भक्त सालबेग

प्रियंका शुक्ला पुरी

‘जिनकी भक्ति ने प्रभु जगन्नाथ के रथ को रोक दिया’

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि वे भक्त के अधीन हैं। यदि एक भक्त का प्रेम और विश्वास अटूट है, तो भक्त नहीं, भगवान स्वयं उसकी ओर खिंचे चले आते हैं। हमारे सभी धर्म-ग्रंथ इस बात के प्रमाण हैं।

प्रेम के वशीभूत होकर शबरी के जूठे बेर खाते हैं, सुदामा के लिए नंगे पैर दौड़ पड़ते हैं, भक्त प्रह्लाद की रक्षार्थ नरसिंह अवतार लेते हैं। भक्त उस सर्वशक्तिमान ईश्वर का ही एक पावन रूप है।

ऐसे ही एक पावन रूप थे – ‘भक्त सालबेग’, जिनके लिए भगवान ने अपना रथ रोक दिया था।

हिंदू धर्म के चार धामों में से एक है जगन्नाथ धाम, जो ओडिशा राज्य में स्थित है। यहाँ भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं।

सोलह कलाओं से युक्त भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार श्रीकृष्ण ही श्री जगन्नाथ जी का स्वरूप हैं। ओडिशा की पावन भूमि ‘श्रीक्षेत्र’, जिसे पुरी कहते हैं, वहीं विराजते हैं जग के नाथ श्री जगन्नाथ। जगन्नाथ जी के भक्त विश्व के हर कोने में मिल जाएँगे।

भक्त-वत्सल भगवान जगन्नाथ के परम भक्त थे सालबेग, जो जन्म से मुस्लिम थे। उन्होंने मुस्लिम कुल में जन्म लिया, पर भक्ति थी उन्हें प्रभु जगन्नाथ जी से।

सालबेग के पिता लालबेग मुगल सेना में सूबेदार थे। एक सैन्य अभियान के लिए उन्होंने दण्डमुकुंदपुर पर आक्रमण किया। वहाँ अधिकार करते समय उनकी दृष्टि एक विधवा युवती ललिता पर पड़ी। वे उसके सौंदर्य पर मोहित हो गए। उसका अपहरण कर जबरन इस्लाम धर्म कबूल करवाया और उससे विवाह किया। पर ललिता देवी की अपने धर्म पर पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा थी, उन्होंने अपने हिंदू धर्म का पालन नहीं छोड़ा।

कुछ समय पश्चात हिंदू माँ और मुस्लिम पिता से सालबेग का जन्म हुआ। बचपन से ही उन्हें माँ की शिक्षा और संस्कार मिले, जिसने उनके अंदर ईश्वर के प्रति आस्था के बीज को अंकुरित कर दिया।

समय के साथ सालबेग युवावस्था को प्राप्त हुए। अब वे अपने पिता के साथ सैन्य अभियानों में भाग लेने लगे। कहते हैं कि एक बार युद्ध के दौरान वे बुरी तरह घायल हो गए। उनके बचने की
आशा बहुत कम थी। उस समय उनकी माँ ने उन्हें ‘जगन्नाथ’ नाम
का जप करने को कहा। जगन्नाथ नाम के जप से वे आश्चर्यजनक
रूप से ठीक होने लगे। इस घटना से उनकी भक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। वे सोते-जागते बस जगन्नाथ का नाम जपते रहते। उनकी भक्ति ने प्रेम का रूप ले लिया।

जब भक्ति प्रेम में परिवर्तित हो जाती है, तो ईश्वर भी अपने भक्त, अपने प्रिय के प्रेम में पूरी तरह रम जाता है और अपने भक्त का हो जाता है।

सालबेग अपने प्रिय भगवान श्री जगन्नाथ से मिलने को व्याकुल हो उठे और एक दिन पुरी जा पहुँचे। पर यहाँ धर्म की दीवार एक भक्त को मिलने से रोक रही थी। श्री जगन्नाथ मंदिर में विजातीय का प्रवेश वर्जित है। उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं मिला। व्यथित होकर सालबेग वृंदावन जा पहुँचे। वहाँ साधुओं के साथ समय बिताते हुए कृष्ण-भक्ति में लीन होकर भजन गाते, बजाते अपना जीवन व्यतीत करने लगे। पर मन में कहीं जगन्नाथ के दर्शन की अभिलाषा बसी थी। सोते-जागते बस प्रभु जगन्नाथ के सिवा उन्हें कुछ सुध नहीं थी।

एक बार सालबेग अत्यंत बीमार हो गए। वे सोच रहे थे कि कहीं प्रभु से मिले बिना ही उनका अंत न हो जाए। उसी समय पुरी में रथयात्रा की तैयारियाँ शुरू हो गई थीं। सालबेग को ज्ञात हुआ कि प्रभु जगन्नाथ अपने भाई और बहन के साथ अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए रथयात्रा पर निकलेंगे।

पर दुर्बल और बीमार शरीर से वे विवश हो गए। वे सोचने लगे, “कुछ समय ही बाकी है, मैं कैसे प्रभु के दर्शन के लिए शीघ्र पहुँचूँ?” उन्होंने आर्द्र कंठ से भगवान से गुहार लगाई, “हे प्रभु, हे नीलमणि, हे दया के सागर दीनबंधु! अब मैं आपके दर्शन के बिना नहीं रह सकता। मेरी आपसे एक ही विनती है, मैं जब तक न पहुँचूँ, आप मेरी प्रतीक्षा करना।”

इधर पुरी में प्रभु की पावन रथयात्रा शुरू हो गई। उसी समय सालबेग भी पुरी पहुँच गए। जैसे ही वे रथ के निकट दर्शन के लिए पहुँचे, उन्हें फिर वहाँ से हटा दिया गया। सालबेग भरे नेत्रों से वहाँ से हट गए। वे मन ही मन सोच रहे थे कि, “कदाचित प्रभु की इच्छा नहीं है कि मैं उनके दर्शन पाऊँ।” अतः वे दूर खड़े भरे गले से प्रार्थना करने लगे, “हे प्रभु! मैं अधम, विजातीय तुम्हारे दर्शन के योग्य नहीं हूँ। प्रभु, मैं कितना अभागा हूँ कि यहाँ आकर भी आपके दर्शन नहीं कर पा रहा। हे प्रभु, क्या मैं इतना पापी हूँ कि एक हल्की सी झलक भी देखने के योग्य नहीं हूँ?” उनकी आँखों से अविरल आँसू बह रहे थे।

भक्त का यह अपमान जगन्नाथ जी सह न सके। रथ जहाँ था, वहीं रुक गया, वह आगे बढ़ा ही नहीं। सभी सेवक पूरा ज़ोर लगा रहे थे, पर चलना तो दूर, रथ का पहिया अपनी जगह से हिल भी नहीं रहा था। सुबह से शाम हो गई। पुरी के राजा आए, प्रभु को मनाने, पर कोई लाभ नहीं हुआ, रथ नहीं हिला। तभी एक सेवक की दृष्टि दूर भक्ति में लीन सालबेग पर पड़ी। वह समझ गया कि इस निश्चल भक्त का अपमान प्रभु का अपमान है। उसने तुरंत सभी को सालबेग के बारे में बताया।

सालबेग की गुहार लगाई गई। एक सेवक तुरंत सालबेग के पास हाथ जोड़कर पहुँचा। सालबेग को लगा जैसे प्रभु ने स्वयं उन्हें न्योता भेजा है। सालबेग अपने प्रभु से मिलने के लिए चल पड़े। रथ के निकट पहुँच जैसे ही उनकी दृष्टि प्रभु जगन्नाथ पर पड़ी वो अपनी सुध बुध खो बैठे। दोनों हाथ जुड़े हुए ,भरा कंठ , होठों से करुण पुकार ‘हे मेरे प्रभु, हे जगन्नाथ, हे दीनदयाल, हे नीलमणि’ और नेत्रों से अश्रु धार। सभी स्तब्ध होकर इस दृश्य देख रहे थे कि क्या सच में प्रभु इस दूसरे धर्म के भक्त के लिए रुक गए हैं? क्या अब रथ चल पड़ेगा? यह परीक्षा थी भगवान की, जो अपने भक्त को दे रहे थे, और एक भक्त की उसके सच्चे प्रेम और विश्वास की। तभी आसमान से बारिश की बूँदें गिरने लगीं, जैसे महाप्रभु भी अपने प्रिय भक्त से मिलकर अश्रु बहा रहे हों। अद्भुत दृश्य था – एक निश्चल भक्त और प्रभु के मिलन का। वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति की आँखें नम हो गईं। तभी राजा ने उनके पास आकर कहा, “भक्त सालबेग, अब तुम ही प्रभु के रथ को चला सकते हो।”

राजा की आज्ञा से सालबेग ने रथ को जैसे ही छुआ, रथ चल पड़ा। ‘जगन्नाथ की जय’ के साथ साथ – भक्त सालबेग की जय’ से आकाश गूंजने लगा। शंखनाद, दुंदुभी, ढोल-नगाड़े बज उठे। मंद-मंद चलती पवन फूल, तुलसी-चंदन की महक से सुगंधित हो उठी। चारों ओर से प्रफुल्लित भक्तगण भक्तिरस में आकंठ डूब रथ के साथ चल दिए।

इस घटना को कई वर्ष बीत गए हैं, पर आज भी सालबेग की समाधि / मज़ार, जो मंदिर से कुछ ही दूर है, पर रथयात्रा के समय रथ कुछ समय के लिए अवश्य रुकता है। पुजारी उन्हें धूप, दीप, फूल और चंदन अर्पित करते हैं। यह भगवान की अपने भक्त को श्रद्धांजलि है। भक्तगण, भक्त सालबेग के समक्ष शीश झुकाते हैं, उसके बाद ही रथ आगे बढ़ता है।

यह सत्य घटना बताती है कि सबसे बड़ा धर्म है भक्ति का, प्रभु के प्रेम का, क्योंकि सृष्टिकर्ता तो वही हैं। सभी धर्म उन्हीं के हैं। वे जग के नाथ जगन्नाथ हैं। भगवान ने न केवल अपने भक्त का सम्मान लौटाया, अपितु उन्होंने यह भी बताया कि वो भक्तवत्सल हैं, अपने भक्त के विश्वास को कभी टूटने नहीं देते।

सालबेग एक प्रसिद्ध धार्मिक कवि भी थे। उन्होंने भगवान कृष्ण, जगन्नाथ की स्तुति, राधा-कृष्ण के प्रेम और यशोदा के वात्सल्य पर आधारित भजनों की रचना की, जो आज भी गाए जाते हैं। उन्होंने कभी भी श्री मंदिर के परिसर में प्रवेश नहीं किया, पर उनके भजनों में मंदिर के दृश्य का चित्रण पूरा सटीक है। यह एक आश्चर्य की बात है।

उनका एक भजन बहुत ही लोकप्रिय है:

“आहे नीलशैल प्रबल मत्त वारण।
मोर आर्त नलिनी बनकु कर दलन।”

Author