कुटिल चाल

यह जीवन है पल दो पल का, बाकी सब कहानी है। यह जीवन का राज मोबाइल, कंप्यूटर की तरह है जो आप्शन एक बार आ गया वह बार-बार आना चाहता है, उसे क्लिक करें तो आता है, नहीं भी क्लिक करें तो भी आता है। इसी तरह से इस जीवन में सुख आने लगा तो बार-बार आता है, दुख आने लगा तो इतना आता है जो, थमने का नाम नहीं लेता है। तो फिर प्रारब्ध को दोषी करार नहीं देते हुए हम क्यों न दुख वाले आप्शन को भूलने की कोशिश करें, क्लिक करना ही बंद कर दें!
श्याम की कहानी सभी को अभी भी मुंहजबानी याद है। पूरे गांव को प्रेम की प्रेरणा देना, गांव से अशिक्षा, अंधश्रद्धा निर्मूलन कार्य करना, धर्म की परिभाषा का प्रचार-प्रसार, से सर्वधर्म समभाव के लिए प्रयासरत रहना उसका काम था।
श्याम की ताकत थी उसकी पत्नी भारती, जब जीवनसाथी मनोनुकूल मिल जाता है तब सभी कार्य, पूरे जीवन तक सरल, सुखद हो जाते हैं।
समय का पहिया चलता रहता है, चलता रहता है, थमने का नाम ही नहीं लेता है। समय चक्र के सामने सभी को नतमस्तक होना ही पड़ता है।
गांव में अशिक्षा अभिशाप थी। अशिक्षित प्रधान पद के उम्मीदवार, अशिक्षित वोटर! गांव में दो ग्रुप, गरीब जनता दो ग्रुपों में फुटबॉल की तरह इधर से उधर, उधर से इधर ठोंकी जा रही थी।
आजादी से आजतक जितने भी गांव में प्रधान हुए हैं, उन प्रधानों ने सिर्फ अपना विकास किया है, गरीब जनता को सिर्फ शोषण, कर्ज, उपेक्षा मिली है, इसके अलावा कुछ नहीं मिला। देखने में दोनों ग्रुप एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन, कट्टर विरोधी होते हैं, पर ऐसा है नहीं क्योंकि यह नाटक जनता को गुमराह करने के लिए किया जाता है।
आज तक ग्राम पंचायत का एक रुपया भी गांव के किसी भी विकास कार्य में नहीं लगाया गया था। जनता के बीच में बहुरूपिया, दूसरे ग्रुप का प्रधान पद का उम्मीदवार अब वर्तमान प्रधान को अयोग्य करार देने लगा था। अनपढ़ जनता बरगलाने में आ जाती है, अब दूसरे ग्रुप में प्रधानी आ जाएगी यह सिलसिला आजादी मिलने के समय से आज तक चला आ रहा है। दोनों ग्रुपों के मुखियाओं के द्वारा आज तक एक-दूसरे के खिलाफ एक भी प्रार्थनापत्र नहीं दिया गया था। दोनों मजा मार रहे थे, जनता दोनों के बीच पीसी जा रही थी।
श्याम इन सभी के बीच अकेला था, वह कुछ योजनाएं तो लाया था, पर योजनाओं का लाभ गरीबों को नहीं मिल पा रहा था। इसी बीच श्याम के पास दुखों के पहाड़ टूट पड़े थे। श्याम से उसकी भारती को यमराज ने जबरन छीन लिया था। अब भी श्याम को अपने गांव की चिंता थी।
श्याम अब अकेला हो गया था। श्याम अब जी नहीं रहा था वह अपना पार्थिव शरीर ढो रहा था। कहते हैं जीने के लिए सहारा भगवान देता है वरना आदमी, आदमी तो महान बनने का ढोंग
करता है। श्याम को एक आदमी ने उसके दुख में बड़ी उदारता से पैसे दिए थे। जब श्याम थोड़ा थोड़ा करके पैसे वापस करने लगा था तब वह कहा, “या तो जमीन दो, या ब्याज सहित इकट्ठा पैसे देना!”
गांव में दो दलित लड़के बाहर शहर से पढ़कर आए थे। उन लड़कों की श्याम से मुलाकात हुई, श्याम के निर्देशन में उन दोनों पढ़े-लिखे नौजवानों ने बुराई को खत्म करने का बीणा उठा लिया था। गरीबों को न्याय दिलाने के लिए उन लड़कों ने खराब सिस्टम के विरुद्ध मुहिम छेड़ दिया था। उन नवयुवकों ने गांव के विकास के लिए धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया था।
वह दोनों लड़के दलित समाज से जरूर थे, उच्च शिक्षा उन्होंने गृहण किया था; सभ्यता, सुशीलता उनमें कूट-कूट कर भरी थी। वो जातिवाद के सख्त खिलाफ थे।
श्याम का सपोर्ट पाकर, उन दोनों नौजवानों ने गांव में भाईचारा, शिक्षा, पानी, स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी जरूरतों पर आंदोलन शुरू किया था। उनकी मांगों पर सरकार ने विचार किया था।
उधर गांव के दोनों ग्रुपों में खलबली मच गई थी। उनको ग्राम विकास से कभी कोई लेना-देना नहीं था, अपने विकास में रोड़ा उनको पसंद नहीं था। दोनों ग्रुपों को चिंता यह थी कि अगर यह जनता की आवाज बन गए तो हमारी गद्दी को सदा के लिए छीन ले जाएंगे! उन दलित नौजवानों से कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई तो श्याम की ही दैया मैया करने लगे थे।
उन दोनों ग्रुपों में वर्तमान के पास अंग्रेजी शराब की दुकान थी, निवर्तमान के पास देशी शराब की दुकान थी, प्रति रोज लाखों की आमद थी। शराबबंदी का नाम सुनते ही दोनों ग्रुप के प्रमुखों में अफरातफरी मच गई थी।
दोनों दलित जवान अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गए थे। प्रतिदिन गांव में अधिकारी आने लगे थे। आखिर उनकी वाजिब मांगों को लेकर किए जा रहे अनशन से प्रशासन को मजबूर होना पड़ा था। उपजिलाधिकारी, जिलाधिकारी की तरफ से धरना प्रदर्शन की जगह पर पहुंच कर उनकी शराबबंदी के साथ-साथ अस्पताल में डॉक्टर आदि की मांगें पूरी किए जाने के लिए लिखित रूप में दिया था। जिलाधिकारी ने तत्काल संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए थे।
वर्तमान एवं निवर्तमान ग्राम प्रधानों ने चोरी से गुप्त बैठक की, जिसमें श्याम को इस सब का जिम्मेदार माना गया। आखिर श्याम को खत्म करने की योजना पर भी विचार किया गया।
उन दोनों ने पहले जातिवाद का जहर घोलकर गांव के लोगों को भड़काते हुए श्याम को गद्दार बनाने की कोशिश किया। जातिवाद में झगड़े हुए, एस सी, एस टी एक्ट लगे, उन दोनों नौजवानों की सूझबूझ से मुकदमे जिसको लगना चाहिए उसी को लगे, श्याम निर्दोष था, अनजान था श्याम को मुकदमा नहीं लगा।
अब जब ग्रुप वालों की चाल विफल हो गई तब वह जो हमेशा से खा रहे थे, दोनों ग्रुप वाले एक हो गए। लोगों ने जब प्रश्न उठाए तब उन्होंने कहा, “हम सामान्य वर्ग से हैं, ए दलित श्याम के बहकावे में आकर सबको गालियां देते हैं इसलिए हम इन्हें सबक सिखाने के लिए एकजुट हुए हैं, हमारे लिए हमारी अपनी कौम, फिर पानी पिण्डा वाली जातियों को बचाना है, उनका भी मान-सम्मान बचाए रखना होगा। इस श्याम की चाल कामयाब हम नहीं होने देंगे!”
कितने स्वार्थी, निर्दयी, कठोर हृदय के थे यह लोग! जिस भोली-भाली जनता की वजह से यह पुस्तों से राज करते आए हैं, आज अपने स्वार्थ के लिए उन्हें जातिगत आधार पर बांटने की पूरी तैयारी कर लिया है।
आखिर एक दिन श्याम ने उन गांव की भलाई में काम करने वाले दलितों को बुला कर कहा, “मेरे प्यारे बच्चों, तुम इन बहुरूपियों के मायाजाल में नहीं फंसना, अपने गांव के सभी जातियों के भाइयों

का जिसमें कल्याण हो वह करते रहना, हो सकता है इन लोगों के द्वारा मेरे प्राण ही हर लिए जाएं पर तुम इस गांव को बिखरने से बचा लेना!”
उन दलित युवकों ने कहा, “नहीं, अभी आप हमारे मार्गदर्शक रहेंगे, आपको कोई नहीं मार सकता है। हम अपने गांव की खातिर अपना जीवन कुर्बान कर देंगे, आपके द्वारा लगाया गया यह वृक्ष हम सदैव पल्लवित रखेंगे आप बिल्कुल निस्फिकर रहें!”
श्याम, उन लोगों से बताया कि, “हमारे गांव में गरीबी रही होगी, गरीबी-अमीरी तो संसार में होती है, हम लोग खाने के लिए अनाज खूब पैदा कर लिया करते थे। हमारे आपके बीच में जातिवाद नहीं पनपा; एक सुंदर वातावरण, सुंदर व्यवस्था हुआ करती थी। अनाज पैदा करने में सभी का योगदान हुआ करता था, योग्यता के अनुसार आसन दिया जाता था। हम सभी का योगदान जितना होता था, उतनी हिस्सेदारी हुआ करती थी!”
श्याम ने एक आह भरते हुए अपनी बात जारी रखी, श्याम ने कहा, “हमारे गांव में शादी विवाह किसी का हो, योगदान सभी का हुआ करता था। आज भी मेहतर की लाई हुई आग से अंतिम संस्कार किया जाता है। विवाह में बढ़ई की बनाई लकड़ी की मगरोहन, लोहार का बरायन यानी सभी जातियों का दिया हुआ सामान लगता है!”
श्याम ने आगे कहा, “हमारे गांव में आपसी विवादों को सुलझाने के लिए पंचायत बैठती थी जिसमें, पंचा भइया चमार के सहित लगभग सभी जातियों के लोग दोनों पक्षों की सुनकर, आपस में गहन विचार करके मामले को सुलझा लिया करते थे। आज इस चुनाव प्रक्रिया ने हमें हमारे भाईचारे से दूर कर दिया है, हमें अपने भाईचारे को बचाना होगा। तुम लोग विचलित नहीं होना, कहीं किसी जगह मेरी एक प्रतिमा बनाकर मेरी याद बनाकर रखना!”
उन दलित नौजवानों को आशीर्वाद देकर श्याम अपने घर आ गया था।
रात में श्याम अपने घर में सो गया था, पूरी रात कुत्तों के भौंकने, सियारों के हुआने की आवाज डरावनी आ रही थीं। कुछ अजीब सा लग रहा था, वर्तमान प्रधान एवं निवर्तमान प्रधान दोनों को रात भर नींद नहीं आई, पूरी रात करवटें बदलते हुए बिताया था।
सुबह हो गई थी, अरुण की लालिमा वनस्पतियों की कोंपलों को लाल रंग से रंग दिया था। यह लालिमा जो गांव को जगाकर सुखमय वातावरण दिया करती थी, आज कुछ अजीब सी लग रही थी।
वर्तमान एवं निवर्तमान ग्राम प्रधानों के पास उनके धावकों ने आकर सूचना दिए कि, “श्याम को किसी ने काट डाला, उसके गले को काटकर उसकी हत्या कर दी गई है!”
दोनों प्रधान खुश हो गए थे, दोनों हरकत में आ गए थे। दोनों अपनी अपनी गाड़ियों से श्याम को देखने की जगह थाने की ओर रवाना हो गए थे।
श्याम के हत्या की खबर पूरे गांव में जंगल की आग की तरह फैल गई थी।
दोनों दलित नौजवानों को सबकुछ भूल गया था, वह दौड़कर सीधे श्याम के घर की ओर बढ़ गए थे।
उन दलित नौजवानों को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि, यह कैसे हुआ, किसने किया, वह श्याम की हत्या से बहुत दुखी थे।
श्याम की हत्या से पूरा गांव दुखी था, सभी लोग हतप्रभ थे। लोगों ने एक ग्राम विकास का मसीहा खो दिया था, यह प्रश्न अनुत्तरित नहीं था फिर भी सभी चुप थे।
कोई कुछ समझ पाता कि, भूतपूर्व प्रधान एवं वर्तमान प्रधान पुलिस के साथ वहां पहुंच गए थे। उन दलित नौजवानों की ओर इशारा करते हुए वर्तमान प्रधान ने कहा, “दरोगा जी, श्याम जैसा हमारे गांव में कोई दूसरा हीरा नहीं था, श्याम से कल शाम यह दलित लोग मिले थे, यह स्वर्णों से जलते हैं, इन लोगों ने ही यह सांप्रदायिक हत्या किया है!”
कोई कुछ समझ पाता कि, पुलिस लाश का पंचनामा भरकर, पोस्टमार्टम करने के लिए भेज दिया था। उन दोनों दलितों को गिरफ्तार करके अपने हिरासत में ले लिया था।
उस दिन पूरा गांव सदमें में था, किसी ने खाना नहीं खाया था। एक वर्तमान प्रधान एवं भूतपूर्व प्रधान के घरों में जश्न का माहौल था। उनकी कुटिल चाल कामयाब हो गई थी। एक तीर से सभी शिकार हो गए थे, अब उनके रास्ते में एक भी कांटा नहीं बचा था।




