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इनशब्दों ने (13th Edition) – janmaitri

इनशब्दों ने

व्यग्र पाण्डे, गंगापुर सिटी

इन शब्दों ने कितने ही
दुःखियों के मन को बहलाया है।
इन शब्दों ने कितने ही जख्मों को धोया,
सहलाया है।
लेकिन, हर सिक्के के दो पहलू होते हैं,
यह भी सच है।
इन शब्दों ने ही कितनों को
स्वप्न लोक में टहलाया है।

स्वप्नलोक सुंदर लगते हैं,
लेकिन होते सत्य नहीं वे।
जाते छूट एक दिन,
जाते टूट स्वप्न अतिशय पीड़ा दे॥
शब्दों के हैं जाल अनोखे,
दे जाते जो अक्सर धोखे ।
इन शब्दों ने कभी हमें खुशियाँ दीं,
कभी सितम ढाया है।

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