साहित्य उद्धारक

राजेश विक्रांत,
मुंबई

ये मेरे गुरु प्रो. ईश्वर भारद्वाज की कहानी है। वे अपने को साहित्य का उद्धारक, उद्धारकर्ता, मुक्तिदाता, मसीहा, रक्षक, बचानेवाला और नायक कहलवाना ज्यादा पसंद करते हैं। हिंदी के विद्वान प्रो. भारद्वाज प्रचंड लिक्खाड़ हैं। सरकारी, निजी व प्रकाशकीय गोदामों के लिए दर्जनों पुस्तकें बिना शर्म के उत्पादित की हैं और हजारों पेड़ों के विनाश में सहयोगी बने हैं। पर्यावरण की इतनी दुर्दशा पर शर्म उनको मगर नहीं आती।

इन्हीं किताबों के बल पर उन्होंने पद, प्रतिष्ठा, मान सम्मान, पुरस्कार, पदवी की अनेक पतंगे भी लूटी हैं। उन्होंने शैली व भाषा विज्ञान का प्रचुर भला किया है। कहानी, कविता, उपन्यास में काफी हाथ मारे हैं। यहां तक कि हिंदी साहित्य का इतिहास भी लिख मारा है। किसी समय उन्होंने मुझे शैली विज्ञान पढ़ाया था। कॉलेज से सेवानिवृत होने के बाद उन्होंने लेखन तथा कार्यक्रमों की अध्यक्षता को ही अपना रोजगार बना लिया। खुराफात, बुराइयां, बकैती, सेटिंग उर्फ सांठगांठ, टांग खिंचाई, उठापटक भी उनका प्रिय शगल बन गया। मतलब उनका कोमल पैर लेखनीय राजनीति के कैक्टस कानन में भी सहसा सक्रिय हो गया।

मैं उनकी विद्वता से प्रभावित था। किंतु उनके व्यक्तिगत आचरण से अनजान था। जब वे फोन करते थे तो दुख का धारावाहिक अरण्यरोदन करते थे। उनकी नजर में साहित्य का साधक कहाए जाने के लिए दो- तीन रचना ही बहुत हो जाती है। हिंदी में ऐसे नालायक भी हैं जो चार कविता लिखकर अपने को निराला टाइप साहित्यकार मानते हैं तो मैं क्यों न उद्धारक बनूँ? उनकी बात से मैं द्रवित हो गया। सोचने लगा कि गुरुदेव जी महाराज के लिए मैं क्या कर सकता हूं।

काफी सोच विचारकर मैंने गुरु जी को एक दिन फोन लगाया और बड़ी विनम्रता के साथ कहा, “गुरु जी, आपका व्यक्तित्व और रचना संसार वैविध्यतापूर्ण है। यदि आपका आदेश हो तो मैं आप पर एक किताब संपादित करना चाहता हूं।” उन्होंने सुपरसोनिक स्पीड से तुरंत अपनी स्वीकृति दे दी। मैं काम में जुट गया। दिन रात मेहनत की। उनकी किताबें मैंने विद्वानों को समीक्षार्थ दी। काम तेजी से शुरू हो गया।

कहते हैं कि जिसे आत्मज्ञान हो जाए, उसे बाहरी ज्ञान की क्या जरूरत? सो एक दिन प्रो भारद्वाज ने मुझे फोन करके कहा, “नरेंद्र, मैं दो-तीन लेख स्वयं लिख देता हूं। उसको मेरे किसी सगे-संबंधी के नाम से पुस्तक में दे देना।”

उनकी बात सुनकर मुझे लगा कि लेखन और खुराफात गुरुजी के समानांतर रोजगार हैं। सफल साहित्यकार जनवाद के रास्ते प्रतीकों व पुरस्कारों को साधता है। उसे आदमी से उतना सरोकार नहीं होता जितना बिंबों और प्रतीकों से रहता है। खैर, एक डेढ़ साल में पुस्तक की पांडुलिपि तैयार हो गई। यह भूमिका और नामकरण विहीन थी। गुरुजी ने पांडुलिपि की फाइल अपने पास मंगा ली।

वे उस फाइल रूपी सुंदरी के इश्क में ऐसा गिरफ्तार हुए कि एक साल बीत गया। गुरुजी न तो फाइल पर चर्चा करना चाह रहे थे और न ही किताब के प्रकाशन पर। एक दिन उन्होंने फोन किया, “नरेंद्र, फलां तारीख को पुस्तक का लोकार्पण है, उसमें आ जाना। मुझे आश्चर्य हुआ। किताब का लोकार्पण कुछ दिन बाद है और मुझे पता तक नहीं! मेरे शरीर में डीसी करेंट दौड़ गया। एक क्या, बल्कि अनेक झटके लगे।

फिलहाल, मैं लोकार्पण वाले दिन उस कार्यक्रम में पहुंचा। लोकार्पण के बाद जब मैंने किताब पलटी तो पैरों तले जमीन खिसक गई। हिंदी में दूर की संभावनाएं नजदीक के ईमान को पिघला देती हैं। गुरु जी ने पुस्तक के संपादन का श्रेय अपनी किसी प्रिय शिष्या को दे दिया था। उसकी भूमिका भी स्वयं लिख दी थी। पुस्तक के अधिकांश लेख खुद लिखकर उसमें दूसरों का नाम दे दिया था।

मामला अगर किसी को उपकृत करने का हो तो इतिहास के पन्नों में सोया सिकंदर उद्धारक के रूप में प्रकट होकर बाजार के बिस्तर पर जाग रही मल्लिका के सामने आत्मसमर्पण कर देता है, फिर वह अलादीन के जिन्न से कहता है कि उसका नाम काटो, उसका नाम चिपकाओ। अजीब बात यह कि पुस्तक का शीर्षक- साहित्य उद्धारक, किसी सस्ते और जासूसी उपन्यास जैसा था। गुरुजी ने मन चाहे व्यक्ति को स्वयं पर संपादित पुस्तक को समर्पित किया था। उस पुस्तक में मैंने कई लेखकों से लेख लिखवाए थे। बाद में उन्हें भेंट करने के लिए पुस्तक मांगता रहा, गुरुजी टालते रहे। महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से अंगूठा मांगा था, कलयुग में साहित्य उद्धारक गुरुजी ने अपने शिष्य से पूरी किताब मांग ली।

Author