तुम किधर जा रहे हो

सीमा त्रिवेदी साज़, नवी मुंबई

किस तरफ़ ऐ वतन के नौजवान
तुम अपनी पहचान लेकर चले?
जिसकी ज़ुबान में न तहज़ीब हो,
किस तरह वह इंसान होकर चले?

हक़ के लिए आवाज़ उठाना ,
हमेशा इस मुल्क की शान थी।
पर लफ़्ज़ों की मर्यादा भी तो,
भारत की असली पहचान थी।

पेपर लीक पर जो आक्रोश था,
वो माना तुम्हारा अधिकार था।
पर विरोध की आड़ में जो हुआ,
क्या वही तुम्हारा संस्कार था?

जब सियासत की गलियों में
तुम गाली-गलौज तक आ गए,
सोचो ज़रा, किस घिनौने,
षड्यंत्र के साए तुम पर छा गए!

जिस देश को बुद्ध – गांधी के
पावन मूल्यों ने सींचा था,
उसी देश में तुम्हारे शब्दों का ,
स्तर अब इतना नीचा था?

रुक जाओ ऐ देश के नौजवान,
ज़रा सोचो कि तुम क्या लुटा रहे हो,
अपनी संस्कृति को जलाकर,
तुम किसकी रील बना रहे हो?

पड़ोस की जलती सरहदों से ,
तुमने आख़िर क्या सबक़ लिया?
जहाँ ग़ुस्से ने आबाद मुल्कों का,
पूरा वजूद ही निगल लिया।

तख़्त बदलने के इस खेल में,
कहीं तुम मोहरा तो नहीं बन गए?
दुश्मन के बिछाए जाल में,
तुम अनजाने में तो नहीं तन गए?

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