खेलों को मिली संजीवनी

बिपिन राय, कोलकाता

पारदर्शिता और जवाबदेही की नई पारी

मैदान पर तिरंगा लहराते खिलाड़ी, भीड़ की गगनभेदी गूंज, आंखों में सपनों की चमक—यह है भारतीय खेलों का चेहरा। लेकिन इस चेहरे के पीछे एक साया भी है—बंद कमरों में पलती गुटबाज़ी, चुनावी जोड़तोड़, पैसों के खेल और खिलाड़ियों की आवाज़ पर पड़ी मोटी चुप्पी की परत। दशकों से यह साया हमारे खेलों पर छाया रहा है। अब, संसद के दोनों सदनों से पारित राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक उस साए को चीरने वाली पहली किरण बनकर आया है—एक ऐसा मौका, जब खेलों की किस्मत नेताओं के नहीं, खिलाड़ियों के हाथों में लिखी जाएगी। यह सिर्फ़ कानून नहीं, खेल संस्कृति में क्रांति की प्रस्तावना है।

संरचना में बुनियादी बदलाव

विधेयक का पहला और सबसे महत्वपूर्ण पहलू है पदों की समय-सीमा और आयु-सीमा। अध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष जैसे प्रभावशाली पद अब जीवनभर की संपत्ति नहीं रहेंगे; तीन कार्यकाल (कुल 12 वर्ष) की सीमा और अधिकतम 70 वर्ष (विशेष स्थिति में 75) की आयु-सीमा लागू होगी। इससे न केवल नेतृत्व में नई ऊर्जा आएगी, बल्कि प्रशासन में जमाव और गुटबाज़ी का अंत होगा। साथ ही, कार्यकारी समितियों में कम से कम दो खिलाड़ियों और चार महिलाओं की अनिवार्य उपस्थिति का प्रावधान खेल प्रशासन में लैंगिक संतुलन और खिलाड़ी-हित को संस्थागत रूप से मजबूती देगा।

राष्ट्रीय खेल बोर्ड – खेल प्रशासन का प्रहरी

इस विधेयक की रीढ़ है राष्ट्रीय खेल बोर्ड (एनएसबी), जिसके पास सभी राष्ट्रीय खेल महासंघों को मान्यता देने या निलंबित करने का अधिकार होगा। खोज और चयन समिति की सिफारिश पर केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त यह बोर्ड चुनावों की पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट सुनिश्चित करेगा। यह एक स्पष्ट संदेश है कि अब खेल संघ ‘मित्र-परिवार’ की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधन हैं, जिन पर जनता और खिलाड़ियों का अधिकार है।

विवादों का त्वरित निपटारा

खेल जगत में वर्षों से एक शिकायत रही है—चयन या चुनाव से जुड़े विवादों का वर्षों तक अदालतों में लटकना। राष्ट्रीय खेल न्यायाधिकरण इस समस्या का समाधान है। सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश की अध्यक्षता में बनने वाला यह निकाय 30 दिन में अपील सुन सकता है, और इसके आदेशों को केवल सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी। इससे खिलाड़ियों का करियर विवादों की भेंट चढ़ने से बचेगा।

चुनावों की निष्पक्षता और पारदर्शिता राष्ट्रीय खेल चुनाव पैनल का गठन निर्वाचन आयोग के अनुभवी अधिकारियों के जरिए होगा, जो खेल संघों में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करेंगे। यह कदम संघों को आंतरिक राजनीति से मुक्त करने की दिशा में अहम है।

सूचना का अधिकार और बीसीसीआई

विधेयक के तहत सभी मान्यता प्राप्त खेल संगठन सूचना का अधिकार (आरटीआई) के दायरे में आएंगे। भले ही बीसीसीआई सरकारी फंड पर निर्भर नहीं है, लेकिन क्रिकेट के 2028 ओलंपिक में प्रवेश के बाद उसे भी राष्ट्रीय खेल महासंघ (एनएसएफ) के रूप में पंजीकरण कराना होगा। यह एक बड़ा बदलाव है—क्योंकि क्रिकेट देश का सबसे लोकप्रिय खेल है, और उसकी जवाबदेही अन्य खेलों के लिए मिसाल बनेगी।

केंद्र सरकार की भूमिका और सावधानियां

सरकार को कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं, जैसे “भारत” या “राष्ट्रीय” शब्द के इस्तेमाल पर नियंत्रण, या जनहित में प्रावधानों में ढील। ये शक्तियां सही दिशा में इस्तेमाल हों तो प्रशासनिक अनुशासन मजबूत होगा; लेकिन अगर इनका अत्यधिक या राजनीतिक उपयोग हुआ, तो संघों की स्वायत्तता खतरे में पड़ सकती है।

अंतर्राष्ट्रीय साख और आने वाला समय

भारत 2036 ओलंपिक की मेजबानी की दावेदारी कर रहा है। इस विधेयक के जरिए अगर शासन अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पारदर्शी और जवाबदेह हो, तो न केवल हमारी साख बढ़ेगी, बल्कि निवेशकों, प्रायोजकों और खिलाड़ियों का विश्वास भी मजबूत होगा। राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक भारतीय खेलों को एक नए युग में ले जाने की क्षमता रखता है—जहां खिलाड़ियों की आवाज़ सुनी जाए, वित्तीय और चुनावी पारदर्शिता हो, और विवादों का समाधान तेज़ी से हो। लेकिन यह तभी संभव है जब इसे कागज़ से ज़मीन तक ईमानदारी से लागू किया जाए। अगर यह हुआ, तो यह बदलाव ऐतिहासिक साबित हो सकता है।

Author