रेडिट सबका अलग-अलग रिकॉर्ड धरो, सो अलग? हर महीने बैंक रिकॉन्सिलिएशन, जीएसटी रिटर्न, जीएसटीआर एक,जीएसटीआर तीन बी की टेंशन। ये सब भाटगिरी करो, इनका संधारण करो? साल खत्म होते ही चार्टेड अकाउंटेंट बुलाओ बैलेंस शीट, इनकम टैक्स, ऑडिट और फिर से हजारों रुपये गिनो और सबसे मज़ेदार बात? पूरे दिन साफ-सुथरे कपड़े पहनकर भी सरकार की नज़र में तुम “टैक्स चोर” और “ब्लैक मनी” वाले हो! जीएसटी नोटिस, इनकम टैक्स स्क्रूटनी, सर्वे रोज़ नई चिंता, नया हेडेक, मानो बड़ा भाटा उठा के पांव पर जरक दिया हो? फिर भी साल भर मेहनत के बाद प्रॉफिट? एक झुनझुना जैसा छोटा-मोटा अमाउंट हाथ लगे तो समझो किस्मत खुल गई। इसे कहते है करम उगड़ी के हाथ में अई गया। तनाव तो फ्री में मिलता है, साथ मे उपहार में शुगर, डायबिटीज, सर्वाइकल पेन, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट की दिक्कतें, नींद नहीं आना, डिप्रेशन और एंग्जायटी ये सब बोनस में मिलता है। मालवा क्षेत्र में इस सत्कर्म को नींद बेचकर , उजरका मोल लेना कहते है और हाँ! अगर कुछ और बचा है दुकानदार की ज़िंदगी में तो ये भी जान लो, रात को दुकान बंद करके भी दिमाग में उधार वालों के चेहरे घूमते रहते हैं, सपने में उधार चंद दिखते रहते हैं।

त्योहारों पर भी छुट्टी नहीं, क्योंकि “सेल” लगानी है, करनी है। परिवार को टाइम नहीं दे पाते, बच्चे “पापा कब आएंगे” पूछते रहते हैं। दोस्त-रिश्तेदार समझते हैं “दुकानदार है, आराम से पैसा कमा रहा होगा? एक छोटी सी गलती, जीएसटी में मिसमैच या गलत, एच एसएन कोड और लाखों का नोटिस आ जाता है। पड़ोसी की नई गाड़ी देखकर खुद की पुरानी बाइक पर भी गर्व करना पड़ता है, फिर भी ये सारे किरानी योद्धा सुबह 8 बजे दुकान खोलते हैं और रात 10 बजे बंद करते हैं, पूरे चौदह घँटे की मगजमारी झेलो, बाद में घर पर घराली को अलग से झेलो? बिना तलवार के, बिना वर्दी के, सिर्फ़ एक कैलकुलेटर और आशा लेकर! सैल्यूट है इन सच्चे योद्धाओं को!

दुकानदार भाई, तुम सच में सबसे बड़े फाइटर हो, जो बिना शोर के, बिना सरकारी तवज्जो के, देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनकर खड़े हो।अब बोलो अभी भी लगता है कि किराना दुकानदार या कोई सी भी शॉप का मालिक बनना आसान है?

दुकानदारों के छातीकुटे की जय। साठ साल पहले मेरे पिता श्री ने भी सफल किराना दुकानदार बनने की कोशिश की थी, जिसकी उधारी की लाल डायरी, बही किताब, अंततः नर्मदा माई में बहाई थी। इत्ता फायदा हुआ था कि सब परिजन उधारी देने से सेठ बन गए थे? मेरे एक मित्र ने चाय की दुकान, मंडी चौराहे पर खोली, सोचा अंडशंड चलेगी, चार लीटर दूध लिया, दिनभर में तीन खर्च हुआ, बचे की रबड़ी घोंट ली, दो महीने में पटिये उलाल हो गए और मित्र माई का लाल? सोलह सौ खर्चे, नौ सौ कमा पाया, उधारी उसके पिता ने उसे पीटते हुए भरी? दूजे ने पान की शॉप खोली, चले या नहीं, खुद दिनभर में 5-7 दफा पान चबाता, बीड़ी सिगरेट पीने की सुआदत (?) गले अलग पड़ गई, अब दूसरे की दुकान पर नौकर है। बोंदर ने लॉटरी की दुकान खोली, साथ में सट्टा भी पोहा-जलेबी की तरह खाने लगा। आज वो बोंदर से बोंदर मल सेठ बन कर टाटा सूमो में घूम रहा है।

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