चुप रहो... कुछ मत कहो
मधु भूतड़ा 'अक्षरा' जयपुर
चुप रहो,
कुछ मत कहो,
बोलोगे तो विरोधी कहलाओगे,
इर्द-गिर्द के लोगों से बेरुखी पाओगे,
असामाजिक तत्व घोषित हो जाओगे।
चुप रहो,
कुछ मत कहो,
सच का घोंट दो गला,
क्यों सोचना है दूसरों का भला?
समाज में यही है जीने की कला।
चुप रहो,
कुछ मत कहो,
चेहरे पर रखो मुस्कान,
आक्रोश की बंद करो दुकान,
देखो, समझो और बनो बुद्धिमान।
चुप रहो,
कुछ मत कहो,
समझदार ही बनता है अनजान,
सफलता का यही रास्ता है आसान,
सुविधाजनक मौन का यही बड़ा ज्ञान।
चुप रहो,
कुछ मत कहो,
अपनी चवन्नी चलती रहे,
कुकर में दाल बस गलती रहे,
स्वार्थ की राजनीति पलती रहे।
चुप रहो,
कुछ मत कहो,
एक आवाज़ से क्या हो जाएगा?
व्हाट्सऐप से व्यर्थ निकाल दिया जाएगा,
अयोग्य बताकर बड़ा मज़ाक बनाया जाएगा।
चुप रहो,
कुछ मत कहो,
ॐ इग्नोराय नमः जपते रहो,
अपनी-अपनी रोटियाँ सेंकते रहो,
आँखों के सामने अनीति सहते रहो।
क्या यह सही होगा!!
तो फिर…
चुप्पी, चाटुकारिता, चापलूसी उचित नहीं
इससे समाज का होता कभी हित नहीं…
गलत के विरुद्ध जो आवाज़ बुलंद करता है,
इतिहास उसी का नाम पन्नों पर गढ़ता है
ग़र कोई कमजोर है, मतलबी है, स्वार्थी है
ऐसे व्यक्तियों से समाज आगे कहाँ बढ़ता है?




